कृपया अपनी हीन भावना को अपने पास रखें

मैंने 6 फरवरी को एक लेख में लिखा था कि भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे छात्रों का ज्ञान और जानकारी, चाहे वे किसी भी विषय को पढ़ रहे हो, दोयम दर्जे की है.

खुद मेरी भी यही हालत थी इलाहाबाद और जेएनयू से पढ़ने के बावजूद. इसमें उनका नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का दोष है.

खराब शिक्षा का असर यह हुआ कि अधिकतर लोग किसी बात को सही मानते है क्योकि वह उनको सही ‘लगती’ है, जबकि आंकड़े, तथ्य और एविडेंस कुछ और कह रहे है.

मैंने आंकड़े दिए, एविडेंस दिए, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. बात गोल-गोल घूमकर एक ही जगह अटकी रहती है, आगे बढ़ती ही नहीं.

इसका परिणाम यह हुआ कि अधिकाँश भारतीय छात्रों में आत्मविश्वास की कमी है. हमारे लिए यह स्वीकार करना दुरूह हो जाता है कि हम सफ़ेद (व्हाइट का अनुवाद मैं सफ़ेद करूँगा; गोरा कहकर सम्मानित नहीं) लोगों को मात दे सकते हैं. शायद सफ़ेद लोगों की गुलामी भी कुछ हद तक हमारी इस मानसिकता का कारण हो सकती है.

अब मेरी पोस्ट – वैज्ञानिक लेख के प्रकाशनो में भारत ने फ्रांस को पछाड़ कर अब छठे स्थान पर आ गया है; फ्रांस अब सातवीं पायदान पर है – पर कुछ लोग यह सिद्ध करने में लग गए कि भारत ऐसा कर ही नहीं सकता.

यह लिखा कि चूंकि भारत के लोग फर्जी या केवल नाम के लिए पैसा लेकर (predatory journal) छापने वाले प्रकाशनों में लेख छपवाते है, उनके कारण भारत ने फ्रांस को पछाड़ दिया.

किसी अन्य ने लिखा कि ‘भारत से प्रकाशित पेपर उपयोगी नहीं होते क्योंकि अनुसंधान और उद्योग के बीच कोई संबंध नहीं है. भारतीय शोध का मुख्य मकसद एक पेपर प्रकाशित करना है.’

एक तीसरे ने इसका समर्थन करते हुए लिखा कि भारत के लेखों का अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव H-index… I-10 कितना होता है? जरा इस पर प्रकाश डालेंगें… कितने लेख हाई इम्पैक्ट में होते हैं?

क्या फ्रांस की रिपोर्ट मैंने लिखी है जो आप मुझे भारतीय रिसर्चर की खामियां गिना रहे हैं जिन्हे मैंने रिपोर्ट में शामिल नहीं किया?

क्या फ्रेंच लोगों को आपने इतना भोला समझ लिया है कि उन्होंने फर्जी प्रकाशनों या predatory journal में छपे लेखों को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है?

क्या फ्रेंच रिपोर्ट के विषय क्षेत्र में अनुसंधान पेपर और उद्योग के बीच संबंधों का विश्लेषण शामिल है?

कुछ लोगो ने मुझसे रिपोर्ट का अनुवाद मांग लिया. मेरे पास अनुवाद करने का समय नहीं है.

आपसे आग्रह है कि रिपोर्ट के पेज 97 को इम्पैक्ट या प्रभाव के लिए पढ़ें; उसमें लिखे WoS और SCOPUS के बारे में पेज 105 में पढ़े जिसमें बताया गया है कि इस रिपोर्ट को लिखने में किन प्रकाशनों को संज्ञान में लिया गया है.

WoS और SCOPUS peer-reviewed किए गए लेखो का सबसे बड़ा डेटाबेस है.

अगर ऐसे तर्कों और हीन भावना में मैं उलझा रहता तो सुल्तानपुर के राजकीय इंटर कॉलेज में ज़मीन पर बैठ कर पढ़ने, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीतिक शास्त्र में हिंदी माध्यम से MA करने, और MA तक ठीक से ना तो अंग्रेजी बोलना, ना ठीक से लिखने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र सचिवालय में भारत सरकार के विरोध के बावजूद भी ना बैठा होता.

मेरी डॉक्टर पत्नी स्वयं विश्व के प्रमुख कैंसर इंस्टिट्यूट मेमोरियल स्लोअन केटरिंग में असिस्टेंट प्रोफेसर है और उनके अब तक 25 लेख या तो प्रथम लेखक या अंतिम लेखक (वरिष्ठ लेखक) के रूप में टॉप जर्नल में छप चुका है; दो लेख प्रकाशन के लिए स्वीकार किये जा चुके है. मेरा स्वयं का एक लेख EUISS में छप चुका है.

कृपया अपनी हीन भावना को अपने पास रखें.

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