विफल है लोकतंत्र, जब नागरिकों की वैध शिकायतों को कहा जाए सांप्रदायिक या दलित-विरोधी

एक मित्र ने पूछा कि “भारत ही नहीं क्या विश्व के अन्य देशों में भी लोकतंत्र का मॉडल फेल होने जा रहा है?”

सीधा सा उत्तर है : नहीं, लोकतंत्र का मॉडल फेल नहीं हो रहा है.

लेकिन फिर अभिजात्य वर्ग के लोग हाल ही में इसी लोकतंत्र की संस्थाए, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट, संसद, चुनाव आयोग की सत्यनिष्ठा पर प्रश्न क्यों उठा रहे हैं?

इस अंतर्विरोध को समझने का प्रयास करते हैं.

भारत (और विश्व के कई अन्य देशो में) ‘लिबरल’ डेमोक्रेसी या ‘सहिष्णु’ लोकतंत्र में बहुसंख्यक वर्ग के अधिकारों की बात करना गलत माना जाता है.

यद्यपि बहुसंख्यक समुदाय के लोग स्वजातीय या साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में नहीं सोचते हैं, यह बहुसंख्यक समुदाय इस बात को लेकर असहज है कि इस वर्ग के लोग अपने आसपास के क्षेत्र में प्रभावी नहीं रह गए है.

उनकी इस अनुभूति को सांप्रदायिक करार कर देने से उनमें विद्वेष एवं घुटन बढ़ जाती है.

अल्पसंख्यक समुदाय को भी शिकायतें होती है, जिनका समाधान केवल उनके समूह को केंद्र में रखकर किया जा सकता है. लेकिन बहुसंख्यक समुदाय की शिकायतें बहुत बड़े क्षेत्र में फैली होती है और दिखाई नहीं देती.

अल्पसंख्यकों को अपने समुदाय का सपोर्ट प्राप्त होता है, जो बहुसंख्यक समुदाय को उपलब्ध नहीं होता. इससे बहुसंख्यकों में नुकसान और असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है. उनकी इस असुरक्षा को लोक नीति या पब्लिक पॉलिसी बनाते समय संज्ञान में लिया जाना चाहिए.

लिबरल या ‘सहिष्णु’ ग्रुप जब बहुसंख्यक समुदाय की वैध शिकायतों को सांप्रदायिक करार देता है तो वह समाज के सांस्कृतिक विभाजन को और गहरा कर देता है.

इस विषय को एक अन्य दृष्टिकोण से भी देख सकते है. एससी-एसटी एक्ट पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले – जिसमें कोर्ट ने केवल इस एक्ट के दुरुपयोग के द्वारा अरेस्ट पर सीमाएं निर्धारित की है, ना कि रोक लगाई है – के खिलाफ सोमवार को देशव्यापी भारत बंद के दौरान कई राज्‍यों में हिंसक प्रदर्शन हुए.

3 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “हमने ऐसा नहीं कहा है कि इस अधिनियम को लागू नहीं करें… हमारी आशंका है कि किसी निर्दोष व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता नहीं ली जानी चाहिए.”

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “हम इस अधिनियम के किसी भी प्रावधान को निर्बल नहीं कर रहे हैं, हम केवल निर्दोष की रक्षा कर रहे हैं.”

क्या यह सत्य नहीं है कि दलित समुदाय के कुछ भ्रष्ट लोगों ने निर्दोष लोगों को जानबूझकर झूठे केसों में फंसाया और बिना जांच-पड़ताल के उनको जेल में रखा गया, भले ही वे बाद में बरी हो गए हों?

क्या कभी मीडिया ने ऐसे एक भी केस की जांच की है? क्या राजनीतिक दलों ने इस एक्ट के दुरुपयोग के विरूद्ध संसद में आवाज़ उठाई है?

अगर लोकतंत्र इस अन्याय को समाप्त नहीं कर सकता तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र पतन की ओर अग्रसित है?

अगर तथाकथित उच्च जाति के लोग संगठित हो जाएं या उसी लोकतंत्र के द्वारा संचालित न्यायालय उच्च जाति के लोगों को न्याय देता है और उसके विरोध में दलित समुदाय दंगे फसाद पर उतर आए तो क्या यह लोकतंत्र का हनन नहीं है?

लोकतंत्र जब नागरिकों की वैध शिकायतों को सांप्रदायिक या दलित-विरोधी करार देता है तो स्वाभाविक है कि ऐसी आवाज़ उठेगी कि लोकतंत्र का मॉडल फेल हो रहा है.

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