विषैला वामपंथ : खेल और मैदान उनका, नियम भी उनके, आप खेले और हारे

बचपन तो खेलने के लिए ही होता है. बचपन का ऐसा कोई दिन नहीं बीता होगा, जब दो घंटे खेलने नहीं गया हूँ. घर के ठीक सामने बड़ा सा मैदान था. उसकी एक-एक घास-पत्ती कंकड़-पत्थर से रिश्ता था. उस मैदान में हर शाम दर्जनों बच्चे खेलते थे. सबसे पहले निकलने वाला अक्सर मैं ही होता … Continue reading विषैला वामपंथ : खेल और मैदान उनका, नियम भी उनके, आप खेले और हारे