अपना ए.सी. तो बंद करो कॉमरेड!

फ्रिज या ए.सी. में जिस गैस को भरवाने या कॉम्प्रेसर खराब होने की बात करते हुए कभी कभी मैकेनिक आपको लम्बा बिल थमाते हैं, ये वो गैस होती है जो पृथ्वी के ओज़ोन लेयर में हो रहे छेद की सबसे बड़ी जिम्मेवार है.

हर साल गर्मी बढ़ती जा रही है, या ठण्ड के मौसम का आने-जाने का समय बदल चुका है, ये समझने के लिए अब आपको वैज्ञानिक होने की भी जरूरत नहीं.

35 वर्ष की भी उम्र जी चुके लोग आसानी से बता देंगे कि ये कोई भविष्य का खतरा नहीं, ये हो चुका है.

ऐसे दौर में जब पर्यावरण के संरक्षण के लिए उपायों की बात होनी शुरू हुई तो विकसित देशों ने बिजली, ए.सी. और फ्रिज के कम इस्तेमाल से मना करते हुए, विकासशील देशों की मदद से पल्ला झाड़ लिया था. आम सहमति नहीं बनी तो कुछ भी नहीं हो पाया.

तुलनात्मक रूप से आम हिन्दुओं का पर्यावरण पर बहुत ध्यान रहता है. दूसरे छोटे-मोटे, तुच्छ मज़हबों-रिलिजन की तरह हिन्दू पर्यावरण को मनुष्यों के उपभोग के लिए बनाई कोई बाप की जागीर नहीं समझते.

बिश्नोई राजस्थान के वो लोग होते हैं जो हिन्दुओं की प्रकृति उपासना की पद्धति को थोड़ा ज्यादा गंभीरता से लेते हैं.

ज़ाहिर है कि प्रकृति को उपभोग के लिए बना संसाधन मानते आदर्श लिबरल गिरोहों को बिश्नोई फूटी आँख नहीं सुहाते.

किसी लफंगे-शराबी किस्म के फ़िल्मी अभिनेता के ‘बीइंग ह्यूमन’ के प्रचार से कहीं ज्यादा मानवता तो एक बिश्नोई अपने जीवनकाल की रोजमर्रा की हरकतों में ही दिखा चुका होता है. प्रचार का लालच तो छोड़िये इतनी मानवता में कुछ ‘महान’ था, ये भी वो नहीं सोचता.

कपटी कॉमरेड जब बिश्नोई समुदाय पर अपने ए.सी. दफ्तरों में बैठ कर पोंगापंथी होने का अभियोग लगाते हैं तो उन्हें पर्यावरण के हित में कम से कम अपने ऑफिस का फ्रिज और ए.सी. ऑफ कर लेना चाहिए.

बाकी पैसे के ज़ोर और बड़ा नाम होने के दमख़म पर आप रेडियो, टीवी, अखबार में जो मर्जी लिख भरिये, मेरा समर्थन तो बिश्नोई को ही जाएगा!

‘बिश्नोई’ क्या हैं, जिन्हें पता नहीं है उनके लिए सलमान खान और काले हिरण का किस्सा भी है. शिकार से किसी बड़े आदमी को रोकने की हिम्मत किसी और में है क्या? रेगिस्तान को रोकने की तो सोचते भी नहीं होंगे!

राजस्थान की पारंपरिक वेशभूषा में एक पगड़ी भी होती है. वैसे तो ये पूरे ही भारत में होती है लेकिन राजस्थानी पगड़ी कुछ ज्यादा ही रंग बिरंगी होती है. दूर से ही दिख जाएगी.

ऐसे में जब आप राजस्थान से गुज़रें और कोई सफ़ेद सी पगड़ी में दिख जाए तो थोड़ा अजीब लगेगा. लेकिन जो लोग अक्सर राजस्थान से गुजरते हों, या दो-चार बार भी गए हों उन्हें पता होता है कि ये सफ़ेद वेश भूषा वाले लोग बिश्नोई हैं. ये लोग हमेशा सफ़ेद कपड़े पहने होने के लिए भी जाने जाते हैं.

इसके अलावा ये लोग वनों और प्राणियों के संरक्षण करने के लिए भी जाने जाते हैं. मेनका गाँधी और Green Peace के आने से बहुत पहले ही ये कुनबा/ कबीला जीव जंतुओं और पौधों को बचाने में लगा हुआ है.

जोधपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर एकलखोरी नाम का एक गाँव है. वहां राणाराम बिश्नोई रहते हैं. करीब पचहत्तर साल के, मज़बूत कद काठी के इस युवा को मुख्य धारा की मीडिया ने कम ही जगह दी है.

इनके इलाके को निगलने के लिए रेगिस्तान आ रहा था. शत्रु मज़बूत था रेत, गर्मी, तेज़ हवाओं के हथियारों से लैस.

इससे जा भिड़ने के लिए राणाराम बिश्नोई ने किसी सरकारी मदद की प्रतीक्षा नहीं की. उन्होंने बबूल, कीकर, नीम और बोगनवेलिया के अपने परंपरागत हथियार निकाले और रेगिस्तान का बढ़ना रोकने में जुट गए.

राणाराम बिश्नोई उसी कबीले से आते हैं जिनका जिक्र आपने ‘चिपको आन्दोलन’ में अपनी स्कूल की किताबों में पढ़ा है. पड़ोस के एक कूएँ से घड़े में पानी भर भर कर बरसों से राणाराम बिश्नोई नए पौधों को देते रहे हैं.

कुछ जंगली और कुछ पालतू जानवरों से पेड़ों को बचाने के लिए शुरू में उन्हें झाड़ों से घेरना पड़ता है. मगर राणाराम बिश्नोई बताते हैं कि इनका सबसे बड़ा दुश्मन जानवर नहीं दोपाया है. वो समझता ही नहीं कि लालच का कोई अंत नहीं है. अपने पेड़ों और जीव जंतुओं के बिना प्रकृति सबसे पहले मानव को ही लील लेगी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY