अपने गद्दारों को पहचानिए वर्ना, आपके हाथ कल झाडू थी, आज भी है और कल भी रहेगी

आपातकाल में भड़काऊ पर्चेनुमा अखबार बांटने पर तीन बार पुलिस ने पकड़ा… दो बार तो थाने से ही छोड़ दिया पर तीसरी बार डी आई आर लगाकर भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया.

जेल के अधीक्षक व जेलर दोनों ही दलित समुदाय से थे. कैदी से संबंधित प्रपत्र भरने पर अपनी जाति का भी उल्लेख करना पड़ा तो जाति भी सार्वजानिक हो गई.

जिस सर्किल में था उसमें पांच और सवर्ण थे. हम छह को मात्र एक एल्मूनियम का मग दिया गया. उसे ही शौच में इस्तेमाल करो, उससे ही नहाओ, चाय पियो, पानी पियो जबकि अन्यों को दो दो मग मिले हुये थे.

हर हफ्ते आने वाले नाई को ताकीद थी कि ना इनके बाद काटने हैं और ना शेव बनानी है. रोज मिलने वाले खाने में भी अघोषित कटौती थी. दो रोटी मिलती थीं जबकि अन्य को पांच.

सब्जी या दाल अगर बच जाती थी तभी मिलती थी, अन्यथा पानी से या नमक से रोटी खानी पड़ती थी. हर रविवार कैदियों को स्पेशल खाना मिलता था, कभी खीर पूरी, कभी हलवा पूरी, पर हमको उस दिन जेल अस्पताल से भेजा दलिया खिचड़ी दिया जाता था.

विचाराधीन या राजनैतिक बंदियों को मशक्कत नहीं करनी होती जब तक न्यायालय बामशक्कत हुक्म ना दे. पर हम छहों को सुबह कमान (वह कैदी जो लंबी सजा काट चुके होते हैं और उनके भागने की संभावना नगण्य होती है) के साथ जेल के बगीचे, खेत व जेल कर्मियों के घर पर झाड़ू-पोंछा, बर्तन, पानी भरना जैसे कार्य करवाये जाते थे.

जेल अधीक्षक, जो दोहरे साब कहलाते थे, अमानवीय बर्ताव की शिकायत करने पर बोलते थे, “जैसा तुम्हारे बाप दादाओं ने बोया है वैसा ही तो काटोगे.”

खुलेआम जेल मैन्युअल का उल्लंघन होता था. सिर्फ ऊंची जाति और नीची जाति के चलते. शायद उस समय बी एस फोर कांशीराम का उदय भी हो चुका था और जेलर व सुपरिटेडेंट उनके परम भक्त थे और ऐसी ऐसी कहानियां सुनाते थे जो समाज में ज़हर घोलने का ही काम कर सकती थीं. उनकी हां में हां ना मिलाओ तो अगले दिन सबसे कठिन काम पर भेज दिया जाता था.

एक दोपहर कोई कैदी जेल तोड़ कर भाग गया. ऐसे में पगली घंटी बजी जो इस बात का संकेत है कि जो भी बाहर है तुरंत अपनी बैरक में पहुंच जाये. कोई भी बाहर मिलने पर, उसे जेल से फरार होने की जुगत में लगा समझ उसके ऊपर गोली भी दागी जा सकती है.

मैं उस समय बाहर ट्यूबवेल पर अकेला नहा रहा था और फिर इस घंटी का मतलब भी ना पता था. अचानक जेलर व तीन चार सिपाही आये और जेलर ने बिना किसी अल्टीमेटम के सिपाही से मस्कट बंदूक (एक ऐसी बंदूक जो अंग्रेजों के टाइम में चलती थी और उसकी मारक क्षमता बहुत कम होती थी) छीन कर मेरे ऊपर फायर झोंक दिया जो मेरे सर से थोड़ी दूरी से हो कर गुजर गया.

भागते कैदी को रोकने के लिये पैरों पर ही गोली मारने की अनुमति है, पर जातिगत विद्वेष की आग में झुलसते उस जेलर ने इसका भी ख्याल ना किया. जब तक वह दूसरी गोली भरते दो सिपाहियों ने उनकी मंशा भांप मुझे कवर कर बचाया और बैरक में ले जाकर बाहर से ताला मार दिया.

जेलर साहब एक सवर्णँ को उसके अंजाम तक पहुंचाने में विफल हो कर अधीक्षक से तन्हाई का आर्डर करा लाये और मुझे उस कोठरी में बंद करा दिया जिसमें फांसी पाये कैदी रखे जाते हैं. ना हवा ना रौशनी, वहां पांच दिन गुजारे.

वह तो भला हो इंदिरा गांधी का जिन्होंने अचानक इमरजेंसी हटा ली और हम एक सौ दस दिन बाद खुली हवा में सांस ले सके.

इसी तरह मेरे शिक्षाकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाने की वजह से क्लीनिक खोलने के लिये आवश्यक धन जुटाने को पच्चीस हजार के ऋण के लिये प्रधानमंत्री रोजगार योजना के अंतर्गत आवेदन दिया.

साक्षात्कार में एक बैंक के अधिकारी भी थे. आवेदन योजनाधिकारियों ने अनुमोदित कर दिया पर बैंक ऑफिसर ने कहा, “पच्चीस हजार तो बहुत हैं. आपको चाहिए ही क्या, बस एक पचास रुपये का स्टैथोस्कोप, दो सौ रुपए का बी पी इंस्ट्रूमेंट और एक टेबल चार चेयर आपका काम तो ढ़ाई हजार में हो जायेगा.”

और उन्होंने आवेदन अस्वीकार कर दिया. वह जनाब भी जय भीम वाले थे.

आज यह स्थिति है कि दलित बस्ती से आई किसी भी महिला मरीज़ को आते देख ही मन में विचार आता है कि यह फटाफट दिखा कर वापस शांति से चली जाये. हरसंभव उसको छू भर देखने से बचता हूं कि कहीं कल अखबार में ना छपे एक डाक्टर गिरफ्तार जिसने दलित महिला से की छेड़छाड़.

सड़क पर झाड़ू लगाने वाली को राम राम भौजी करता हूं, नाली की सफाई करने वाले के हालचाल लेता रहता हूं ताकि उनकी गुड बुक में रहूं.

जब यह एक्ट बना भी ना था, तब भी तुम नहीं बख्शते थे… आज यह एक्ट तुम्हारा सबसे बड़ा हथियार है तब भला क्यों बख्शोगे किसी को.

आरक्षण की मलाई आपके ही कुछ खास लोगों ने ही चाटी और आज भी आपका हक मार रहे हैं. लड़ना हो तो उनसे लड़ो जो एक बार आरक्षण लेकर बार बार ले रहे हैं.

आपके हाथ में झाड़ू कल भी थी, आज भी है और यदि अपने गद्दारों को ना पहचान कर राजनीतिक मोहरे बने रहेंगे तो कल भी झाड़ू ही हाथ में रहेगी.

और हां, सरकार आरक्षण खत्म नहीं कर रही, जैसा बोल कर राहुल माया जैसों ने तुमको भरमा कर भारत बंद और तोड़फोड़ करवा दी.

दरअसल राहुल का पीएम पर चल रहा खानदानी आरक्षण और मायावती की आपके वोटों की ठेकेदारी बंद हो गई है इसलिए ये दोनों बौराये घूम रहे हैं. आपका तो चालू है, तथाकथित नेताओं का बंद हुआ है तो इनके बहकावे में ना आयेंगे. अगड़े और पिछड़े सदा एक साथ रहे हैं, रह रहे हैं और रहेंगे. बांटने की कुत्सित चालों से सावधान रहिये.

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