मृत्यु एक सीख और राष्ट्रभक्ति का राष्ट्रवाद

हर वह व्यक्ति जो चलायमान है, वह अपनी मृत्यु तक, कुछ न कुछ सीखता रहता है.

हाँ, यह अलग बात है कि एक सीमा पर पहुंच कर, वह सीखने की अपनी इच्छा को यह मान कर विराम दे देता है कि उसके द्वारा अब कुछ सीखने को बचा नहीं है या फिर वह स्वयं अपने में पूर्ण है.

कुछ जीवन में हो रही घटनाओ से सीखते हैं, कुछ अपने अग्रजों से सीखते हैं, कुछ मनीषियों और ज्ञानियों को पढ़ कर सीखते हैं और कुछ विशाल व्यक्तित्वों के जीवन से सीखते हैं.

मेरी भी सीखने की यात्रा अभी चल रही है और उम्मीद करता हूँ कि यह यात्रा मेरे जीवन के अस्त होने तक निरन्तर चलती रहेगी.

मैंने जीवन में ज़्यादातर सीख, इतिहास से ली है, शायद यही कारण है कि मुझे इतिहास में बनी लाशें हमेशा से ही आकर्षित करती रही है.

वो लाशें मुझे अक्सर यह बता जाती हैं कि, वो भी इतिहास के एक ऐसे दोराहे पर कभी जीवित थे, जहाँ चुने जाने वाले रास्ते ने आज, इतिहास को अलग मायने दे दिए हैं.

उनके द्वारा स्वेच्छा से किया गया मृत्यु का वरण, मुझे हमेशा उत्साहित कर जाता है. उनका रक्तरंजित संघर्ष करते हुए, मृत्यु के वरण का चुनाव, मुझे इस संघर्ष की सार्थकता के नए नए मायने दे जाता है.

लेकिन मुझे सबसे ज़्यादा सीख वहाँ से मिलती है जहाँ, मृत्यु का आलिंगन, किसी योजना का भाग न हो कर, एक निर्णय को लेने के कारण होता है.

इसी सन्दर्भ में जहाँ चन्द्रशेखर आज़ाद की मृत्यु नथुने फुला देती है, वहीं भगत सिंह की मृत्यु मेरे अंदर से आह का क्रंदन निकालती है.

मैं जानता हूँ कि मैं ऐसे विषय में लिख रहा हूँ जो लोगों की भावनाओं को उद्वेलित करेगी लेकिन वर्तमान और भविष्य के लिए, उससे सीखना ज़रुरी है.

1928 में जब ‘एचएसआरए’ (Hindustan Socialist Republican Association) सामने आया तो उसके दो प्रमुख स्तम्भ थे.

एक चन्द्रशेखर आज़ाद, जो स्वभाव से दूरदर्शी, व्यवहारिक और अनुशासित थे, उनके हृदय में राष्ट्रप्रेम के अलावा कोई भी भावना समाहित नहीं थी.

दूसरे भगत सिंह थे जो एक भावनात्मक युवा थे, जो सोशलिस्ट विचारधारा और बोल्शेविक क्रांति से बहुत प्रभावित थे.

भगत सिंह ने, ‘एचएसआरए’ को प्रचारित करने और विचारों को जन जन तक पहुँचाने के लिए, ‘एचएसआरए’ की केंद्रीय समिति के सामने, ‘केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली’ में धमाके वाले बम फोड़ने का प्रस्ताव रखा था.

इसको करने के पीछे उन्होंने दो उद्देश्य बताये थे, पहला तो ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट’ का विरोध करना, जिसे असेंबली पहले ही अस्वीकार कर चुकी थी लेकिन वाइसराय ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करके लागू कर दिया था.

और दूसरा बम फोड़ के गिरफ़्तारी देने का इरादा था. इस गिरफ्तारी के बाद चलने वाले मुकदमे का उपयोग अपने उद्देश्यों को जन जन पहुँचाने और ‘एचएसआरए’ के प्रचार करने के लिए था.

चन्द्रशेखर आज़ाद ने इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया था. उनका स्पष्ट मानना था कि भगत सिंह का नाम सेंडर्स की हत्या में आ चुका है और भगत सिंह को पुलिस की गिरफ्त में नहीं आना चाहिए.

भगत सिंह, आज़ाद के बाद संगठन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, उन्हें इस तरह की योजना में भाग न लेकर किसी और को तैयार करना चाहिए.

वो इस काम के लिए किसी और को चाहते थे. लेकिन भगत सिंह का आग्रह था कि सेंडर्स हत्या काण्ड में उनके नाम पर केवल संदेह है लेकिन पुलिस के पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है.

और दूसरे, अदालत में वाद और प्रतिवाद के दौरान उनसे बढ़िया कोई ब्रिटिश शासन के ज़ुल्म और ‘एचएसआरए’ उद्देश्यों के बारे में नहीं कह सकेगा.

चन्द्रशेखर आज़ाद तब भी, भगत सिंह के आग्रह से आश्वस्त नहीं हुए थे और उनके नाम पर अंतरिम विराम लगा दिया था.

इस निर्णय के बाद, एक डकैती की योजना बनाने के लिए, आज़ाद कानपुर चले गये और इसी बीच सुखदेव, भगत सिंह से मिले.

सुखदेव ने, आज़ाद के कारणों को बिना गम्भीरता से समझे, भगत सिंह को बम फोड़ने से पीछे हटने पर काफी उलाहना दी और स्वयं इस कार्य को करने के लिए तैयार हो गए. यह सब राष्ट्रप्रेम की भावना में ओतप्रोत राष्ट्रभक्त राष्ट्रभक्ति में कर रहे थे.

आज़ाद के लौटने के बाद, सुखदेव की उलाहना से आहत, भगत सिंह ने फिर अपनी बात कही और आखिर में ‘एचएसआरए’ की केंद्रीय समिति उन की बात मान गयी और तय हुआ भगत सिंह के साथ बुटकेश्वर दत्त इस काम को अंजाम देंगे.

8 अप्रैल 1929 को दोनों ने बम फोड़े और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दे दी. जब गिरफ्तार हुए, तब भगत सिंह के पास से एक पिस्तौल भी बरामद हुयी थी जिसे वो अपने साथ अंदर ले गए थे.

इस घटना के बाद ‘एचएसआरए’ के ठिकानों पर छापे पड़ने लगे और लाहौर बम फैक्ट्री पकड़े जाने पर गिरफ्तार क्रांतिकारी जयगोपाल ने पुलिस को सैंडर्स की हत्या में भगत सिंह के होने की पुष्टि कर दी.

जब बम फोड़ने के दौरान भगत सिंह से बरामद पिस्तौल की जांच की गयी तो सैंडर्स की हत्या में उस पिस्तौल के प्रयोग होने की पुष्टि के बाद ही भगत सिंह पर हत्या का मुकदमा चला था और उन्हें फांसी हुयी थी.

भगत सिंह पर यह मुकदमा जहाँ जन मानस को हिला गया, वही क्रांति का रथ भी रुक गया था. उनके इस मुकदमे और फांसी की सज़ा ने ‘एचएसआरए’ के क्रांतिकारियों में फूट डाल दी थी और साल भर के भीतर ही, यह सशस्त्र आंदोलन अपनी ही मौत मर गया था.

मेरा यह लेख किसी की महानता या फिर उनके राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाने के लिए नहीं है. मेरा सिर्फ उद्देश्य यही है कि आप अपने आप से यह प्रश्न पूछें कि –

क्या चन्द्रशेखर आज़ाद का भगत सिंह के नाम का विरोध उचित था?
क्या सुखदेव कम राष्ट्रभक्त थे?
क्या भगत सिंह अंतिम परिणामों के लिए तैयार थे?
क्या व्यक्ति की भावना, उद्देश्य से बड़ी होती है?

मेरे पास इन सबके उत्तर हैं और यह उत्तर मुझे 27 फ़रवरी 1931 को इलाहबाद में पुलिस गोलीबारी में हुयी एक मृत्यु और 23 मार्च 1931 को लाहौर में दी गयी फांसी ने दे दिए हैं.

अब आप अपने उत्तर ढूंढिए, और यहां यह याद रखियेगा कि महान लोग जहाँ अपने महान कर्मो से हमें प्रोत्साहन और ऊर्जा देते हैं, वहीं उस रास्ते में लिए गए निर्णय हमें भविष्य के लिए चेतावनी भी देते हैं.

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