प्रेम में सब गुलमोहर नहीं होता…

एक तत्व की तरह उसका मेरी देह में होना आवश्यक था,
और आवश्यक था मेरा उसे खुद में रखना,
मगर उसके दायरे से बाहर निकल जाना!

जरूरी था वह खिला रहे मेरी पीठ पर कैक्टस की तरह,
और मैं उसकी हथेलियों में सदाबहार जैसे!

मेरा उसकी बोलियों में शामिल होना जरूरी था,
और उसका मेरे बोल हो जाना,
मगर मेरे शब्द स्वतंत्र रहें,
इतना अपेक्षित था!

उसके प्रेम ने देह के संग जब शब्द किए आतंकित!
तब मन ने जाना,
प्रेम इतना भी सहज नहीं था!

प्रेम देता है शब्दों को स्वतंत्रता,
प्रेम देता है देह को आकाश,
प्रेम में होता है अदृश्य पाश,
प्रेम नहीं बांधता कथ्यों से,

सुनते हैं प्रेम में देह की देहरी हो जाती है पराई,
मगर प्रेम की यह उन्मुक्तता किसने है दोहराई,

प्रेम में कथन धुंआ हो जाते हैं,
प्रेम में मौन पसर कर विस्तारित करता है दोनों को!

परन्तु,
प्रेम के इस पथ पर चलना कठिन बहुत है,
बहुत कठिन है प्रेम को आकाश दे पाना,
प्रेम में सब गुलमोहर नहीं होता…

– सोनाली मिश्र

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