सेमरा को बचा लो साहेब

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले के ग्राम सेमरा की बद से बदतर स्थिति को दूर करना है तो धरातल पर अपने कदम रखने ही होंगे.

आज 40 फीसदी सेमरा गांव माँ गंगा के रौद्रावतार के कारण विलुप्त हो चुका है, वहां का विभीषक मंजर दिल को दहला देने वाला है, ग्रामीण अंचल स्तब्ध है, हताश है और असहाय भी.

शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि अब तक ना किसी रहनुमा की रहनुमाई और ना ही किसी भी प्रकार से शासन-प्रशासन स्तर पर ठोस कदम उठाया गया.

हां एक चीज जरूर दिखाई दिया 20 वर्षों से अनवरत अपने वजूद को खोते सेमरा गांव को राजनीतिक हथियार के रूप में जरूर इस्तेमाल किया गया, इन 20 वर्षों के दरम्यान कभी लोकसभा के चुनावी जुमले खाली कटोरे में भीख की तरह फेंके गये तो कभी विधानसभा के चुनाव के दौरान अप्रत्याशित विश्वास जताया गया, किन्तु शहादत की माटी सेमरा गांव के हिस्से में आया तो सिर्फ मीठे वायदे और दिलासे और हर बार की तरह एक बार फिर विश्वास या उम्मीद के सहारे संतोष करते हुए फिर अगले चुनावी जुमले का इंतेज़ार कि शायद इस बार का जुमला धरातल पर उतर जाए.

शायद लोगों को समझ जाना चाहिए था कि विश्वास के नाम पर ठगी का भारतीय राजनीति में एक बड़ा रोल या हिस्सा अनवरत काल से चला आ रहा है, तभी तो चुनावी मंच से गंगा की धारा को मोड़ने जैसी बड़ी बातें कर दी जा रही है और हम उसे सहर्ष स्वीकार भी कर लेते हैं.

आज यह एक यक्ष प्रश्न है कि आखिर क्यों 20 वर्षो से शासन प्रशासन स्तर पर बर्बाद हो रहे सेमरा गांव की बदहाली को संज्ञान में नहीं लिया जा रहा है? आखिर अब तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने क्यों इसे अपने संज्ञान में नहीं लिया?

गज़ब की विडम्बना है, शायद सरकार को हाथी पार्क बनवाना, सैफई महोत्सव और गोरखपुर महोत्सव ज्यादा प्रासंगिक लगा किसी गांव के बह जाने के एवज में. चुनाव प्रचार और विज्ञापन जैसे महत्वहीन कार्यों पर सरकार एवं अन्य राजनीतिक दल अरबों रुपये खर्च कर देते हैं किंतु लावारिस गांव की सुध लेने कोई नहीं पहुँचने वाला, आखिर इसके क्या कारण हो सकते हैं?

ग़ाज़ीपुर जिले का सेमरा-शेरपुर गांव राजनीतिक रूप से क्यों एकदम से उपेक्षित हैं? क्या स्वतंत्रता संग्राम के दौरान माँ भारती की अस्मत को बचाने में अष्ट शहीदों की शहादत का यही इनाम है?

क्या हमारे हिन्दुस्तान के लिए फक्र की बात नहीं कि अंगरेजी दासता से बाहर निकलने में सेमरा-शेरपुर ने भी अपने लहू बहाए हैं, फांसी के फंदे पर भी लटके. यदि सरकार असल राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय धरोहर के सम्मान को समझती है तो उसे यह समझना होगा कि मध्यकाल हो या औपनिवेशिक काल गाज़ीपुर की धरा ने बढ़चढ़ कर राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा में हिस्सा लिया.

वर्तमान की केंद्र सरकार का बहुमत में आने का एक मूल कारण यह भी था कि उन्होंने डिजिटल इंडिया की बात की थी कि एक ट्वीट करिये यात्रा के दौरान रेल सम्बंधित समस्त समस्या का समाधान एवं सुविधाएं उपलब्ध होंगी.

एक ट्वीट करिये अस्पताल प्रशासन की लापरवाही को सरकार तुरन्त संज्ञान में लेगी. पर क्या धरातल पर इसकी व्यवहारिकता को लेकर प्रश्न चिन्ह नहीं लग रहे है? क्योंकि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सेमरा गांव प्रकरण है, पिछले पांच दिनों में लगभग सात हजार ट्वीट किए गए, देश के एवं प्रदेश के लगभग सभी कद्दावर नेता, मंत्री, विभाग एवं अधिकारियों को लगभग हज़ारों ट्वीट किए गए और ये जो मीडिया है जिसे वर्तमान के परिवेश में कटघरे में खड़ा किया जा रहा है इसने भी अबतक अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी क्योंकि हो सकता है कि सेमरा गांव के हृदय विदारक मंजर का कवरेज उनके टी.आर.पी. में अप्रत्याशित वृद्धि करने में कारगर साबित ना हो पाए इसका ताजा उदाहरण है सलमान खान सजा प्रकरण.

बेबस लाचार और असहाय सेमरा गांव सन्निकट आ रहे बर्बादी के मंजर को नग्न आंखों से देख रहा है और सदमें में है क्योंकि उसके आंखों के सामने उसका बसा बसाया घर उजड़ने वाला है, सेमरा गांव के लोग परेशान हैं, साल भर से सरकारी पाठशालाओं में शरण लिए हुए हैं, कुछ अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं और जो सिर्फ सेमरा गांव तक ही सीमित था, जिसके घर, दुआर और खेत सबकुछ पिछली साल आई भयावह बाढ़ ने नेस्तनाबूत कर दिया आज वह सड़कों पर, फुटपाथ पर प्लास्टिक और तिरपाल का आशियाना बना कर गुजारा कर रहा है.

एक तरफ सर्दी की मार थी तो अब आग जैसी गर्मी की विभीषिका, सेमरा गांव के लोग शर्म के मारे अपने नादान बच्चों से आंखें नहीं मिला पा रहे हैं, उनके मन मे भय है कि कहीं उसका बेटा इस हृदय विदारक घटना पर उससे प्रश्न ना कर दे.

वर्तमान के सेमरा गांव की विभीषिका की शुरुआत आज से 20 वर्ष पहले ही दृष्टिगत हुई थी किन्तु उस समय भी सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया था. इसी तरह 20 वर्षों में सरकारें बनती-बिगड़ती रही और साथ ही गंभीर होती रही सेमरा की समस्या.

और अब परिणाम तो ये है कि पिछले साल जुलाई-अगस्त के माह में रौद्र रूप धारण किये हुए माँ गंगा ने सेमरा गांव के लगभग 40 फीसदी क्षेत्र को जलमग्न कर दिया जिसके कुछ दिन बाद ही भाजपा के कद्दावर नेता ने सेमरा प्रकरण में गंगा की धारा तक को मोड़ देने तक की बात कही थी किन्तु सबकुछ सिर्फ कोरा भाषण ही साबित हुआ.

वक्त की विडम्बना कहा जाए कि सेमरा गांव को बचाने के लिए पर सरकार की ओर से अगर त्वरित कार्यवाही न की गई तो शायद जल्द ही भारत के नक्शे से ये शहीदी धरती ओझल हो जाएगी और फिर इसी बर्बादी के क्रम में शेरपुर भी खड़ा दिखाई देगा.

– सुरेश राय चुन्नी

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