आपके घिनौने सच को पहचान आपकी तरफ नहीं गए बाबा साहेब, बाकी किसी को हम जाने नहीं देंगे

मैं जब अपने समाज के वंचितों के लिये आवाज़ उठाता हूँ, उनके लिये बोलता हूँ तो मुझसे अपेक्षा की जाती है कि मैंने भी इस एकता को जमीन पर उतारने में अपना योगदान दिया होगा.

मैं पूछता हूँ कैसा योगदान?

तो वो कहते हैं, तुम कथित ऊँची जाति वाले हो तो क्यों नहीं किसी कथित छोटी जाति की लड़की से विवाह किया? विवाह के लिये अपनी जाति से ही लड़की क्यों ली?

ठीक है! मैंने अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं किया. क्यों नहीं किया और क्यों नहीं किया जा सकता था, या क्यों करना चाहिये था… इन सारे प्रश्नों को बाद में हल करेंगे.

पहले ये देखते हैं कि दलित वेदना के निराकरण का जो हल आप सुझाते हैं उस पर आप लोग कितने खरे उतरे हैं.

दलित आपके मज़हब या रिलीजन को कबूल कर ले उसके पहले ये आवश्यक है कि उनको ये बताया जाये कि जिस घर से उनके लिये दावत के न्योते आ रहे हैं उन घरों में कैसे हालात हैं और क्या वाकई हिन्दू धर्म छोड़ देने से उन्हें वो सब हको-हुकूक उस नये मज़हब में मिल जाएंगे जिनके लिये वो यहाँ से जायेंगे?

‘ईसा वालों’ की बात कभी और करूँगा, आज उनकी बात करता हूँ जिनके कलम की स्याही इस मसले पर सबसे अधिक खर्च हुई है और जिनकी आँखों में ये स्वप्न पल रहा है कि हम हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग को अपने यहाँ खींच लायेंगे.

आप हम हिंदुओं पर यह भी आरोप लगाते हैं कि हममें आपस में जाति के आधार पर बहुत भेदभाव है. आपस में खान-पान नहीं होता, आपस में शादी नहीं होती, जबकि वास्तविकता तो ये है कि ये सारी चीजें आपके समाज में मौजूद है और इससे भी कहीं ज्यादा घृणित और विकृत रुप में है.

आपके उलेमाओं द्वारा समय-समय पर दिये गये फतवे इसकी पुष्टि करते हैं, अफ़सोस है कि हमारे भीम वालों को किसी ने आज तक वो दिखाया ही नहीं है.

हममें जातिगत विभाजन अवश्य हैं परंतु जीवन-मरण, विवाह-शादी, जन्म-मृत्यु आदि मौकों पर समाज के सभी जातियों के लोग साथ में मिलकर चलते हैं. शादी-विवाह, जन्म-मरण, मुंडन हर उत्सवों पर हर जाति के जिम्में कुछ न कुछ कार्य संपादित करने की जिम्मेदारी रहती है.

मगर दीनी और फिर आलमी मसावात (भाईचारे) का दंभ भरने वाले आपके समाज में ऐसा नहीं है. आपका समाज तो जातियों और फिरकों दोनों के आधार पर भेद करता है और ये भेद इतना है कि आप मृत्यु के बाद दूसरे फिरके वाले के कफन-दफन में भी जाना पसंद नहीं करते.

एक फिरके वाला दूसरे फिरके वाले को अपना कब्रिस्तान तक नसीब होने देने को तैयार नहीं रहता और आपके यहाँ के ऊँची जाति से मतांतरित लोग छोटी जातियों से मतांतरितों को अपने जूते के तसमे के बराबर भी मान नहीं देते.

और ये दुर्लभ गुण आपने आज विकसित नहीं किये हैं बल्कि ये उनकी देन है जिनसे आप अपना झूठा रक्त संबंध जोड़े बैठे हैं. इस पर तो विस्तार से लिखूंगा ही पर फिलहाल इतना जरूर बताऊंगा कि अकबर तो आप मतांतरित भारतीयों को इतना हीन मानता था कि उसके नवरत्नों में एक भी मतांतरित भारतीय मुसलमान नहीं था अलबत्ता लगभग आधे हिन्दू थे.

खैर……

आप सब ने मज़हब तो तब्दील कर लिया पर आपके समाज में जातिगत भेद खुल कर देखने का मिलता है. हम हिंदुओं में जिस तरह चार वर्ण है उसी तरह आपमें भी शेख, पठान, सैयद आदि हैं जो उच्च वर्ग के हैं तथा धुनिया, जुलाहा, अंसारी आदि निम्न वर्ग के और हलालखोर तो और भी नीचे.

सामान्यतया कोई उच्चवर्णीय हिंदू मतांतरित होता था तो उसे सैयद की श्रेणी में रखा जाता था. हिंदुओं में जिस तरह कार्य-आधार पर जातियों का विभाजन है, आप मुसलमानों में भी ऐसा ही है.

जुलाहा, तेली, भाट, जोगी आदि जातियां हिंदुओं की तरह आप में भी पाई जाती है और उनको निम्न समझा जाता है. भारतीय मुसलमानों में उच्चवर्णीय मुसलमान निम्नवर्णीय मुसलमान स्त्री से शादी कर सकता है पर इसका विपरीत संभव नहीं है.

एक सैयद, शेख की पुत्री से तो विवाह कर लेगा पर बदले में अपनी बेटी नहीं देगा, ये ठोक-पीट कर कही गई पक्की बात है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता.

मुस्लिम लेखक एम. मुजीब ने लिखा था कि एक सैयद कोई भी काम कर लेगा पर ये कभी नहीं स्वीकार करेगा कि उसकी लड़की किसी गैर-सैयद से शादी कर ले.

महरउद्दीन खान ने 22 जनवरी 1984 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया‘ में एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था “मुसलमान भी जातीय समाज में बंटे हैं”. उसने उन्होंने लिखा था-

‘बहुत से अन्य धर्मावलंबी यही समझते हैं कि मुसलमानों में सिर्फ शिया और सुन्नी दो ही वर्ग हैं. मगर ऐसी बात नहीं है, भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमान भी हिंदुओं की भांति कई जातियों में बंटा हुआ है और यह सिर्फ सुन्नियों में ही नहीं है वरन् शियाओं में भी है.’

यहां तक कि मुसलमानों में भी जाति निर्धारण कर्म के आधार पर होता है. विवाह संबध भी जातियों के बीच ही किये जाते हैं तथा हिंदुओं की भांति एक मुसलमान भी अपनी जाति बदलने में असमर्थ है.

मुसलमानों में सामान्यतया दो जातिगत विभाजन है- अशराफ व अजलाफ. अशरफ से तात्पर्य है कुलीन वर्ग जिनमें विदेशी वंशज व उच्च वर्गीय मतांतरित हिंदू आतें हैं. अजलाफ नीच व निकृष्ट माने जाते हैं।

कहीं-कहीं एक तीसरा वर्ग अरजाल भी आता है जिन्हें अत्यंत निम्न समझा जाता है जिसके साथ कोई भी दूसरा मुसलमान मिलना-जुलना पसंद नहीं करता. उन्हें आम कब्रिस्तान में दफनाने भी नहीं दिया जाता. यानि सिर्फ जातिभेद ही नहीं मुसलमानों में छुआछूत यानि अस्पृश्यता का भी चलन है.

स्वयं मुसलमानों के द्वारा किये गये कार्य भी इस बात की पुष्टि करते हैं. छोटी जाति के मुसलमानों में पसमांदा मुस्लिम महाज, बैकबर्ड मुस्लिम मोर्चा, बैकबर्ड मुस्लिम फेडरेशन आदि कई मोर्चा हैं जो पिछड़ी जाति के मुसलमानों के अधिकारों के लिये संघर्षरत हैं, और तो और ये सारे मोर्चे अपने समाज के उच्च वर्ग के खिलाफ हैं.

1997 में बिहार में ऑल इंडिया बैकबर्ड मुस्लिम मोर्चा बना जिसने मांग की कि जातिगत आधार पर पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण दिया जाये.

आज़ादी के बाद का वो मशहूर शे’र भी आपको याद कराता हूँ जो ये बताता है कि आप भी समाज का सूत्र-संचालन अपने समाज के छोटी जाति वालों को नहीं देना चाहते.

आपके ही एक शायर ने कहा था –

‘इस्लाम की अज़मत का क्या ज़िक्र करूँ हमदम
संसद में फ़कत सैयद मस्जिद में फ़कत जुम्मन’

खैर, चलते-चलते कुछ फ़तवे गिना देता हूँ ताकि सनद रहे…

अगर हिंदू धर्म में अपनी जाति से बाहर शादी करने की मनाही है तो इस्लाम में भी तो यही है. ज्यादा नहीं तो सर सैयद अहमद अहमद, अरे वही आपके नवजागरण के पुरोधा, वो इस मामले में कितने कट्टर थे, इस पर तो अलग से एक लेख बनेगा.

खैर, मूल लेख था जाति-बिरादरी-पंथ से अलग जाकर शादी करने की बाबत, तो दो-तीन फतवे याद आ रहे हैं, चलते-चलते सुना देता हूँ. तीनों अलग-अलग फिरकों के इमामों के हैं.

वहाबियों के बारे में कई फ़तवे हैं. एक में कहा गया है, अगर बदमज़हब, बेदीन मुनाफिक अगर बीमार पड़े तो उसको पूछने न जाओ, और अगर वो मर जाये तो उसके जनाज़े पर न जाओ, उनको सलाम न करो, उनके पास न बैठो, न साथ में शादी करो और न साथ में नमाज़ पढ़ो.

ऐसा ही फ़तवा अहमदियों का भी है और वो लोग गलती से भी अपने अकीदे से बाहर निकाह नहीं करते. इमाम अहमद रज़ा खां साहब अपनी किताब ‘मलफूज़ात‘ में फरमाते हैं-

सुन्नी मर्द या औरत का शिया, वहाबी, नेचरी, कादियानी या जितने भी दीन से फिरे हुये फिरके हैं, उनकी मर्द या औरत से निकाह नहीं होगा. अगर निकाह किया तो यह निकाह न होकर जिना होगी तथा इस शादी से हुई औलाद जायज़ न होकर हरामी कहलायेगी।’ (ज़िल्द-2, सफा-105)

ठीक है हमारे यहाँ सामान्यतया जाति से बाहर शादी करने का चलन नहीं है परंतु अगर कोई जाति से बाहर शादी करता भी है तो उससे उत्पन्न औलाद के लिये ‘हरामी’ शब्द का इस्तेमाल कहीं नहीं किया जाता.

बाबा साहेब ने आपके अंदर के इस घिनौने सच को बहुत पहले पहचान लिया था इसलिये तमाम प्रलोभनों के बावजूद वो आपकी तरफ नहीं गये थे और बाकी किसी को हम जाने नहीं देंगे.

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