हम अपने लिए चाहते तो सब कुछ हैं, पर उसके लिए देना कुछ भी नहीं चाहते

1996 में भोपाल से प्रकाशित हुई पत्रिका ‘विचार मीमांसा’ ने अपने प्रचण्ड राष्ट्रवादी विद्रोही तेवरों से बहुत अल्प समय में ही देश की पत्रकारिता की चाल, चरित्र, चेहरे को गहराई तक प्रभावित किया था. उस पत्रिका के सम्पादक थे विजयशंकर वाजपेयी.

मेरे सौभाग्य से एक ऐसा कालखण्ड भी आया जब मैं उनका सर्वाधिक विश्वस्त और प्रिय सहयोगी बन गया था.

उसी दौरान का एक प्रसंग मुझे इन दिनों बहुत याद आता है. स्व. विजयशंकर वाजपेयी निजी वार्तालाप में मुझसे हमेशा कहा करते थे कि झूठी शान और लफ़्फ़ाज़ियों में जीना छोड़ो और यह सच स्वीकार करो कि हम एक स्वार्थी, कायर और मुर्दा लोगों का देश/,समाज हैं.

एक दिन उनकी इस धारणा पर मेरे तीखे प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि तुमको उदाहरण देकर बताता हूं.

उन्होंने याद दिलाया था कि सरकारी दस्तावेज़ और उस समय छपी खबरें बताती हैं कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी दी जानी थी, उससे पहले की रात उस जेल के बाहर 2 से तीन लाख लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी, जो सवेरे तक खड़ी रही थी.

वाजपेयी जी का कहना था कि जेल में 2-3 सौ सिपाही रहे होंगे, यदि वो 3 लाख की भीड़ जेल पर टूट पड़ती तो भगत सिंह को फांसी नहीं हुई होती और वो बाहर आ गए होते.

लेकिन 3 लाख की वो भीड़ कायर तमाशबीनों की भीड़ थी जो पूरी रात जागकर इस बात का इन्तज़ार करती रही कि भगत सिंह को फांसी दे दी जाए, उसके बाद उनकी लाश कंधों पर लाद कर ‘भगतसिंह ज़िंदाबाद’ के नारे लगाते हुए देशभक्ति का जुलूस निकाला जाए. ऐसी सोच किसी क्रांतिकारी समाज की नहीं, बल्कि कायर समाज की ही होती है.

स्व. वाजपेयी जी द्वारा तब कही गयी यह बात मेरी सहमति असहमति से परे, मेरे लिए एक गम्भीर सवाल तो खड़ा कर ही गयी थी. उनकी उपरोक्त सोच का सन्देश यह ही था कि हम अपने लिए चाहते तो सब कुछ हैं, लेकिन उसके लिए देना कुछ भी नहीं चाहते.

स्व. वाजपेयी जी की उपरोक्त बात के अलावा अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा अन्तिम समय में की गई टिप्पणी भी कुछ ऐसा ही सन्देश छोड़ गई थी.

अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जी अपनी फांसी से कुछ दिन पहले यह लिखने को विवश हो गए थे कि मुझे और मेरे साथियों को दु:ख इस बात का नहीं है कि हमें फांसी दी जानेवाली है, क्योंकि जिस दिन हम इस राह पर निकले थे उसी दिन से यह भी जानते थे कि… हम मुट्ठी भर लोगों के संघर्ष से आज़ादी नहीं मिलनेवाली और हमारा अन्त या तो पुलिस की गोली या फिर फांसी की सज़ा से ही होगा.

लेकिन हम लोगों को यह लगता था कि हमारे बलिदान से लोगों में एक नई चेतना, नई ऊर्जा और आज़ादी के लिए लड़ने की एक नई उमंग नया जज़्बा अवश्य पैदा होगा, यही हमारी सबसे बड़ी सफलता होगी.

लेकिन आज अपनी फांसी की सज़ा से पहले मुझे इसी बात का सर्वाधिक दुःख है कि हमारी सोच गलत सिद्ध हुई. हमारी फांसी की सज़ा, हमारे क्रांतिकारी साथियों के बलिदान से देश और समाज में वैसा कोई जज़्बा पैदा होता हुआ नहीं दिखा, जैसा कि हमने सोचा था.

आजकल यह बातें मुझे अक्सर क्यों याद आती हैं…? यह भी समझाना पड़ेगा क्या…?

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