आप कहते रहें देशद्रोह, वे तो कर रहे हैं ‘मानवता की मदद’

Igor Gouzenko कौन था?

नाम से अंदाज़ा हुआ होगा कि रशियन था. मैंने लिखा है तो यह भी अंदाजा होगा कि कम्यूनिज़्म संबन्धित बात होगी.

जी हाँ, ये दोनों है लेकिन इनके साथ जो बात है वही सब से अधिक इंट्रेस्टिंग है. देखते हैं इस मामले में क्या हुआ था.

Igor Gouzenko कनाडा की रशियन एम्बेसी में सायफर क्लर्क था. खुफिया संदेश रशिया भेजना उसकी ड्यूटी थी.

अब हुआ कुछ यूं कि कनाडा में लोगों को जो आज़ादी थी, उसे देखकर साहब कम्यूनिज़्म और रशिया से बगावत पर उतार आए.

सोचा, यहीं सेटल हो जाएँगे… कनाडा की सरकार को बताएँगे कि तुम्हारे अंदर कहाँ कहाँ हमारे आदमी लगे हुए हैं.

तो Igor Gouzenko ने सितंबर 1945 में, द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होते ही ढेर सारा डाटा चुराया और बाहर निकला.

यहाँ पता चला तो KGB और NKVD पागलों की तरह उसे खोजने लगे.

यहाँ तक तो सब रियल लाइफ स्पाई स्टोरीज़ का प्लॉट समान होता है. अब यहाँ कहानी में ट्विस्ट आता है.

गौज़ेंकों को लगा था कि उसका स्वागत होगा लेकिन पता चला कि जिनसे संपर्क किया था, उनको ही पहचानने में भूल हुई है. NKVD वाले उसे उठाने वाले ही थे तब ऊपरवाला मेहरबान हुआ. किसी को तो कुछ समझ में आया और पुलिस ने उसे अपनी कस्टडी में लिया.

उसके बाद काफी बड़े बड़े नाम बेनकाब हुए. लेकिन कहानी का असली ट्विस्ट यहाँ है. ये लोग इतने बड़े थे कि किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि इन्होंने ऐसा क्यों किया होगा.

उनसे पूछा गया कि क्या आप ने पैसों के लिए यह काम किया तो उन्होने क्रोध से उत्तर दिया कि ऐसी बातें कर के हमारा अपमान न किया जाये, पैसा हमारे लिए मायने नहीं रखता.

तो?

उनका मानना यह था कि वह मानवता की मदद कर रहे थे यह कर के, बस… उफ़्फ़ ये देश का दक़ियानूसी कानून, उनके महान इरादों और कर्मों को देशद्रोह कहता था, क्या करें बेचारे?

लेकिन क्या वे महज एक साम्राज्यवादी शोषणकर्ता देश के कानून से बंधे थोड़े ही रहनेवाले थे? उनको तो उनका ध्येय पता था. वे मानवता की सहायता कर रहे थे, फिर कोई देशद्रोह कहे तो कहे.

इसका कारण यह था कि इनके अध्यापकों ने इनके दिमागों में अपने समाज, धर्म और संस्कारों के प्रति नफरत भर दी थी.

उनके हिसाब से ये हमेशा moral high ground पे रहते थे और बाकी तो जाहिल गंवार लोग थे जो देश, धर्म और संस्कार आदि से लिपटे रहे थे, मानसिक दृष्टि से बहुत ही पिछड़े!

ये बड़े घरों से आते थे, कॉलेज में जा रहे थे यानि बुद्धिमान भी थे ही (वहाँ वाकई कॉलेज बड़ी बात है, हर कोई नहीं पढ़ सकता कॉलेज में) तो सही होने का, और कौन सा सर्टिफिकेट बाकी था?

अपने यहाँ भी आप देखिये, कूल डूड और डूडनियों की ज़हनियत बहुत अलग नहीं होती इनसे. फिर deep state में भी इनकी अच्छी पैठ है. इसका फर्क निर्णयों पर पड़ता होगा, जो चिंता का विषय है. बाकी अपने यहाँ कुछ सीक्रेट होता भी है?

और हाँ, आप के बच्चों का क्या?

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