हमारी राय या तर्क कमज़ोर पड़ जाते जब हम किसी को चाहते

‘लंदन फ़िल्म फेस्टिवल’ में ‘सिमी ग्रेवाल’ से पाकिस्तानी अभिनेत्री ‘माहिरा’ खान ने कहा था कि, “यदि वे स्क्रीन पर किसी भी पुरुष सह-कलाकार को ‘आय लव यू’ बोले तो उनकी नानी को दिक्कत हो सकती हैं लेकिन, यदि वह अभिनेता ‘फवाद खान’ हैं तो उनको बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा क्योंकि, वे उसको पसंद करती हैं”.

ये एक बेहद ही महत्वपूर्ण और विचारणीय कथन जिसमें इतना गूढ़ रहस्य छिपा जो हमारी क्षुद्र मानसिकता को ज़ाहिर करता कि, यदि हम किसी को पसंद करते तो उसकी गलतियां, उसकी करतूतें, उसके गुनाह, उसकी बड़ी-से-बड़ी खामी भी हमें नजर नहीं आती बल्कि, कोई उस तरफ इशारा भी करे तो बुरा मान जाते और ज्यादा ही बहस हो तो कुतर्कों से उसे सही साबित करने में भिड़ जाते.

वो भी तब जबकि, कहीं न कहीं हमें ये अहसास होता कि हम गलत कर रहे लेकिन, अपने मन में उसके प्रति जो ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ होता उसकी वजह से हम मजबूर हो जाते कई लोग तो आंखें होते हुए भी अंधे बन जाते जिससे सच्चाई तो नहीं बदलती मगर, कहीं न कहीं हमारी ये कमी हमारे भीतर की पारदर्शिता को मलिन कर देती.

उस पर सबसे बडी बात कि, जब इसके विपरीत मामला सामने हो मतलब बात कितनी भी अच्छी हो या बंदा कितना भी शानदार पर, हमें पसंद नहीं तो मजाल जो हम मजाक में भी अच्छा बोल दे बल्कि, कुतर्कों से उसे सही साबित करने में कोइ कसर नहीं छोड़ते और यदि अगले के मन मे भी ऐसा ही एकतरफा झुकाव हो तो वो भी अपनी बात सिद्ध करने में जुटा रहता.

यानि कि, जिस तरह हम अपने गलत को अपनी कमजोरी की वजह से सही ठहराते वैसे ही सामने वाला भी करता तो हमें गलत लगता क्योंकि, उस वक़्त हमारे मन में उसके प्रति कोई लगाव या झुकाव नहीं होता पर, सामने वाले के तो होता जिसका नतीजा कि जो ज्यादा कुतर्की वो अपनी बात को सत्य बताने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा जीत ही जाता.

चाहे फिर बात ‘सलमान खान’ के मुकदमों की हो या वर्तमान हालातों की या ताजा-तरीन एस.सी./एस.टी. एक्ट में संशोधन में हुए भारत बंद या भाजपा बनाम कांग्रेस या जातिवाद या फेमिनिज़्म या पद्मावती या फिर कोई भी मसला या कोई भी बंदा हो जिसके प्रति हमारे मन में कोई पूर्वाग्रह होता या कोई छवि हमने बनाई होती तो उसके अनुरूप ही व्यवहार करते हम न कि निष्पक्ष होकर अपनी राय देते.

जिसके कारण ये मुद्दे कभी हल नहीं होते लंबे समय तक चलते और कभी-कभी तो ये भी देखने में आता कि इस बहसबाजी में हम अपने शुभचिन्तकों या मित्रों से भी दूर हो जाते पर, अकड़ या ऐंठन बनी ही रहती आखिर क्यों हम इतना दिमाग लगते गलत को सही साबित में सिर्फ इसलिए कि जिसकी हम पैरवी कर रहे वो हमें अच्छा लगता हैं क्या ये इतनी बड़ी वजह हैं जिसके लिये वास्तविकता को दरकिनार किया जा सकता हैं.

इस पहलू पर यदि गौर कर अपना मत दे तो हम चुनाव ही नहीं हर जगह उसका समर्थन कर सकते जो वाकई इसका हकदार हैं फिर चाहे उसका दल कोई भी हो इसलिए नहीं कि हम ‘कांग्रेसी’ हैं तो एक परिवार की ही पूजा करते रहे या ‘भाजपा’ के हैं तो सबको अच्छा समझते रहे और ‘आम आदमी’ हो तो उसे भगवान ही समझ ले बल्कि, हमें तो उस सॉफ्ट कॉर्नर को ढंककर अपना फैसला लेना चाहिए.

ये सिर्फ सार्वजनिक मसलों के लिए नहीं व्यक्तिगत मामलों में भी हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि, हम हमेशा सही के साथ हो न कि जिसे हम पसंद करते उसके गलत को सही ठहराने अपनी ऊर्जा व्यर्थ लगाते रहे अमूमन इस बेहद गंभीर पक्ष को हम नजरअंदाज करते जिसका खामियाज़ा ये होता कि गुनाहगार लोग अपने प्रसंशकों / अनुयाइयों के दम पर जीतते चले जाते.

ऐसे अनगिनत मामले इस फेसबुक पर भी आये दिन देखने में आते जो कहीं-न-कहीं ये सोचने पर मजबूर करते कि, लोगों की सोच का दायरा बेहद सीमित किसी को ‘फेमिनिज्म’ का पागलपन तो फिर चाहे कितनी भी गलत मुद्दा हो वे अपनी मुर्गी की ढेढ़ टांग लेकर डटे ही रहेंगे और किसी को अपने ही देश के किसी नेता से चिढ़ तो वो उसकी अच्छी बातों की भी खिलाफत करेंगे और कुछ तो ऐसे भी जिनकी राय एक जैसे मामले पर भी अलग-अलग होगी यदि वो मामला उनके किसी अपने प्रिय से जुड़ा हुआ होता हैं.

ये सभी प्रकरण मानवीय दुर्बलता या सहज मनोविज्ञान से जुड़े जो आदतन सभी में होती लेकिन, क्या ये ज़रूरी नहीं कि हम पसंद-नापसंद से उपर उठकर अपने मंतव्य को ज़ाहिर करे. जहाँ हमारी राय पंच-परमेश्वर की तरह हमारे सामने उपस्थित शख्सियत से अप्रभावित हो और ईमानदारी के साथ हम अपने बिंदुओं को पेश करें न कि नफ़रत या ईर्ष्या के भाव से किसी की धज्जियां उड़ाते फिरे क्योंकि, मुजरिम से हमें प्यार है.

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