क्या विपक्ष को वाकई लगता है कि वे मोदी को ‘झूठी’ चालों से मात दे देंगे?

पिछले डेढ़ वर्ष में मैंने हमारी आँखों के सामने हो रही चौथी औद्योगिक क्रांति के बारे में कई लेख लिखे है, जो artificial Intelligence या कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति, ई-कॉमर्स इत्यादि के बारे में है.

लोगों का मानना है कि आज की यह नयी व्यवस्था knowledge-based या ज्ञान पर आधारित है.

लेकिन अगर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा अन्य राजनैतिक दलों जैसे कि कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट, आप, राजद, तृणमूल कांग्रेस इत्यादि के नेताओं की नीतियों को देखे तो ऐसा लगता है कि वे पृथ्वी में रह ही नहीं रहे हैं.

वह आज भी जनता को जाति और अल्पसंख्यक समूहों में बांटने और भड़काने का कार्य कर रहे. कभी भी ना पूरे होने वाले नारे दे रहे है. और ‘मोदी मुक्त’ भारत का सपना देख रहे हैं.

वह किसी भी तरह, कैसे भी गठबंधन कर रहे हैं और विश्वास दिला रहे हैं कि उस गठबंधन के आधार पर वह चुनाव जीत जाएंगे. अभी तक उन्होंने आज की चुनौतियों से निपटने का कोई प्लान नहीं बताया है.

मैं यह विश्लेषण करने का प्रयास करूँगा कि विपक्ष ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है.

इसके लिए हमें यह समझना होगा कि भाजपा पहले से ही राष्ट्रवाद के लिए जानी जाती थी और उस मुद्दे पर उन्हें लगभग 20 से 22 प्रतिशत वोट मिलते ही थे, चाहे जीत या लहर किसी भी गठबंधन की हो.

प्रधानमंत्री मोदी का विशिष्ट राजनैतिक योगदान यह है कि उन्होंने नोटबंदी और स्वच्छ प्रशासन से भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दे पर पैठ बना ली. आप याद कीजिये कि पिछले 30 वर्षो से विपक्ष, सत्तापक्ष को भ्रष्टाचार पर घेरता था, चाहे बोफोर्स हो, हर्षद मेहता, 2-जी, 3-जी, कॉमनवेल्थ या भ्रष्ट दामाद.

इस के अलावा, कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट इत्यादि गरीबों के हित के लिए जाने जाते थे. लेकिन पिछले चार वर्षो में प्रधानमंत्री जी ने उज्जवला, टॉयलेट, सर पे छत, रोजगार, और स्वतंत्रता की 75 वी जयंती वर्ष 2022 तक नए भारत के निर्माण – जिसमें भीषण गरीबी नहीं रहेगी – की बात करके विपक्ष से गरीबी उन्मूलन और विकास का मुद्दा भी हथिया लिया है.

यह कह कर कि “देश का गरीब अब ‘कुछ दे दो’ की मानसिकता से निकल चुका है; अब देश के गरीब भी कहने लगे हैं कि आप मुझे अवसर दीजिए और मैं मेहनत करूंगा”, प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों को एक शक्तिशाली सन्देश भेजा है कि वह उनके सम्मान की बात करते हैं, उनके सशक्तिकरण के लिए प्रयासरत है, ना कि उनको ‘भीख’ दे रहे हैं.

एक तरह से प्रधानमंत्री ने विपक्ष से उनके मुद्दे छीन लिए है. विपक्ष उनको चुनौती देने के लिए नीतियों का सहारा ना लेकर झूठ, फरेब और हिंसा से उन्हें हराने का ख्वाब देख रहा है. क्या उसे वास्तव में लगता है कि वे प्रधानमंत्री मोदी को ऐसी चालों से मात दे देंगे?

कांग्रेसियों ने तथाकथित रूप से कैंब्रिज एनालिटिका से कॉन्ट्रैक्ट करके भारत में डाटा माइनिंग के द्वारा वोटरों को प्रभावित करने का प्रयास किया. जैसा कि समाचार पत्रों में छपा है कैंब्रिज एनालिटिका ने फेक सोशल मीडिया अकाउंट के द्वारा झूठ बोलकर, दंगे फसाद करवा कर, कई पत्रकारों को पैसा देकर भाजपा के विरुद्ध झूठे लेख लिखने का भी कार्य सौंपा गया था. जिससे उन्हें यह आशा थी कि भारतीय विभाजित हो जाएंगे जिसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा.

लेकिन क्या उन्हें लगता है कि डाटा माइनिंग केवल वही कर रहे हैं?

मैंने 8 जनवरी 2018 को लिखा था कि डिजिटल युग में प्राइवेसी के मायने बदल गए हैं. सारी की सारी व्यक्तिगत सूचनाएं वेबसाइट पर उपलब्ध हैं. आज ही कार्यालय में एक प्रेजेंटेशन हुआ था जिसमें बतलाया गया कि कैसे ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप, इत्यादि से सूचनाएं एकत्र की जाती है. सोशल मीडिया पर कोई भी सूचना प्राइवेट नहीं है.

अगर विपक्ष यह सोच रहा है कि भाजपा के पास एक-एक गांव और एक-एक घर के रुझान के बारे में ठोस आंकड़े नहीं है, तो वे मूर्खो की स्वप्निल दुनिया में रह रहे हैं.

जहां तक गठबंधन की बात है, उत्तर प्रदेश में दो लोकसभा उपचुनावों में कम मतदान के मध्य जीत के कारण बसपा और सपा फूले नहीं समा रहे हैं. जमानत जब्त करवा करके भी बेगानी शादी में कांग्रेस दीवाने अब्दुल्ला की तरह नाच रही है.

लेकिन जब राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव होंगे, तब गठबंधन में जिन स्थानीय क्षत्रपों को टिकट नहीं मिलेगा वह पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर देंगे. क्या उन्हें लगता है कि उन क्षत्रपों की नाराजगी को अमित शाह यूं बेकार हो जाने देंगे?

क्या उन्होंने सोचा है कि क्यों भाजपा की दलित सांसद सावित्री बाई फुले ने केंद्र में अपनी ही सरकार के विरुद्ध आरक्षण को लेकर आलोचना शुरू कर दी है? क्या उत्तर प्रदेश में मायावती एक अन्य दलित नेत्री की प्रगति को सहन करेगी? क्या एक म्यान में दो तलवारें रह सकती हैं? आप यह मान के चलिए कि सावित्रीबाई फुले का विद्रोह कुछ समय जारी रहेगा जो बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाएगा.

ओलंपिक स्तर के खिलाड़ियों के बारे में यह कहा जाता है कि उन्हें अपनी पीक परफॉर्मेंस या सर्वोत्तम क्षमता का लेवल ओलंपिक खेलो के ठीक पहले पहुंचना चाहिए. अगर वे समय से पहले अपनी सर्वोच्च क्षमता पर पहुंच गए तो ओलंपिक आते-आते उनकी क्षमता कम हो जाएगी.

वह ओलंपिक के लिए कई वर्ष तैयारियां करते हैं, कई छोटे-मोटे टूर्नामेंट, विश्व चैंपियनशिप में भाग लेते हैं, लेकिन अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वे ओलंपिक के लिए बचा कर रखते हैं.

भाजपा ने जानबूझकर यह भ्रम पैदा किया कि वे चुनाव समय से पहले करा सकते हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि विपक्षियों को अपनी पीक परफॉर्मेंस पर अभी आना पड़ गया. लेकिन कितने समय तक वह ऐसे प्रदर्शन हिंसा और झूठ के सहारे करते रहेंगे?

जब प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपना वार्म अप गेम मई से शुरू करेंगे तो चुनाव के ओलंपिक आने तक वह अपनी पीक परफॉर्मेंस पर पहुंच जाएंगे. आप उन की रणनीति, सूझबूझ, और क्षमता पर भरोसा रखें.

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