हिन्दू जीवन शैली : वास्तविक वर्ण व्यवस्था

नाम नहीं कर्म से तुलना

सिर्फ भारत ही क्यों किसी भी देश में मानवों को आप यदि उनके कार्य के अनुसार विभाजित करेंगे तो किसी भी देश में आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मिल जाएंगे. एक बार फिर कहूंगी सामाजिक व्यवस्था की बात नहीं कर रही जिस आधार पर आप आरक्षण माँगते हैं.

यह उस सूक्ष्म व्यवस्था की बात है जहां प्रकृति ने आपको अलग अलग कार्यों के लिए चुना है, और आप अपने उन्नत कार्य के साथ पदोन्नति पाते हैं… आप चारों के नाम बदल दीजिये… इसे उलटा लिखिए ब्रह्म को प्राप्त करनेवाले को शूद्र कहिये… तो मैं शूद्र होने का प्रयास करूंगी… नाम के पीछे मत भागिए… कर्म से तुलना कीजिये…

हिन्दू जीवन शैली पंथ विरोधी नहीं

हमारे यहाँ से भी कई पंथ निकले हैं और उन्हें स्वीकार्य मिला है क्योंकि उनका प्रयास मानव के उत्थान के लिए हुआ. और जब जब वो प्रकृति विरोधी हुआ अपने आप नष्ट होता गया. इसलिए हिंदुत्व, मुस्लिम विरोधी नहीं है लेकिन हाँ यदि उनकी कट्टरता हमारे लचीले व्यवहार पर वार करेगी तो वो प्रकृति द्वारा स्वयं ही नष्ट कर दी जाएगी. इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ दुनियाभर से उठ रही आवाज़, विरोध और जंग इस बात का प्रमाण है.

दूसरी बात, मनुस्मृति या किसी भी हिन्दू ग्रंथों में जहां वर्ण व्यवस्था का प्रमाण मिलता है, उन दिनों मुस्लिमों का हमारे राष्ट्र में कहीं अस्तित्व नहीं था. वो बाद में आए. जैसे आज आप अमेरिका जाकर बस जाते हैं तो वहां के नागरिक हो जाते हैं. वैसे ही यहाँ आकर बस चुके मुस्लिम यहाँ के नागरिक हो गए. यदि आप अपने देश की व्यवस्था में घुलमिल नहीं जाते तब तक आप मेहमान ही कहलाएंगे. यदि आपकी आस्था आपको अपने मूल वतन की ओर खींचती है तो यहाँ बसना और भी मुश्किल हो जाता है..

और इससे ही जुडी और गहरी बात यह समझिये जो यहाँ की व्यवस्था में घुल मिल नहीं सके वे भारत विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गये. वर्ण व्यवस्था बनने के समय काल से यदि उसे गिना जाए, तो यह सबसे ताज़ी घटना कही जाएगी.

महावीर को ज्ञान प्राप्त होने के बाद जो जैन बने वो भी हिन्दू जीवन शैली के साथ रच बस गए, तो उनका अस्तित्व बना रहा. मोहम्मद पर जब कुरआन उतरी उसके बाद ऐसा क्या हुआ होगा कि आसमानी किताब में लिखी बातों को भी तोड़ मरोड़ कर ऐसा बना दिया गया कि आज किसी सभ्य मुसलमान के गले भी नहीं उतर रही.

हिन्दू जीवन शैली का लचीलापन

सामाजिक वर्ण व्यवस्था में यदि कुछ बुराई थी तो समय के साथ वो ख़त्म होती चली गयी. अपने लाभ के लिए कुछ लोग नीची जाति के अस्तित्व को बनाए हुए हैं, जबकि यहाँ भी कर्म फल का सिद्धांत ही लागू होता है. अपने कर्मों के फल स्वरूप आप ऐसे घर में जन्म लेते हैं जिसे समाज ने हाशिये पर रखा हुआ है तो आप इस जन्म में अच्छे कर्म कर समृद्ध कुल में भी जन्म पा सकते हैं. समृद्ध कुल कहा है जाति नहीं, समृद्ध कुल किसी भी जाति का हो सकता है.

हाँ एक ही जन्म में सारा हिसाब किताब चाहने वालों को सिद्धांत समझ नहीं आएगा, उसके लिए उसे अगले जन्म में ब्राह्मण कुल में ही जन्म लेना होगा.

एक बहुत अच्छा उदाहरण मैं अपना देती हूँ. 1989-90 में जिन दिनों आरक्षण के विरोध में लोग आत्मदाह कर रहे थे, उन दिनों मेरे बड़े भैया भी उन छात्रों के साथ जेल गए थे जो आरक्षण विरोधी थे. किसलिए, ताकि उन्हें ये तमगा मिल जाए कि देखो हम भी आरक्षण के विरोधी हैं और उसके लिए जेल तक होकर आये हैं. मैं उन दिनों अपने भैया और पापा से बहुत प्रभावित हुई थी. उन दिनों हम अपने एडमिशन फॉर्म में क्षत्रिय लिखते थे.

मैं तब स्कूल में थी, लेकिन जब मेडिकल के लिए कॉलेज में मेरे एडमिशन की बात आई तो पिताजी कहीं से मेरे लिए OBC certificate बनवा लाए. हम लोग जाति से दरजी थे तो मेरे लिए आसानी से OBC का सर्टिफिकेट मिल गया. हालांकि केवल एक प्रतिशत से मेरा एडमिशन रह गया. लेकिन मेरे मन में उस दिन एक बात बैठ गयी कि दुनिया में कोई इमानदार नहीं, अपने लाभ के लिए, चाहे मेडिकल में एडमिशन ही क्यों न हो मेरे पापा तक जब ऊंची जाति से नीची जाति में जाने को तैयार है तो फिर भारत का गरीब परिवार आरक्षण के नाम पर क्या क्या नहीं करता होगा.

लेकिन मेरी यात्रा कहीं और तय थी. ब्राह्मण कुल में जन्म न लेने के बावजूद आज मैं एक ब्राह्मण परिवार की बहू हूँ. मेरे कर्म सामाजिक नज़र में आप तुच्छ या उच्च कह सकते हैं, लेकिन मानवीय, वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से मैं खुद को ब्रह्म की खोज की राह पर अग्रसर कर चुकी हूँ. अर्थात वास्तविक रूप से ब्राह्मण होने की कगार पर.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY