दोस्त, शिक्षक, प्रेमी-प्रेमिका, ढूंढिए किस रूप में दिन-रात आपके साथ हैं नक्सली

फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री जी ने 2016 में नक्सल समस्या पर एक बेहतरीन फिल्म बनायी. फिल्म का नाम है ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’.

इस फिल्म में अनुपम खेर ने अपने सशक्त अभिनय से जान डाल दी है. अनुपम खेर हैदराबाद के एक बड़े मैनेजमेंट कॉलेज में प्रोफेसर है.

ये प्रोफ़ेसर एक छुपा हुआ शहरी नक्सली है, जो करप्शन से नफरत करता है और पूरी दुनिया में सशस्त्र हिंसक क्रांति के द्वारा सत्ता परिवर्तन का ख्वाब अपनी आँखों में संजोए हुए है.

लेकिन वो अपने स्टूडेंट्स के सामने हमेशा कहता रहता है “करप्शन इज़ गुड”, और इसके पक्ष में जबरदस्त तर्क प्रस्तुत करता है.

प्रायः सभी स्टूडेंट्स उसके तर्कों से कन्विंस हो जाते हैं, लेकिन उसकी नजर उस स्टूडेंट को खोजती रहती है जो करप्शन को ठीक नहीं मानता हो और थोड़ा भावुक हो.

ऐसे स्टूडेंट को चुन लेने के बाद वो उसे अकेले में अपने पास बुलाता है और वामपंथी साहित्य पढ़ने को देता है और धीरे-धीरे उसे अपनी चपेट में ले लेता है.

इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कैसे हमारे चारों तरफ किसी भी रूप में नक्सली हो सकते हैं, जिसके बारे में हम कभी सपने में भी नहीं सोच सकते कि ये हमारे साथ दिन-रात रहने वाला दोस्त, शिक्षक, प्रेमिका आदि नक्सली हैं और बड़े मुस्तैदी से अपने मिशन में लगे हैं.

फिल्म में बस कुछ उदाहरण देकर बतलाया गया है कि इनका जाल इतना बड़ा है कि हम उसे समझ ही नहीं सकते.

इनका सबसे नरम शिकार कॉलेज के विद्यार्थी होते हैं. यही कारण है कि इन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में किया.

ये जानते हैं कि राजनीतिक सत्ता अस्थायी है जबकि शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करके जब विद्यार्थियों के दिमाग में वायरस डाल दिया जाता है तो वो विद्यार्थी एक सुसाइड बम बनकर पहले अपने को, फिर परिवार, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र को भीतर ही भीतर खोखला करने लग जाता है.

और ऐसे ही खोखले राष्ट्र पर जब वह एक दिन राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करेगा तो वह सत्ता स्थायी होगी.

ये किस खतरनाक तरीके से काम करते हैं मैं उसका बस एक प्रत्यक्ष उदाहरण दे रहा हूँ.

इस साल मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. के द्वितीय वर्ष के छात्राओं को हिन्दी पढ़ा रहा हूँ. उनके सिलेबस में महाभारत से मात्र एक ही प्रसंग है, वो भी एकलव्य वाला.

इसमें कोई बुरी बात नहीं है, हम लोग भी बचपन से एकलव्य की गुरुभक्ति का प्रसंग पढ़ते आये हैं. लेकिन ‘इन’ लोगों के द्वारा निर्मित पाठ में, एकलव्य की गुरुभक्ति से कोई विशेष प्रयोजन नहीं है. इनका सारा फोकस यह साबित करने में है कि उस समय कैसे निम्न जाति के लोगों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था.

दूसरी बात, जो अर्जुन इतना योग्य है कि सशरीर स्वर्ग में चला गया है. एक गृहस्थ होकर भी इतना संयमी है कि स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का प्रणय निवेदन ठुकरा देता है. भगवान श्री कृष्ण जिसके सखा हैं और जिसके लिए उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश किया, ऐसा महामानव भी नीची जाति के एकलव्य के अँगूठा काटे जाने पर थोड़ी भी सहानुभूति प्रदर्शित नहीं करता है. इतना महान आत्मा भी किसी निर्दोष के लिए कितना असंवेदनशील है.

गुरु द्रोणाचार्य युद्ध कला में इतने निपुण हैं कि उनसे संपूर्ण विश्व के क्षत्रिय युद्ध कला सीखने के लिए आते हैं. लेकिन वो एक निम्न जाति के एकलव्य के लिए अत्यंत निर्दयी और घोर असंवेदनशील हैं.

इसके अलावा गुरु द्रोणाचार्य अपने पुत्र के प्रति पक्षपाती हैं. सेवा कार्य के तौर पर शिष्यों को पानी भर कर लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. गुरु द्रोण प्रतिदिन शिष्यों को एक-एक कमण्डलु इस कार्य के लिए देते थे, जबकि पुत्र अश्वत्थामा को वे एक बड़े मुँह वाला कलश देते थे.

कमण्डलुओं का मुँह छोटा होने के कारण शिष्यों को अपना काम करने में विलम्ब होता था जबकि पुत्र अश्वत्थामा उसे जल्द पूरा कर लेता था. इस अवकाश का फायदा उठाकर गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को उन श्रेष्ठ अस्त्रों का गूढ़ प्रयोग सिखाते थे जिन्हें वे अन्य शिष्यों को नहीं बताना चाहते थे.

अब गुरु द्रोणाचार्य का ऐसा कलंकित चरित्र रट कर परीक्षा पास करनेवाला विद्यार्थी जब ग्रेजुएट होगा और उसके बाद विवाह करेगा, फिर अपने बच्चों को बचपन से ही दधीचि, भगीरथ आदि का त्याग नहीं समझा पायेगा, क्योंकि उसके अवचेतन मन में बहुत गहरे में गुरु द्रोणाचार्य की मक्कारी को इंजेक्ट कर दिया गया है.

इस वैचारिक महासमर में, न प्रत्यक्ष कोई युद्ध होता दिख रहा है, न अस्त्र-शस्त्र दिख रहे हैं, लेकिन हमारी घायल संस्कृति दिन पर दिन और अधिक लहूलुहान और खोखली होती जा रही है. दुर्भाग्य से हम एक ऐसा ऐतिहासिक युद्ध लड़ रहे हैं, जिसके बारे में अधिकांश लोगों को पता तब चलेगा जब वे ये जंग बुरी तरह हार चुके होंगे.

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