विपक्षी गठबंधन न होने देना ही सुनिश्चित करेगा भाजपा की जीत

इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी और उन की कांग्रेस को पूरे देश में साफ़ हो जाना, कहना ठीक नहीं. उस समय भी दक्षिण भारत पूरे दमखम के साथ और महाराष्ट्र काफी मज़बूती से इंदिरा के साथ था.

1977 के लोकसभा चुनाव में 543 सीटों में से 153 सीट कांग्रेस ने जीती थीं. सहयोंगियों की सीटें मिला कर ये संख्या 189 थी.

इस सीट संख्या में आँध्रप्रदेश में इंदिरा कांग्रेस को 42 में से 41 सीट, महाराष्ट्र में 48 में से 20, और तमिलनाडु में उसकी सहयोगी एआईएडीएमके ने 19 सीटें जीती थीं.

अगर 153 सीटों वाली इंदिरा कांग्रेस को साफ़ हो जाना कहेंगे तो फिर वर्तमान 46-47 सीटों वाली कांग्रेस को क्या कहा जाएगा?

फ़ॉर्मूला वही था, जो आज मोदी के खिलाफ तैयार करने की कोशिशें हो रही हैं… इंदिरा के खिलाफ सभी दलों की खिचड़ी बनाई गई थी, यही आज हो रहा है.

आज पेंच पीएम कैंडिडेट पर फंसेगा… उस ज़माने में तो कांग्रेस के कद्दावर नेता और कभी केंद्रीय वित्त मंत्री रहे मोरारजी भाई के नाम पर मामूली खींचातानी के बाद सहमति बन गई थी.

आज विपक्ष के पास अपना कोई नेता नहीं, और भाजपा का कोई कद्दावर नेता फिलहाल मोदी से बगावत को उत्सुक नहीं.

प्रत्यक्ष तौर पर असंतुष्ट दिखने वाले लालकृष्ण आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी, उम्र के इस पड़ाव पर आकर जीवन की भयंकरतम भूल करेंगे नहीं.

बचे यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता, तो इन्हें अपनी mass अपील का बखूबी अंदाज़ है… मोदी इन्हें अगले चुनाव में टिकट दे दें यही इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी.

फिर भी भाजपा और मोदी के लिए चुनौती कम गंभीर नहीं. अगर नेता के नाम की घोषणा किए बिना सभी विपक्षी दल ‘मोदी हटाओ’ के एक सूत्रीय एजेंडा के तहत भी इकट्ठे हो गए, तो भाजपा के लिए इंदिरा कांग्रेस की 153 सीट पाना भी मुश्किल ही होगा.

चुनावों के बाद भले ही इस विपक्षी गठबंधन की सरकार जनता पार्टी की सरकार की तरह बीच रास्ते में दम तोड़ दे, या चुनाव परिणाम आते ही उनमें सर फुटौवल शुरू हो जाए, पर इतना तो तय है कि वे एक बार तो मोदी सरकार को अपदस्थ करने में सफल हो ही जाएंगे.

ऐसी स्थिति में जब भाजपा के मौजूदा सहयोगी दल नाराज़ चल रहे हैं या छोड़ कर जा चुके हैं, उसे मतदाताओं का ध्रुवीकरण रोकने के लिए दो तरफा कोशिश करनी होगी. पहली ये कि अपने बचे हुए सहयोगियों को अपने साथ मिलाए रखे, वहीं दूसरी तरफ नए सहयोगियों की तलाश करे.

निश्चित ही ये नए सहयोगी कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल तो नहीं होंगे, पर इनके अलावा अन्य सभी विकल्प भाजपा के लिए खुले हैं, चाहे वो उत्तरप्रदेश में सपा हो या बसपा, तमिलनाडु में एआईएडीएमके हो या डीएमके, आंध्रप्रदेश में टीडीपी हो या वायएसआर कांग्रेस हो, जिससे तालमेल बैठ जाए.

इसमें अगर भाजपा असफल रही तो विपक्षी गठबंधन सत्ता में आकर वह उठापटक मचाएगा कि पिछले चार सालों में हासिल की गई सारी उपलब्धियां मटियामेट हो जाएँगी, पाकिस्तान परस्त तत्वों के हौसले फिर बुलंद हो जाएंगे, देश एक बार फिर घपलों-घोटालों में डूब कर रह जाएगा.

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