हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ….

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ.

सुनो बात मेरी –
अनोखी हवा हूँ.

बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला.
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ.
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ.

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ.

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं –
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं.
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै
बसंती हवा हूँ.

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में ‘कू’,
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची –
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी.

पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!

खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी –
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी!

इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा –
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

– केदारनाथ अग्रवाल

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