अपने ही शहीद नेता को भुला बैठे हैं पाखंडी कम्युनिस्ट

31 मार्च आती है… मैं उदास होता हूँ… मैं सोचता हूँ… मैं खामोश रहता हूँ… मेरी कम्युनिस्टों के प्रति घिन और बढ़ जाती है…

मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढता था और कई मित्र थे JNU में. मुझे पढ़ाई के साथ वैचारिक कार्यक्रमों में संगत करना अच्छा लगता था अतः अक्सर काफी समय JNU में कटता था.

कम्युनिस्ट राजनीति का गढ़ JNU… जहाँ लोग विश्व की राजनीति बूक के पीते थे क्योंकि भारत के IFS प्रशिक्षु स्थान यही पास में है और वो दुनिया के राजनीति की सीख लेते हैं.

तब वैचारिक द्वन्द के लिए इससे शानदार जगह भारत में कहीं नहीं थी… देश में पढ़ाई के पाठ्यक्रम से लेकर मीडिया जगत यहाँ के इशारे से चलता था क्योंकि IIMC इसके कैंपस का हिस्सा है… जिसकी चार दीवारी में कम्युनिस्ट के खिलाफ होने के माने आप का कोई अस्तित्व नहीं है.

मेरा आना जाना होता था और एक मित्र ने मुलाकात कराई थी एक पतले से परन्तु कॉंफिडेंट, धुन के मस्त और विचारों से पूरी तरह क्लियर लड़के से…

मैं चूँकि गोरखपुर से हूँ, बिहार के सिवान से लगे भटनी में ननिहाल, आगे भाटपार रानी में माँ का ननिहाल है तो उस सिवान के लड़के से मुलाकात में मज़ा आया…

वो कम्युनिस्ट था… मुझे कम्युनिस्टों की अप्रासंगिक बकवास पसंद नहीं थी… फिर भी दिखते ही मैं उसको ‘लाल सलाम साथी’ बोलकर जोर से हँसता था और वो ‘राम राम भगवाधारी पंडी जी’ बोलकर हँसते हुए थोड़ा रूककर हालचाल पूछ कर आगे बढ़ लेता था…

वो उम्र में हमसे बड़ा था… हम ग्रेजुएशन में थे वो M.Phil करने आया था… वो मुझे कहता था कि… “एन्ने का कर तानी, रउआँ विज्ञान वाला हईं पंडी जी, जाईं पढ़ी लिखीं…” और हँसता था, अंत में कहता “…Don’t waste time…”

शुरू में वो JNU में AISF का सदस्य था लेकिन उसके मतभेद हो चले थे और फिर उसने अकेले अपने दम पर AISA को JNU में खड़ा किया था…

हालाँकि सारी कम्युनिस्ट पार्टियां JNU में मिलकर ही चुनाव लड़ती रही हैं अदृश्य दुश्मन ‘दक्षिणपंथियों’ के खिलाफ और अंत में अपने facilitator कांग्रेस के साथ ही चौकड़ी मारती हैं (वो फिर कभी)…

तब भी ऐसा ही था… लेकिन AISA को JNU में खड़ा करने वाला वही था… 1994 तक मेरा JNU आना जाना था और तब वो JNUSU का VP था… बाद में खबर आई कि वो JNUSU का अध्यक्ष बना और दो बार बना.

हमने पढाई पूरी की, नौकरी में लग गए… उसने पढ़ाई पूरी की और वापस अपने गाँव आ गया… उस लड़ाई को लड़ने जो वो JNU की लाल चार दीवारी में सिर्फ मुंह से ही नहीं लड़ता था बल्कि उस लड़ाई को उसने जीवन में आत्मसात किया था.

पश्चिमी बिहार के गरीबी, जातिवाद, गुंडाराज के खिलाफ… सामाजिक असमानता और हर एक के हक़ की लड़ाई लड़ने वो बिहार के सिवान जिला में स्थित अपने गांव में आ गया था…

बाद में उससे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई लेकिन मिलने का मन करता था… एक बार JNU में पढ़ रहे एक अन्य मित्र के द्वारा सन्देश भेजे थे कि मिलना है किधर मिलें…

उन भाई साहब ने टेलीफोन पर बात कराई थी तब वो बोला था कि “पंडी जी हाल बुरा है लेकिन हम गोली बंदूक के खिलाफ लड़ाई जीतेंगे और गरीब शोषित का उत्थान करके ही रहेंगे… यहाँ हम खुशहाली लाएंगे, लेकिन अचार के मिर्चा के साथ सत्तू का लिट्टी खाना हो तो कभी भी आइए हमारे गांव, गोरखपुर से है कितना दूर…”

मैं कभी जा नहीं पाया, जाना चाहते हुए भी… इसका अफ़सोस हमेशा रहेगा…

फिर टीवी पर खबर देखी कि उसको मार डाला गया… वो अपने दूसरे साथी श्याम यादव के साथ गोलियों से भून डाला गया है…

उसको मारने वाली बन्दूक सेक्युलर थी… उसको मारने वाली सरकार राज्य में सेक्युलर थी… केंद्र में कम्युनिस्ट समर्थित तीसरे मोर्चे की सरकार सेक्युलर थी… मारने वाला, मारने की सुपारी देने वाला सब सेक्युलर थे…

हत्या के बाद बिहार भवन में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव से बात करने को पहुँचे JNU के विद्यार्थियों पर गोली चलाने वाले साधु यादव सेक्युलर थे… दिल्ली पुलिस को स्टूडेंट्स को दौड़ा दौड़ा कर पीटने, बिहार भवन क्लियर कराने का आदेश देने वाले गृह मंत्री सेक्युलर थे…

31 मार्च से आज तक कई कम्युनिस्टों की फेसबुक वॉल देखी, जिन्होंने ब्लॉक किया है उनकी वॉल की मित्रों से जानकारी भी की… लेकिन किसी भी कम्युनिस्ट ने उसके लिए एक लाइन भी न लिखी… कहीं कोई कार्यक्रम हुआ ऐसा सुनने को भी नहीं मिला…

मैं बात कर रहा हूँ चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ़ चंदू की… जिसके बाद JNU कोई कम्युनिस्ट नेता नहीं दे सका… मीडिया के द्वारा खड़ा किया गया कन्हैया कुमार जिसको ये लोग दूसरा चंदू बोलते नहीं थकते, उसने चंदू का नाम तक न बोला…

खैर कन्हैया जैसे दुष्ट और चंदू जैसे नेता में बहुत फर्क है… कन्हैया को चंदू बोलने का बेहयाई वाला काम मीडिया ही कर सकती है…

चंदू की माँ ने तब केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद को ये कह के ठुकरा दिया था कि मेरे बेटे को मारने वाले शहाबुद्दीन को नहीं छोडूंगी और मेरा साथ ये हज़ारों लड़के हैं जो मेरी ताकत हैं…

खैर चंदू की माँ कब चल बसी ये किसी कॉमरेड को पता ही नहीं चला… अंत समय तक इलाज के लिए तड़पती उस महिला को किसी ने पूछा तक नहीं… उसके शव को कांधा देने एक भी कम्युनिस्ट नहीं आया था…

चंदू के पिता उसके बचपन में ही गुजर गए थे… चंदू स्वयं कम्युनिस्टों और सेकुलरों की राजनीति की भेंट चढ़ गया जो अब उसके नाम तक को नहीं याद करते…

भारत के कम्युनिस्ट और सेक्युलर किसी के सगे नहीं है… बिहार की राजनीति में जो लालूवादी सिर्फ यादव नाम से चिपके हैं, उनको पता होना चाहिए कि चंदू के साथ कितने यादव लोगों की बलि ली है उस दौर की राजनीति ने… राजनीति, वो भी कम्युनिस्ट और सेक्युलर, बहुत गन्दी है… बहुत ही गन्दी… आप गंदे को जितना गन्दा मानते हैं उससे भी बहुत गन्दी है…

चंद्रशेखर पटना विश्वविद्यालय से ही गलत तरफ हो लिया था जिससे लौटना नामुमकिन होता है… CPI, CPI-ML यानी कम्युनिज्म माफिया गैंग… एंट्री है लेकिन एग्जिट नहीं है…

एक बार जब किसी को कम्युनिज्म का रोग लग जाता है वो देश, काल, समाज से हर बात का विद्रोह करता है, सही बात का ज़रूर विद्रोह करता है…

एक बार कम्युनिज्म का कीड़ा किसी को काटता है, तो वह अपने अंदर के राष्ट्रवाद – समाजवाद को ख़त्म कर देता है, अपने सभ्यता और विरासत से खुद को दूर कर लेता है.

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