अगर अस्पृश्यता पाप नहीं है, तो और कुछ भी पाप नहीं

आधुनिक भारत की बात करें तो अस्पृश्यता, छुआछूत आदि की समस्या के निराकरण के लिये जितने भी प्रयास हुये उसमें अग्रणी स्थानों पर कथित उच्च-जाति के लोग ही बैठे हुये हैं.

शुरुआत किससे करूँ ये समझ में नहीं आता क्योंकि एक से बढ़कर एक लोग इस सूची में हैं जो इस पाप के निस्तारण को लेकर संघर्षरत रहे.

आधुनिक काल में आर्य समाज के प्रणेता स्वामी दयानंद संभवतः पहले थे जिन्होंने गरजते हुये इस पाप के विरुद्ध मोर्चा खोला और अपने ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से एक क्रांति ला दी.

उन्होंने हमारे धर्म के खिलाफ़ दुष्प्रचार करने वाले तमाम लोगों को अपनी उन दलीलों के आधार पर चुप करा दिया जिनके अनुसार अस्पृश्यता और छुआछूत हमारे धर्म की समस्या थी.

उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये हमारा पाप है, हमारे समाज का पाप है न कि हमारे धर्म का, क्योंकि न तो हमारे ग्रंथों में और न ही हमारे पूर्वजों के किसी कृत्य में ऐसे किसी कृत्य का समर्थन मिलता है.

दयानंद के बाद बंगाल चलिये तो वहां अपने धर्म के वंचित बंधुओं की सेवा को ‘नारायण सेवा’ कहने का साहस दिखाने वाले स्वामी विवेकानंद हुये और बंगाल को इस जाति के आधार पर भेद के पाप से काफी हद तक मुक्त कर दिया.

अगली बारी महाराष्ट्र की थी जहाँ विनायक दामोदर सावरकर अपनी हिन्दू महासभा के साथ इस पाप के संपूर्ण निस्तारण का समाधान लेकर प्रस्तुत थे. सहभोज, सहशिक्षा और सबको एक जैसा सम्मान उनका मन्त्र था.

सावरकर रचित कालजयी कृति ‘मोपला’ इसी का आख्यान है. इन्हीं सावरकर के शिष्यों में नाथूराम गोडसे भी थे जिनकी जिंदगी अस्पृश्यता उन्मूलन को समर्पित था. ये दोनों ही ब्राह्मण थे.

फिर उन्नीस सौ बीस के दशक के उतरार्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना और संघ के प्रथम सरसंघचालक ने तो परिचय में जाति पूछने की आदत को ही खत्म करवा दिया.

हेडगेवार के मंदिर से जो राष्ट्र-पुजारी निकले उनकी इस बात में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं थी कि उनके किसी स्वयंसेवक बंधु की जाति क्या है.

कहने की जरूरत नहीं है कि अस्पृश्यता के पाप से ग्रस्त हिन्दू समाज के लिये यह युगांतकारी घटना थी जिसने बाबा साहेब अम्बेडकर और महात्मा गांधी को भी अचंभित कर दिया था. महात्मा गांधी तो स्वयं भी अछूतोद्धार के बहुत बड़े प्रणेता थे.

संघ की शक्ति बढ़ी तो संघ ने न केवल अपने कार्यक्षेत्र में इस समस्या के निस्तारण का प्रयास किया बल्कि हिन्दू समाज के मन में भी समरसता के भाव को जगाया.

वंचित समाज और वर्ग के महापुरुषों को यथोचित सम्मान दिलाने से लेकर धर्मगुरुओं से ये कहलवाना कि “हरेक हिन्दू सहोदर है” पूज्य गुरूजी की सफलताओं में से है.

संघ ने अपने प्रातः स्मरण सूची में बाबा साहेब, ठक्कर बापा, फुले, नारायण गुरु और बिरसा मुंडा को सम्मान दिया. बाला साहेब देवरस ने बड़ा स्पष्ट कहा कि अगर अस्पृश्यता पाप नहीं है तो और कुछ भी पाप नहीं है.

बाबा साहेब अम्बेडकर के बारे में लगभग हरेक पार्टी के नेताओं ने अनाप-शनाप और उलूल-जलूल बोला पर संघ और भाजपा अकेली ऐसी पार्टी है जिसने बाबा साहेब को अधिकतम सम्मान दिया है और कभी भी उनको लेकर कुछ अपमानजनक नहीं कहा.

गुरूजी गोलवलकर वंचितों के हक़ में खड़े होने के लिये न जाने कितने धर्माधिकारियों के कोप-भाजन बने, वहीं आज नरेंद्र मोदी देश के अकेले नेता हैं जो वास्तव में वंचित उद्धार और उनके सम्मान के लिये कटिबद्ध है, किसी दलित या किसी फ़र्ज़ी अम्बेडकरवादी से भी कहीं अधिक.

भाजपा अकेली ऐसी पार्टी है जिसने वंचित वर्ग से आने वाले व्यक्ति को अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर देश के सर्वोच्च पद पर स्थापित किया. सबसे अधिक दलित सांसद भी संभवतः इसी पार्टी से हैं.

उधर संघ अकेला ऐसा संगठन है जो वंचितों और वनवासियों के लिये सबसे अधिल सेवा-प्रकल्प चलाता है और जिसके यहाँ वंचितों का सबसे अधिक सम्मान है, पर इन सबके बावजूद हाल के भारत बंद में जो हुआ वो केवल और केवल मोदी-भाजपा और संघ के खिलाफ था.

प्रश्न है वंचित वर्ग के लिये इतनी ईमानदार कोशिश करने वाली पार्टी आज इस मसले पर खुलकर खड़े होने के बाद दबी और सहमी हुई क्यों है?

ये डरे और सहमे इसलिये हैं क्योंकि इनको इस दलित-गेम का प्लान समझ में नहीं आता. इनको ये नहीं पता कि इस नीले रंग को बनाने में सफ़ेद, हरा और लाल तीनों रंग मिलाये गये हैं.

जिन लोगों ने दलितों को सबसे अधिक भड़काया, सबसे अधिक भड़काऊ साहित्य छापे उनकी प्रशंसा में इस पार्टी के सर्वोच्च नेता ‘मन की बात’ में कसीदे पढ़ते हैं और उन्हीं लोगों से घिरे हुये हैं.

केंद्र और बाईस-बाईस राज्यों की सरकार चलाने वाले को शायद ये दिखाई नहीं देता कि भीम के पीछे मीम कहीं अधिक प्रमुखता से खड़ा है. इनको ये समझ में नहीं आता कि बेगानी शादी में दीवाना बने अब्दुल्लाह के पिछवाड़े पर कैसे लाठी बरसानी है.

इनमें ये साहस नहीं है कि जिग्नेश मेवानी के दलित आन्दोलन में सिमी संस्थापक के बेटे उमर ख़ालिद के शामिल होने के निहितार्थ तलाश सकें. इनको ये भी समझ नहीं आता कि सड़क पर नीला तांडव मचाने वाले दलित नहीं है बल्कि वोट बैंक के लालचियों के गीदड़ हैं, जिनकी कोई औकात नहीं है.

इनको ये भी नहीं पता कि ‘उदित राज’ जैसे पुराने शातिरों को अपने साथ रखकर आप अपनी ताबूत में कील का इंतजाम कर रहे हैं. और तो और इनकी सबसे बड़ी विफलता ये है कि इनके राज़ में जिग्नेश, अल्पेश और रावण जैसे न जाने कितने भीम बने मीम के सिपाही खड़े हो गये जिनके उभार को आसानी से रोका जा सकता था.

जिस दिन आप किसी देशभक्त और धर्मप्रेमी दलित बंधु से अधिक वेदना याकूब प्रेमी रोहित वेमुला के लिये दिखाने चले गये थे… औरों का तो नहीं पता, पर कम से कम मुझे उसी दिन एहसास हो गया था कि आपकी आँखों से छलक आने वाले आँसू एक दिन पूरे देश को खून के आँसू रुलायेंगे.

एक कथित सवर्ण (कथित सवर्ण इसलिये क्योंकि ये शब्द ही अनुचित है क्योंकि हर हिन्दू स-वर्ण है कोई बिना वर्ण का नहीं है) होने के नाते मुझे कम से कम अपने देश और धर्म के लिये अपना कर्तव्य पता है…

इसलिये मैं किसी प्रतिकार के समर्थन में नहीं हूँ. मरे कोई भी, मेरे लिये मरता हिन्दू ही है. किसी और ने अपनी मूर्खता में घर में आग लगा दी है तो मैं भी आग लगाने चला जाऊं, इतना नासमझ मैं नहीं हूँ.

अफ़सोस है कि हमारे कर्ता-धर्ता बने लोग इन बातों को कब समझेंगे?

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