हर हिन्दू हनुमान बनेगा तभी सुरक्षित रहेगी हमारी जानकी और रूमा की आबरू

‘द वायर’ की एक प्रेश्या के द्वारा हनुमान जी के ऊपर अपमानजनक टिप्पणी करना नया नहीं है क्योंकि उसके पहले भी राजेंद्र यादव जैसे लीचड़ ने यही हरकत की थी.

अब ये समझना बड़ा दिलचस्प है कि हनुमान जी को लेकर इनके अंदर इतना गुस्सा क्यों है और उनको लेकर इनकी बेचैनी का सबब क्या है और आखिर क्यों इनको हनुमान जी में ‘मिलिटेंट हिन्दू’ दिखता है?

इनकी पीड़ा और हनुमान जी से चिढ़ की वजह है हनुमान जी का उज्जवल चरित और कृतित्व जिससे भारत का सारा हिन्दू समाज युगों-युगों से प्रेरणा पाता रहा है.

हनुमान प्रतीक है उस स्वाभिमान के जिसे बालि जैसे अन्यायी राजा के साथ रहकर सुख-भोग करने की अपेक्षा सत्यनिष्ठ सुग्रीव के साथ जंगलों में रहना पसंद था.

हनुमान प्रतीक हैं उस स्वामी-भक्ति के जिसे उस समय के सबसे बड़े साम्राज्य अयोध्या के महाराज श्रीराम का सानिध्य मिला हुआ था, फिर भी उन्होंने अपने स्वामी सुग्रीव का साथ नहीं छोड़ा था.

हनुमान प्रतीक हैं उस पौरुष का जिसने सुग्रीव की पत्नी रूमा के ऊपर बालि की कुदृष्टि को सहन नहीं किया और माँ जानकी के सम्मान रक्षण के लिये बिना किसी स्वार्थ, और प्रलोभन के निडर होकर रावण के लंका में घुस गए.

हनुमान प्रतीक हैं उस पांडित्य के जिसने अपने वाक्-चातुर्य और निडरता से श्रीराम का भी मन मोह लिया था.

हनुमान प्रतीक हैं उस सेतु के जिसने अयोध्या और किष्किन्धा यानि नगरवासियों और वनवासियों को साथ जोड़ा था.

रामायण के कथानक के आधार पर देखें तो हनुमान, सुग्रीव, तारा, अंगद, नल-नील ये सब उस समय के वनवासी और जनजाति समाज का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं.

ये उन लोगों में दिखाये गये हैं जिनकी भाषा संस्कृत नहीं थी और जो कथित उच्च वर्ण से नहीं आते थे और जो जंगलों में रहते थे.

इन वामियों, लिबरलों और छद्म सेकुलरों की हनुमान से तकलीफ की एक वजह ये भी है कि समाज के वनवासी और जनजाति समाज का प्रतिनिधि होने के बावजूद हनुमान आज हर हिन्दू घर में पूजित हैं और उनके नाम की ध्वजा हर हिन्दू छत पर लहरा रही है.

इनको हनुमान से पीड़ा इसलिये है क्योंकि हर घर में पूजित हनुमान और हनुमान के अलग-अलग पावन नामों को धारण किये हिन्दू इनके गढ़े उन तमाम झूठों का उत्तर हैं जिसे इन्होनें ब्राह्मणवाद और मनुवाद का नाम देकर गढ़ा है.

इनकी पीड़ा इसलिये भी है क्योंकि हनुमान का नाम वन में रहने वाले किसी वनवासी बंधु से लेकर भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री तक के मुख पर आदर के साथ आता है.

इनकी वेदना इसलिये भी है कि अगर हनुमान न होते तो हम इन हिन्दुओं में कथित ऊपरी जाति वालों को कितना अपमानित करते और कथित नीची जाति वालों को कितना भड़काते कि देखो तुम्हारे समाज और तुम्हारे वर्ग का कोई भी हिन्दू समाज में पूजित और सम्मानित नहीं है.

इन सबके साथ-साथ मारुति इन्द्रिय संयम के प्रतीक भी हैं यानि हनुमान यौन-उच्छृंखलता के इनके नारों के राह में रोड़े भी हैं.

एक अकेले हनुमान के कारण न तो हिन्दुओं में जाति-भेद पैदा करने की इनकी चाल कामयाब हो पा रही है, न यौन-उच्छृंखल समाज की इनकी कल्पना साकार हो रही है और न ही अराजक और परस्पर द्वेष रहने वाला समाज गढ़ने के इनके मंसूबों कामयाब हो रहे हैं.

और तो और ‘जयकारा वीरबजरंगी’ का गगनभेदी नारा भारत के हिन्दुओं में कलंक स्थलों को गिराने का हौसला भर देता है तो इनको तकलीफ हनुमान से नहीं होगी तो और किससे होगी?

हनुमान अगर इन्हें ‘मिलिटेंट हिन्दू’ का प्रतीक लगते है तो फिर हमें ये सहर्ष स्वीकार है क्योंकि हर हिन्दू हनुमान बनेगा तभी हमारी जानकी और रूमा की आबरू सुरक्षित रहेगी, तभी जातियों में आपस में प्रेम रहेगा और तभी समरस और समतामूलक समाज बनेगा.

जय हनुमान

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