ये मुहावरा उन लोगों ने नहीं पढ़ा, क्योंकि शायद किसी ब्राह्मण ने कहा है

मुझे कभी आरक्षण से समस्या नहीं रही. हालांकि 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा लागू की गईं मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के विरोध में मैंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था.

AMCF के बैनर तले दिल्ली विश्वविद्यालय के मॉरिस नगर चौक का नाम क्रांति चौक रखा गया था.

हम गिरफ्तार भी हुए थे और क्रांति चौक के शिलापट्ट पर कई वर्षों तक नाम लिखा हुआ था जो कि 2002 के आस पास उखाड़ दिया गया.

उस समय मन में कहीं सरकारी नौकरी की ही चाह रही होगी लेकिन वो कभी की नहीं, कोशिश भी नहीं की… ये बात अलग है कि आज किसी भी सरकारी नौकरी के मुकाबले ज्यादा अच्छी पोज़िशन में हूँ.

बात तब की है जब 2007 में उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले थे और चुनावी टिकट की बोली और खरीद 2006 से चालू हो गई थी…

पहचान के कुछ लोग लखनऊ आते थे तो हम भी नेता नगरी खूब जाते थे बसपा के टिकट का दाम निगोशिएट करने…

तब पहली बार पता चला कि टिकट बिकता है (जात का वोट बिकता है)… हमारे पहचान वाले अपनी सीट के लिए एक करोड़ तक देने को तैयार थे लेकिन टिकट 2 करोड़ में बिका और इनको टिकट नहीं मिला…

टिकट निगोशिएट कराने में यूपी सरकार का बहुत बड़ा महकमा जिसके मुखिया और उनके स्टाफ अफसर दलित थे, बड़ी भूमिका निभाता था… पूरा दफ्तर बसपा का negotiation कार्यालय बना हुआ था…

वहीं पता चला कि मुखिया के गाँव में महलनुमा घर बना था… लखनऊ में भी आलीशान मकान है… 5 सदस्यों पर 5 गाड़ियां… घर पर 4-5 नौकर जो उनके स्वजातीय थे और उनके गाँव के ही थे…

सब इस उम्मीद में भी थे कि साहब सरकार आने पर नौकरी भी दिलवा देंगे… बसपा सरकार आई… साहब की तूती बोलती थी सरकार में, साहब दलितों के हालात पर खूब बोलते थे…

नौकरी भी निकली… साहब का बेटा, बेटी, बहू सब सेट हो गए मज़े में… गाँव के उनके स्वजातीय लड़के डिग्री लेकर अभी भी साहब की गाड़ियों को फटका मारना, घर में झाड़ू-पोंछा, बच्चों को स्कूल छोड़ना, गाँव के घर की देखभाल और खेतों में काम कर रहे हैं…

साथ में ब्राह्मणों द्वारा किये जा रहे अत्याचार पर खूब उछालते हैं, नारे लगाते हैं और बोलते हैं कि सवर्णों ने उनका हक़ मारा है… लेकिन किसी की ओर एक ऊँगली उठाने पर बाकी उँगलियाँ अपने ओर उठती हैं, ये उन लोगों ने नहीं पढ़ा है क्योंकि ये मुहावरा शायद किसी ब्राह्मण ने कहा है…

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