विषैला वामपंथ : खेल और मैदान उनका, नियम भी उनके, आप खेले और हारे

बचपन तो खेलने के लिए ही होता है. बचपन का ऐसा कोई दिन नहीं बीता होगा, जब दो घंटे खेलने नहीं गया हूँ.

घर के ठीक सामने बड़ा सा मैदान था. उसकी एक-एक घास-पत्ती कंकड़-पत्थर से रिश्ता था. उस मैदान में हर शाम दर्जनों बच्चे खेलते थे. सबसे पहले निकलने वाला अक्सर मैं ही होता था.

उसमें एक समय में दो या तीन टीमें खेलती थीं. एक बंगाली बच्चों का अलग झुंड था. भद्रलोक थे, वे अलग फुटबॉल खेलते थे.

दो और टीमें थीं. एक क्रिकेट टीम थी जिसमें बच्चों के पास बैट, ग्लव्स, पैड था.

और एक हमारी टीम थी, जिसमें हम चार-चार आने चंदा जमा करके बॉल खरीदते थे, पटरे की बैट का जुगाड़ करते थे…

फिर 1982 में मुम्बई में वर्ल्ड कप हॉकी हुई. मैंने उसके एक एक सेकंड की कमेंट्री रेडियो में कान लगा के सुनी.

एक और दोस्त था, सुनील. उसके पिताजी हॉकी के और ही शौकीन थे. वे छुट्टी लेकर मुम्बई गए थे वर्ल्ड कप देखने. उनके साथ सुनील भी वर्ल्ड कप देख कर आया था.

वापस आकर उसे बारह रुपये की असली वाली सचमुच की हॉकी स्टिक भी मिली. उधर मैंने भी जंगल झाड़ से पुटूस के डंडे काट के अपनी हॉकी बना ली थी. तो हम लोगों ने अपनी हॉकी शुरू कर दी.

अब आगे की टीम बनाने की जरूरत थी. सबको कुछ खास रुचि नहीं थी. वे लोग क्रिकेट खेलने में रुचि लेते थे.

तो रोज़ शाम का खेल शुरू होने से पहले वोटिंग होती, पॉलिटिक्स होती… लोगों को कन्विंस करना होता… सबको हॉकी खेलने के लिए तैयार करते. उनके लिए डंडे भी हमहीं काटते.

सुनील के पास असली वाली स्टिक थी, फिर भी वह मेरे साथ जंगल झाड़ियों में जाता. हम लोग पूरी टीम के लिए पुटूस और बेहया के डंडों की स्टिक काट कर लाते थे, मैदान में चूने से डी-लाइन बनाते…शाम को मैदान में हॉकी हो, यह गरज हमारी ही थी.

धीरे धीरे हमारी हॉकी टीम खड़ी हो गई. फिर हमारी देखादेखी दूसरी टीम ने भी दो चार हॉकी स्टिक खरीद ली. बीच बीच में वे भी हॉकी खेलने लगे. पूरे शहर में और किसी मैदान में हॉकी नहीं होती थी. बस, हम कुछ लोग ही खेलते थे.

फिर एक दिन हमने दूसरी टीम से मैच लिया. क्रिकेट में उनके पास स्टार खिलाड़ी थे, पर हॉकी में हम भारी पड़े. हमने उन्हें 17-1 से हराया.

अब आगे कोई मैच खेलने के लिए वे तैयार नहीं हुए. 17 गोल से हारने के लिए कौन खेलेगा. हमने फिर भी उन्हें मनाया. नियम बदले. पेनल्टी कार्नर का नियम ही हटा दिया क्योंकि पिछले मैच में हमने 12 गोल पेनल्टी कार्नर से किये थे.

फिर अपनी टीम से दो प्लेयर उन्हें उधार दिए. फिर वे खेलने को तैयार हुए. इस बार मैच बेहतर हुआ… हम सिर्फ 9-3 से जीते…

कौन सी टीम जीत रही है इसके लिए सबसे जरूरी बात है… खेल कौन सा हो रहा है. जिसे हॉकी खेलनी है वह अपनी बॉल लाता है, मैदान सजाता है, टीम बनाता है. सिर्फ अपनी प्रैक्टिस नहीं करता, दूसरे भी खेलें इसका भी इंतज़ाम करता है… उसकी गरज है कि उसकी पसंद का खेल खेला जाए…

दंगे, फसाद, संघर्ष, मनमुटाव, झगड़े… ये वामपंथियों के खेल हैं. उन्होंने इसका मैदान सजाया है, इसी के सामान जुटाए हैं, इसी की प्रैक्टिस की है… अपनी एक टीम खड़ी की है… जिन्हें नहीं भी खेलना है उन्हें भी पकड़ पकड़ कर अपनी टीम में घुसाया है…

अब इतनी तैयारी के बाद मैच खेलें तो किससे खेलें. देश तो शांति और प्रगति का खेल खेलने के मूड में है. संघर्ष और विनाश का खेल ये अकेले कैसे खेलें? किसी से तो मैच हो…

तो ये वामपंथी दूसरी ओर की टीम भी जुटाएंगे. उनके लिए भी खेल के सामान जुटाएंगे. उन्हें अपने खिलाड़ी और कोच भी देंगे… खेल बस उनकी पसंद का होना चाहिए…

अगर आप मैदान में उतरते हैं, चाहे किसी भी टीम से उतरें… आप उनका खेल ही खेल रहे हैं… स्कोर चाहे कुछ भी हो, आप अगर उनका खेल खेल रहे हैं तो आप हार चुके हैं…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY