पद्मश्री श्यामलाल चतुर्वेदी : परीक्षा में लिखनी पड़ी थी अपनी ही कविता पर टिप्पणी

छत्तीसगढ़ से इस बार एक और विभूति श्री श्यामलाल चतुर्वेदी जी को भी ‘पद्मश्री’ मिला है.

संयोग से उनका रिश्ता भी जांजगीर-चांपा से ही है, जहां कोटमी सोनार में इनका जन्म हुआ और फ़िलहाल बिलासपुर में रहते हैं.

मुर्धन्य विद्वान, प्रख्यात साहित्यकार, प्रखर पत्रकार श्री चतुर्वेदी जी के बारे में एक दिलचस्प क़िस्सा पहले.

‘दादाजी’ चौथी पास कर ही पत्रकार बन गए थे. फिर कविता आदि भी लिखने लगे थे.

जब थोड़ा प्रसिद्ध हुए, तब लगा उन्हें कि कुछ ‘पढ़’ भी लेना चाहिए. सो प्राइवेट से पढ़ने लगे.

अधेड़ होने के बाद एम.ए. साहित्य की परीक्षा में बैठे तो ‘छात्र’ श्यामलाल जी के समक्ष प्रश्न आया कि साहित्यकार श्यामलाल चतुर्वेदी की फलानी रचना (शायद बेटी की विदाई) पर टिप्पणी लिखें.

अपनी ही कृति पर लिख कर परीक्षा पास करने वाले शायद अकेले हों दादाजी.

देहात में कहीं घूम रहे थे, तो उन्हें पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की नृशंस हत्या की ख़बर लगी.

झट उन्होंने एक कविता लिखी जिसे कालजयी ही कह सकते हैं. पंडित जी की छ्त्तीसगढ़ी रचनायें तो ख़ैर यहां जन-जन में लोकस्वर का पर्याय ही हैं.

मुझ पर हमेशा विशेष स्नेह रहा है दादाजी का. दर्जनों बार मुलाक़ात हुई होगी.

बड़प्पन के तो ख़ैर कहने ही क्या, जब भी रायपुर आना होता ख़ुद दफ़्तर आ जाते मिलने और कृतार्थ हो जाता मैं. अब उम्र ज़रा अधिक हो जाने पर प्रवास कम हो गया है इधर का.

इस बार छत्तीसगढ़ की दोनों विभूतियों को (व्हील चेयर के कारण) सम्मानित करने राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री ख़ुद उन तक पहुँचे. बधाई! सम्मानित हुआ सम्मान.

आदरणीय चतुर्वेदी जी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY