प्रधान सेवकजी, आपने ही कहा था – “कुछ लोगों को डरना होगा!”

“कुछ लोगों को डरना होगा!” ऐसा एक पुराने इंटरव्यू में प्रधान सेवक महोदय ने कहा था. मेरा विश्वास है कि आज की हिंसा में जिन लोगों की मौत हो गई उनके परिवार वाले, उनके करीबी जरूर डर गए होंगे.

डर तो वो बच्ची भी गई होगी, जिसका सर मुजफ्फरपुर में तथाकथित ‘आन्दोलनकारियों’ ने फोड़ दिया और उसकी माँ भी तो आँचल से अपनी बच्ची का बहता खून रोकने की कोशिश कर रही थी.

मुझे नहीं पता कि इंटरव्यू में जिन लोगों के डरने की बात की गई थी ये सब उनमें शामिल थे या नहीं थे.

डरे हुए वैसे पक्षकार भी होंगे, क्योंकि जैसे उन्होंने ‘जाट गुंडे’, या फिर ‘राजपूत गुंडे’ चीख चीख कर कहा था वैसे इस बार वो किसी को ‘गुंडा’ कहते नजर नहीं आये.

सिर्फ एक एफ़.आई.आर. पर अरेस्ट हो जाने की बात हमारी ही तरह उन्हें भी डराती ही होगी. इसलिए जैसे हम ‘गुंडा’ नहीं कह रहे, पक्षकार भी नहीं कहेंगे.

जब ये सारा शोर-शराबा चल रहा था तो सबका ध्यान इधर-उधर देखकर एक बड़े नेताजी ने माफ़ी भी मांग ली है. वो नयी वाली राजनीति सिखाने आये थे.

उनके “सबूत दिखाओ जी!”, “कैसे मान लें जी!”, जैसे जुमलों से सीखते हुए उनके विरोधियों ने भी पंद्रह लाख वाले बयान का वीडियो माँगना शुरू कर दिया है. वो विडियो शायद मिला नहीं इसलिए अब उस जुमले की बात नहीं होती, मगर एक दूसरा वीडियो हमने देखा है.

विदेशों का ये वीडियो ढूंढना इसलिए भी आसान होता है क्योंकि एक बड़े पक्षकार इसके शूट होने से ठीक पहले वहां मौजूद आम लोगों से धक्का मुक्की करते हुए पाए गए थे. इसमें विदेशी, भारतीय मूल के और प्रवासी भारतीय लोगों के सामने कई कानूनों के ख़त्म होने का जिक्र है. कई कानून अप्रासंगिक हो चले थे और कई समय के साथ सुधारे नहीं गए थे, इसलिए उन्हें बदला गया, ऐसा कहा गया था.

जिक्र ये भी था कि और कानून भी बदले जायेंगे. मेरा विश्वास है कि उत्पीड़न से सम्बंधित कानून शायद ऐसे नहीं थे कि उन्हें बदले जाने की जरूरत पड़ती, इसलिए वो बदले नहीं गए.

मेरे घर के सामने की सड़क में कोई सुधार दिखता नहीं, बिहार में और कोई बड़ी सड़कें बनकर तैयार हुई हों तो वो भी नहीं सुना. पटना के स्मार्ट सिटी बनने की भी चर्चा थी, मगर ऐसा कुछ हुआ हो तो किसी ने हमें बताया नहीं.

जो गाँव सांसदों ने गोद ले लिए थे उनका क्या विकास हुआ होगा ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. गंगा भी यहाँ पास से ही बहती है, उसकी सफाई पर भी हम कुछ कहना नहीं चाहते.

विश्वविद्यालय लाल से भगवा होना तो छोड़िये, पाठ्यक्रम में बदलावों की भी सुगबुगाहट नहीं.

बिहार में रहने का एक नुकसान ये भी है कि बिहार वाले बाहर बहुत रहते हैं. ऐसे में बाहर वाले तो छोड़िये, अप्रवासी बिहारी भी हमें चिढ़ा जाते हैं. जब वो शाम ढले “बिहार में बहार है” का मेसेज व्हाट्स एप्प करते हैं तो साथ में कौन सी तस्वीरें होती हैं, उनकी बात ना ही की जाए तो बेहतर.

ऐसे में हम उन्हें अंग्रेजी वाली कहावत, हर कुत्ते का दिन आता है, कहकर, झिड़क देते हैं. अंग्रेजी कहावत सुनकर डर गए बिहारी जब चुप होते हैं तो हमें हिंदी वाली कुत्ते की कहावत भी याद आ जाती है.

जो घर बारे आपना की तर्ज पर कहीं हमारी हालत उन कुत्तों जैसी तो नहीं हो गए जो घर बार चुका और घाट उनका हुआ ही नहीं? थोड़ा जिक्र ऐसे हाल में विकल्प का भी होता ही है और कोई न कोई पूछ लेता है कि विकल्प क्या है?

जब पिछली बार दिल्ली के विधानसभा चुनाव हुए थे तो अभी वाले मुख्यमंत्री का विकल्प किसने सोचा था?

2004 के लोकसभा चुनावों के बाद जब सुषमा स्वराज सर मुंडाने को तैयार हुई थीं तो सरदार मनमोहन सिंह विकल्प होंगे ये किसने सोचा था?

कांग्रेसी राजमाता ने या उनके पति ने खुद को कब विकल्प के तौर पर देखा था? शायद राजनीति में क्रिकेट की आखिरी गेंद जैसी ही अनिश्चितता की स्थिति रहती है.

जो निश्चित तौर पर जो हमें पता है, वो ये है कि पिछली बार का मैनिफेस्टो अभी भी मौजूद है और उसकी लिखी बातों पर अमल का वक्त पूरा हो गया है.

‘आखिरी साल राजनीति करेंगे’ का वीडियो भी ढूंढना मुश्किल नहीं होगा क्योंकि वो संसद में ही कहा था. हमें विश्वास है कि अगली बार जब आप आयेंगे तो कम से कम अपना मैनिफेस्टो जरूर पढ़कर आयेंगे. आपके ‘सबका साथ सबका विकास’ वाले “सब” में हमारा नाम है या नहीं, हम ये जरूर जानना चाहेंगे.

बाकी ‘कुछ लोगों को डरना चाहिए’ से याद आता है प्रधान सेवक महोदय कि इस सवाल से आपको भी डरना चाहिए. डरना उतनी बुरी बात भी नहीं, डर सभी को लगता है!

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