बंकिम बाबू के दशावतार

राष्ट्रवादी खेमे के सारे लोगों के मन में यह प्रश्न जरूर उठा होगा कि आखिर क्या कमी थी हिंदुओं में जिसकी वजह से हम सदियों तक मुसलमानों की गुलामी सहन करते रहे.

फिर अंग्रेज आए तो उनका प्रतिरोध करने के बजाय उन्हीं की फौज में भर्ती होकर अपने लोगों पर जुल्म ढाए, उनके दफ्तरों में क्लर्क बन कर साहब बहादुर के तलवे चाटते हुए अपने लोगों पर रौब गांठते रहे.

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, विशेषकर बंगाल में इस पराजय बोध पर मंथन बहुत गहन था. इसलिए भी कि तब तक बंगाली भद्रजन ‘बाबू’ के रूप में कुख्याति अर्जित कर चुके थे. और तब बाबू आज की तरह सम्मानजनक संबोधन नहीं था, इन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता था.

अपने समय के सबसे बड़े मनीषी बंकिम चंद्र चटर्जी इन बाबुओं के भांति-भाति के सर्कस को कौतूहल भरी दृष्टि से देख रहे थे. उन्होंने पाया कि ये बाबू नहीं विष्णु भगवान के साक्षात दशावतार हैं.

देखिए 1880 में बंकिम बाबू इन दशावतारों के बारे में क्या लिखते हैं :

(भगवान) विष्णु की तरह बाबू हमेशा शयन की मुद्रा में रहते हैं. पुन: विष्णु की ही तरह इनके दस अवतार होते हैं : क्लर्क, शिक्षक, ब्रह्मो, बिचौलिया, डाक्टर, वकील, जज, भूस्वामी, अखबार का संपादक और कामचोर.

पुन: विष्णु की ही तरह जैसे उन्होंने दानवों का वध किया था, बाबू इन सारे अवतारों में अपने संपर्क में आने वाले का विनाश कर देते हैं.

क्लर्क के अवतार में वे अपने सहायक का और शिक्षक के अवतार में वे अपने शिष्यों का ध्वंस करते हैं, स्टेशन मास्टर के रूप में बेटिकट यात्री का, ब्रह्मों के अवतार में गरीब पुजारी का, बिचौलिये के रूप में अंग्रेज व्यापारी का, डाक्टर के रूप में मरीज का, वकील के अवतार में मुवक्किल का और जज के अवतार में वह फरियादी का विनाश करता है.

संपादक के अवतार में वह निष्कपट भद्रजनों का, भूस्वामी के रूप में बट्टेदारों का और एक आलसी-कामचोर के अवतार में पोखरी में मछलियों का ध्वंस करता है…

वह जिसके दिमाग में एक शब्द होता है पर जब वह बोलता है तो दस हो जाते हैं, जब लिखता है तो सौ हो जाते हैं और जब झगड़ता है तो एक हजार हो जाते हैं, वह बाबू है.

वह जिसकी शक्ति हाथ में एक गुना, मुंह में दस गुना हो जाए और पीठ पीछे हजार गुना हो जाए, परंतु कार्रवाई की आवश्यकता पड़ने पर जो अदृश्य हो जाए, वह बाबू है.

वह जिसके देवी-देवता फिरंगी हों, जिसका गुरु ब्रह्मो प्रचारक हो, जिसके वेद-पुराण अखबार हों और जिसके लिए नाटक देखने जाना तीर्थयात्रा हो, वह बाबू है.

जो मिशनरियों के सामने स्वयं को ईसाई घोषित करे, केशवचंद्र के सामने खुद को ब्रह्मो बताए, अपने पिता के सामने खुद को हिंदू कहे और एक अकिंचन ब्राह्मण भिक्षु के समक्ष खुद को नास्तिक बताए, वह बाबू है.

वह जो घर में पानी और दोस्तों के घर मदिरा पिए, वेश्याओं की गालियां सुने और दफ्तर में अफसर की लात खाए, वह बाबू है.

जो स्नान करते समय तेल से, भोजन करते समय अपनी ही उंगलियों से और बोलते समय अपनी मातृभाषा से घृणा करे, निश्चित ही बाबू है….

हे राजन, ये लोग, जिनके सद्गुणों का मैंने आपके सामने सविस्तार वर्णन किया, वो शय्या पर लेटे-लेटे पान की जुगाली करते, सिगरेट हाथ में लेकर दो भाषाओं में संवाद करते हुए सोचते हैं कि वे भारत पर फिर से विजय पताका फहराएंगे.”

आधुनिक दशावतारों का बंकिम बाबू का यह वर्णन 1880 का है. तब से गंगा में बहुत पानी बह चुका है और प्रदूषण विकराल रूप ले चुका है.

यानी द्रष्टा ने इनकी चरित्रगत विशेषताओं का जो वर्णन किया था, वो समय काल से परे परम सत्य है. लेकिन हिंदू समाज को रसातल में पहुंचाने में इनके ‘अन्यतम योगदान’ का कभी कोई ऑडिट नहीं हुआ. अब यह करने की जरूरत है. सहयोग अपेक्षित है.

(बांग्ला से अंग्रेजी अनुवाद इतिहासकार पार्थ चटर्जी का जो सबसे पहले उनकी किताब The Nation and its Fragments: Colonial and Postcolonial Histories में छपा. यहां एमजे अकबर की किताब ‘The shades of swords’ से उठाया गया. हिंदी अनुवाद इस नाचीज़ बाबू का)

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