तेरा तुझको अर्पण, यही है समर्पण : ओशो

प्रेम में अपेक्षा तो शोषण है. पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है. इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है. पति-पत्नी लड़ते रहते हैं. उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है. कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है. कितना कम देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है. यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है.

मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूँ, जहाँ तुम परमात्मा से कुछ माँगते नहीं, कुछ भी नहीं. सिर्फ कहते हो, मुझे अंगीकार कर लो. मुझे स्वीकार कर लो. मुझे चरणों में पड़ा रहने दो. यह मेरा हृदय किसी कीमत का नहीं है, किसी काम का नहीं है, मगर चढ़ाता हूँ तुम्हारे चरणों में. और कुछ मेरे पास है भी नहीं. और चढ़ा रहा हूँ तो भी इसी भाव से चढ़ा रहा हूँ “श्त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पयेत्.” तेरी ही चीज है. तुझी को वापस लौटा रहा हूँ. मेरा इसमें कुछ है भी नहीं.

देने का सवाल भी नहीं है, देने की अकड़ भी नहीं है. मगर तुझे और तेरे चरणों में रखते ही इस हृदय को शांति मिलती है, आनंद मिलता है, रस मिलता है. जो खंड टूट गया था अपने मूल से, फिर जुड़ जाता है. जो वृक्ष उखड़ गया था जमीन से, उसको फिर जड़ें मिल जाती हैं, फिर हरा हो जाता है, फिर रसधार बहती है, फिर फूल खिलते हैं, फिर पक्षी गीत गाते है, फिर चाँद-तारों से मिलन होता हैं.

परमात्मा से प्रेम का अर्थ है कि इस समग्र अस्तित्व के साथ मैं अपने को जोड़ता हूँ. मैं इससे अलग-अलग नहीं जिऊँगा, अपने को भिन्न नहीं मानूँगा. अपने को पृथक मानकर नहीं अपनी जीवन-व्यवस्था बनाऊँगा. मैं इसके साथ एक हूँ. इसकी जो नियति है वही मेरी नियति है. मैं इस धारा के साथ बहूँगा, तैरूँगा नहीं. यह जहाँ ले जाए! यह डुबा दे तो डूब जाऊँगा. ऐसा समर्पण परमात्म प्रेम का सूत्र है. खाली मत जाना.

– ओशो

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