विषैला वामपंथ : तरबूजा चाकू पर गिर रहा है या चाकू तरबूजे पर

आज देश के सामाजिक इतिहास का एक काला दिन है. आज के दिन एक विवेकशील मनुष्य के लिए एक सम्यक संतुलित पक्ष रखना आसान नहीं है.

जरा सोचें… एक पीढ़ी पहले तक देश के कुछ कोनों में जाति के नाम पर एक वर्ग-विशेष के साथ कुछ अन्याय होता था… यह सत्य ही है.

उसके निराकरण के लिए एक कानून की आवश्यकता महसूस की ही गयी होगी. तो एक कानून बना.

वैसे किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भी अन्याय हो तो उसके निराकरण के लिए ही तो कानून नाम की चीज होती है. यही तो कानून की भूमिका है. फिर वर्ग-विशेष के प्रति विशेष अन्याय की बात सोच कर विशेष कानून का क्या अर्थ है यह अलग बहस है.

पर एक कानून बना, और मुझे नहीं लगता है देश का घोषित अन्यायी वर्ग उस अन्याय के आग्रह पर अड़ा रहा. किसी ने ऐसे किसी कानून का कोई मुखर विरोध नहीं किया.

पर उस कानून के पीछे की नीयत को देखिए. अगर एक समाज न्याय का राज्य स्थापित करना चाहता है तो उसे अन्यायी और पीड़ित के वर्ग-विभेद की आवश्यकता नहीं है.

यह कानून अन्याय को रोकने की नीयत से नहीं बनाया गया. यह कानून बिल्कुल इसी वर्ग-विभेद को स्थायी करने की नीयत से बनाया गया.

यह पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि शोषित और शोषक के वर्गों में समाज को विभाजित करके उनके बीच संघर्ष स्पॉन्सर करने के लिए किया गया था.

फिर भी भारतीय समाज मूलतः संघर्ष को पोषित करने वाला समाज नहीं है. पिछली दो पीढ़ियों में हमने इस अन्याय को छोड़ कर अपने व्यवहार और दृष्टिकोण में समूल बदलाव लाया है.

सामान्यतः ‘दलित’ कहे जाने वाले वर्ग में भी संघर्ष का नैरेटिव कुछ खास पैठ नहीं बना सका. एक बहुत ही छोटा वर्ग जो विदेशी बौद्धिक शक्तियों और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में धर्म से विमुख हो गया है, उन्हें छोड़ कर इस संघर्ष की चेष्टा को कुछ खास बल नहीं मिला.

अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की कुछ धाराओं को संशोधित करने के निर्देश दिए हैं. बात बिल्कुल तर्कसंगत लगती है. बिना प्राथमिक जाँच के किसी को अपराधी क्यों घोषित किया जाए?

पर पक्ष लेने के पहले दो मिनट रुकिए…

इस आदेश की नीयत को भी देखिए. यह आदेश भी उसी न्यायपालिका की उपज है जो हर रोज देश में अव्यवस्था और असंतोष फैलाने वाले आदेश दे रही है. यह आदेश भी किसी विसंगति को, किसी अन्याय को दूर करने के लिए नहीं दिया गया है.

पिछले चार वर्षों में देश में तोड़-फोड़ और हिंसा फैलाने में प्रयासरत शक्तियों को इसी हिंसा और तोड़फोड़ का एक और बहाना देने के लिए किया गया है.

आज जो हुआ है, इसकी तैयारी बहुत पहले की गई है. चार वर्षों में इस मेकैनिज्म को पुख्ता किया गया है. रिजर्वेशन के नाम पर जाट, गुर्जर और पटेलों की हिंसा फैलाई गई, एक फ़िल्म के नाम पर राजपूतों की हिंसा फैलाई गई.

पर देश को विभाजित करने के जिस नैरेटिव पर सबसे ज्यादा इन्वेस्टमेंट किया गया था वह था दलित-सवर्ण का विभाजन. उसका कोई पक्का बहाना मिल नहीं रहा था. तो सुप्रीम कोर्ट से यह आदेश निकलवा कर यह बहाना खड़ा किया गया.

समाज में विभाजन और संघर्ष वामपंथी कथानक की खुराक है. ये लोग खुद ही एक ओर अन्याय को बढ़ावा देते हैं, दूसरी ओर इसके प्रतिकार का झंडा खड़ा करते हैं.

ये ही कल करनी सेना बनकर राजपूत सम्मान की लड़ाई लड़ रहे थे, ये ही आज दलित अधिकार का झंडा लिए खड़े हैं. आपको ये ही लोग ब्राह्मण बन कर दलितों को गालियाँ निकालते मिलेंगे, ये ही दलित बनकर ब्राह्मणों को विदेशी और यूरेशियन बुलाते मिलेंगे.

कल का बनाया हुआ एससी/एसटी एक्ट भी अपने समय के हिसाब से एक उचित कदम हो सकता था… पर उसकी नीयत गलत थी. आज का उसमें सुझाया गया सुधार भी तर्कसंगत है… पर उसकी भी नीयत गलत है.

यह सब कुछ देश में हिंसा और उपद्रव फैलाने का बहाना भर है जिसकी तैयारी वामी और जिहादी वर्षों से कर रहे हैं. इसलिए पक्ष लेने से पहले जरा सोचिए… तरबूजा चाकू पर गिर रहा है या चाकू तरबूजे पर?

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