दर्द और गुस्से को बचाकर रखिये, एक ही निशाने की ज़द में हैं हम सब

विनायक दामोदर सावरकर रचित उपन्यास ‘मोपला’ मालाबार प्रदेश की एक छोटी सी बस्ती कुट्टम पर केंद्रित है जहाँ नम्बुदरी (ब्राहमण), नायर (क्षत्रिय) और थिय्या (कथित अछूत) नाम की तीन जातियाँ रहती थी.

थिय्या को चूँकि अश्पृश्य लोगों में गिना जाता था इसलिए उनकी बस्तियाँ ग्राम के बाहरी भाग में थी. समाज में अश्पृश्यता का चलन था.

अश्पृश्यता के यही अभिशाप दावतियों और मिशनरियों के लिये मौके होते हैं इसलिये आये दिन वो लोग वहां की थिय्या बस्ती में दीन की दावत देने वाले चले आते थे.

इसी क्रम में एक दिन एक मौलवी भी वहां उपस्थित था और लगातार थिय्या युवकों को कुछ-कुछ समझाता जा रहा था.

उसकी तकरीरों से ऊब कर उन थिय्यों के बीच से कम्बु नाम के व्यक्ति ने तर्कपूर्ण तथ्यों के साथ मौलवी के तमाम तर्कों को खारिज कर दिया और उसके क़यामत, पुनरूत्थान, हिसाब-किताब, ज़ज़ा-सज़ा और इल्हामी कलाम के पक्ष में दिये तमाम तर्कों की धज्जियाँ उड़ा दी.

उसके तर्कों से परेशान मौलवी ने जब उससे ये कहा कि तुम हिन्दुओं के सारे साधु-संत नरक की अग्नि में जल रहे हैं तो कम्बु ने ये कहते हुये उसके तन-बदन में आग लगा दी कि –

“मौलवी, जिस नरक में ऐसे साधु -संत रहतें हैं, जहाँ मेरे पूर्वजों की पीढ़ियों की पीढ़ियाँ निवास कर रही है, वही मेरा स्वर्ग है. मैं हिन्दू ही रहूँगा. इस धर्म का परित्याग कर मैं स्वर्ग-प्राप्ति का इच्छुक नहीं हूँ. धर्मराज की कथा आज भी मेरी दादी मुझे सुनाती है कि उन्होंने अपने पांच भाईयों को छोड़कर स्वर्ग में जाने के स्थान पर नरक में अपने जाति-बांधवों के साथ रहना ही श्रेयस्कर समझा और अपने धर्मबल से अपने भाइयों को मुक्त कराया. मैं उस धर्मराज के भक्तों का एक नितांत ही कनिष्ठ भक्त हूँ और मैं उसी धर्मराज के तथा श्रीकृष्ण के पावन हिन्दू धर्म का अनुगामी रहूँगा”

उसके ये कहते-कहते ही अचानक उस थिय्या नेता कम्बु को अपने बस्ती से एक शोर सुनाई दिया, “कम्बु…. कम्बु तेरा पुत्र पेड़ से गिर पड़ा है.”

कम्बु दौड़ता हुआ वहां पहुंचा, उसका इकलौता पुत्र मरा तो नहीं था पर अचेत पड़ा था. थिय्यों की बस्ती के जानकारों ने प्राथमिक उपचार तो किया पर बालक का रक्तस्राव थमने का नाम नहीं ले रहा था.

तभी किसी बुगुर्ज थिय्या ने सलाह दी कि नायर बस्ती से वैद्य कृष्णा नायर को कोई बुला लाये तो शायद बालक की जान बच सकती है.

सुनते ही दामू नाम का एक थिय्या युवक और उस अचेत बालक के पिता कम्बु तीर की गति से वैद्य कृष्णा नायर को बुलाने दौड़े. वो दावत देने वाला मौलवी जो खामोशी से पूरे घटनाक्रम को देख रहा था, वो भी दामू और कम्बू के पीछे दौड़ा.

दोनों थिय्या युवक गाँव के एक तालाब के किनारे से दौड़ते हुए जा रहे थे तभी तालाब पर पानी भर लोग चिल्लाने लगे- “थिय्या…थिय्या… दूर हटो.” क्योंकि मालाबार में उस समय यह कुरीति व्याप्त थी कि वहां के सवर्ण मानते थे कि तालाब के पास से भी कोई थिय्या गुजरा तो पूरा तालाब अशुद्ध हो जाएगा.

दामू और कम्बू के भागते कदम रुक गये और मौलवी के होंठों पर कुटिल मुस्कान खिल गई. कम्बू विनम्र शब्दों में बोला, महाराज, मेरा इकलौता पुत्र वृक्ष से गिर गया है, उसके प्राण संकट में है, हम कृष्णा नायर वैद्यजी को बुलाने जा रहे हैं और अगर इस रास्ते से नहीं गये तो दो मील अधिक का चक्कर काटना पड़ेगा और उतनी देर में मेरे पुत्र का शरीरांत हो जाएगा.

कम्बु के इस नम्र निवेदन पर भी उन सवर्णों का दिल नहीं पसीजा और वो उसे तालाब के पास वाले रास्ते से जाने देने को तैयार नहीं हुए.

ये सब चल ही रहा था तभी उस मौलवी ने आगे आकर उन विरोध करने वालों से कहा, “मैं इस तालाब वाले रास्ते से जा सकता हूँ?”

वहां खड़े सवर्णों ने आह्लादित होते हुए कहा, “अरे मौलाना साहेब कैसी बात कर रहे हैं… आप सहर्ष इस रास्ते से जायें, यह प्रतिबंध तो इन अस्पृश्य थिय्यों के लिये है.”

मौलवी विजयी मुस्कान लिये कम्बु और दामू के पास आया और कहा, “हाय-हाय देखा ये काफिर हिन्दू कितने निर्दयी हैं. कम्बु थोड़ी देर पहले तूने जो मेरा निरादर किया था उसी का पाप है जो तेरे पुत्र को भुगतना पड़ रहा है. मैं मुस्लिम हूँ पर मैं तो उन सवर्णों के तालाब वाले रास्ते से जा सकता हूँ पर तू हिन्दू होते हुए भी उधर से नहीं जा सकता क्योंकि तू अछूत है. एक बार तू अल्लाह के दीन में आ जा फिर देख मैं तुझे इसी तालाब से लेकर इन सवर्णों के सामने से जाता हूँ कि नहीं… इतना ही क्यों… तू मेरे दीन में आ फिर इन्हीं काफिरों की औरतों भी तुझे भोगने का लिए दूंगा.”

कम्बु ने कहा, “मौलाना… भले मेरे पुत्र की मृत्यु हो जाए पर मैं मुसलमान नहीं बनूँगा. अपने हिन्दू जाति के सवर्णों की इस निर्दयता का किस तरह प्रतिशोध लेना है यह हमारे घर के विषय है, तुम इससे दूर ही रहो.”

कम्बू की जाति के एक युवक “दामू” को उस मौलवी की तक़रीर ने प्रभावित कर दिया था, तो इस सारे घटनाक्रम के बाद वो कम्बू से कह उठा, “दादा! मुझे क्षमा करो, यह मौलवी जो कह रहा था वह सत्य ही है.”

उसके ऐसा कहने के बाद कम्बू जो उत्तर उसे देता है वो स्वर्णाक्षरों में उकेर कर रखने लायक है. उस मौलवी के तमाम तर्कों से प्रभावित उस थिय्या युवक के सारे सवालों का जवाब देते हुए उस थिय्या युवक के अश्पृश्यता वाले प्रश्न पर कम्बू उससे कहता है-

“तू कहता है कि हमसे हिन्दू धर्म अन्याय करता है पर हम अस्पृश्यों पर जो अत्याचार होता है वो हिन्दू धर्म नहीं करता अपितु यह अत्याचार हिन्दू समाज द्वारा किया जाता है, किन्तु थोड़ा सा विचार करें तो यह बात भी भूल ही प्रतीत होती है. कारण हम अस्पृश्य भी तो हिन्दू समाज के अंतर्गत ही हैं.

अतः यह कहना ही उचित होगा कि अपने-आपको स्पृश्य समझने वाले कतिपय व्यक्ति-हम अस्पृश्य समझे जाने वाले लोगों पर कई दृष्टियों से अत्याचार करते हैं, ऐसा कहना ही न्यायसंगत होगा. और एक क्षण के लिये इस बात पर भी विचार कर कि हिन्दू समाज में अस्पृश्यता का यह पाप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ही नहीं करते अपितु हम थिय्या भी तो इस पाप से मुक्त होने का दावा नहीं कर सकते.

जब नायर हमसे यह कह सकते हैं कि छुओ मत तो हम महारों को इतना क्रोध आता है- यह है भी उचित. किन्तु महार थिय्या भी तो वादकों को अपनी पंक्ति व समाज में मिलाना अनिष्टकारक मानते हैं. वो भी तो उसे अपने पास से गुजरने नहीं देते और उन्हें जब हम अपने से अलग करते हैं तो उन्हें भी बुरा ही लगता होगा.

अतः इस पाप का प्रक्षालन तो हम सब हिन्दुओं को मिलकर करना होगा और उस पाप के प्रक्षालन का मार्ग मुसलमान हो जाना है क्या? तेरी बुद्धि यह स्वीकार करती है? एक बार नहीं हज़ार बार यह बात कही जा सकती है कि छुआछूत ने ही हिन्दुओं में अस्पृश्यता का प्रसार किया है, किन्तु जिसे मुसलमान ईश्वरीय आज्ञा समझते हैं क्या वह भयंकर अस्पृश्यता नहीं है?

कारण यह है कि 20 करोड़ मुसलमान को छोड़कर जो अवशिष्ट सैकड़ों कोटि लोग इस धरती पर हैं, मुसलमानी मत के अनुसार क्या वो अस्पृश्यों से अधिक अस्पृश्य नहीं हैं? उनका उद्धार नहीं हो सकता, उनकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है, उनके हजारों पूर्वज साधु, संत सभी नरक में गये हैं और जायेंगे.

हम हिन्दू अस्पृश्यों को तो अपने पुनीत आचरण द्वारा पुनः जन्म ग्रहण करने पर स्पृश्य होने की आशा है, परन्तु मुसलमानी मत के अनुसार तो जो अस्पृश्य है और जिनकी संख्या सैकड़ों-करोड़ों है, उनका पुनर्जन्म ही नहीं होगा और वो नरक में सड़ेंगे-गलेंगे. अस्पृश्यता त्याज्य है किंतु मुसलमानों की इस भयानक अस्पृश्यता की तुलना में क्या हिन्दुओं में विद्यमान अस्पृश्यता वरदान ही नहीं है?”

कम्बू के इन तर्कों को सुनकर वो थिय्या युवक नतमस्तक हो गया और उसके पैरों पर गिर पड़ा और उससे कहा, “मैं अब अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू जाति में प्रचलित अस्पृश्यता सरीखी रूढ़ियों को समाप्त करने में लगा दूँगा और जिस प्रकार भी आप कहेंगे, उसी प्रकार मैं हिन्दू जाति की सेवा करने के लिये सिद्ध हूँ”.

कम्बू बनकर समाज और जाति का मार्गदर्शन करेगा वो हरेक हमारे लिये ब्राह्मण है और दामू बनकर धर्मरक्षा की सौगंध उठाने वाले हरेक क्षत्रिय है, भले ही उसकी जाति कोई भी हो.

यही हिन्दू दृष्टि है जो हमको मर्यादा पुरुषोत्तम राम से लेकर श्रीकृष्ण तक ने सिखाई है. आज किसी ‘एक्ट’ की आड़ में देश के अंदर गृह-युद्ध जैसा माहौल पैदा करने वाले लोग क्यों नहीं कम्बू और दामू बनकर अपने अंदर देखते हैं और अपना मूल्यांकन करते हैं कि ऐसे तमाम एक्ट से समाज में द्वेष और फैला है या कम हुआ है?

इन एक्ट के चलते दूरियाँ बढ़ी हैं या कम हुई हैं? आप उस एक्ट के दायरे के अंदर आने वाली जातियों के साथ भी क्या वही नहीं करते जिनसे आप खुद को पीड़ित बताते हैं? अगर हाँ, तो फिर ऐसा ही सख्त एक्ट आपके लिये भी क्यों न लागू किया जाये?

जहाँ तक सम्मान और श्रेष्ठता की बात है तो हमने क्या बढ़ई जाति के रैक्य को ऋषि नहीं माना? क्या हमने नारायण गुरु को सम्मान नहीं दिया? क्या रैदास हमसे पूजित नहीं हैं?

ये ठीक है कि कम्बू और दामू, सावरकर के उपन्यास के काल्पनिक चरित्र मात्र हैं पर क्या कई कम्बू और दामू उस मालाबार प्रदेश समेत देश के हर भाग में नहीं रहे होंगे जिन्होंने समय-समय पर हिन्दू धर्म की रक्षा की है? और ऐसा करने वालों को क्या हिन्दू समाज ने यथोचित सम्मान नहीं दिया है?

झगड़े हमारे घर के होंगे पर उस झगड़े में क्या कोई अपने ही घर को जलाता है? जिन कथित सवर्णों के खिलाफ आज आप सड़कों पर हैं तो ये याद रखिये कि दुनिया में उन सवर्ण हिन्दुओं के रहने के लिये अगर केवल एक देश ‘भारत’ है तो यही आपके साथ भी है.

और इस ग़लतफ़हमी को भी दूर कर लीजिये कि आप चूँकि सवर्ण नहीं है इसलिये जातिगत टीका-टिप्पणी का ज़हर आपको पीना पड़ता है. यही विष-वमन एक दूसरे के खिलाफ कथित ब्राह्मण-ठाकुर और वैश्य भी करते हैं और कहीं अधिक वीभत्स रूपों में.

मैं भूमिहार हूँ और सरकारी दस्तावेजों में मेरी जाति ‘भूमिहार-ब्राह्मण’ रूप में दर्ज है, बिहार में हमें पूजा-पाठ और कर्मकांड कराने का अधिकार भी प्राप्त है पर मेरी जाति को लेकर जो-जो कहा जाता है वो आपके दर्द से अधिक दर्द देने वाला है पर मैं कभी उसके चलते अपने ही देश को जलाने नहीं निकल जाता, कभी अपने लोगों पर गोलियाँ नहीं चलाने जाता, कभी अपने लोगों की गाड़ियों और घरों को आग के हवाले नहीं करता क्योंकि मुझे पता है कि ये दर्द अगर है तो हम सबका है और इसका निस्तारण भी हम सबको मिलकर करना है और उस छत्र की रक्षा करनी है जिसके तले हम सब सुरक्षित रहेंगें. उस छत्र का नाम ‘हिन्दू’ है.

दर्द और गुस्से को बचाकर रखिये… एक ही निशाने की ज़द में हम सब हैं और हमको मारकर आप अपनी तरफ आ रही गोली का रास्ता और आसान बना रहे हैं. संभल जाइए तो बेहतर है वर्ना भारत-विभाजन से लेकर जोगेंद्र नाथ मंडल तक की तारीख बहुत पुरानी नहीं है और उस पर अभी धूल भी नहीं जमी है.

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