हनुमान के चरित्र की आराधना ही करेगी प्रकाश स्तम्भ का काम

जब भारत का भाग्य-सूर्य अस्ताचलगामी हुआ तो हमारे बीच कुछ ऐसे लोग पैदा हो गये जिन्होंने भारत के जन-जन की आस्था के केंद्र श्रीराम को निशाने पर ले लिया और कहने लगे कि हनुमान, अंगद और सुग्रीव वगैरह तो यहाँ के मूल-निवासी थे जिन्हें राम ने अपना सेवक और गुलाम बनाकर इस्तेमाल किया.

क्या ये सच है? क्या सचमुच राम ने इन सबको सेवक रूप में इस्तेमाल किया और सीता माता को रावण के यहाँ से छुड़ाने के लिये उन सबको युद्ध में झोंक दिया? क्या राम और हनुमान का संबंध इतना ही है?

इन सब शंकाओं के शमन का आधार रामायण, तुलसीकृत रामचरितमानस समेत वो तमाम रामायणें हैं जिसमें राम और हनुमान का वृत्त किसी न किसी रूप में आया है, जो स्पष्ट करता है कि अपने सहयोगियों के प्रति श्रीराम का भाव मालिक और सेवक का नहीं था बल्कि राम सबके गुणों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते थे.

इस पर भी कुछ नीच बुद्धि कहते हैं कि हनुमान के प्रति राम का व्यवहार मालिक और सेवक का था और चूँकि सेवक ने मालिक का काम किया इसलिये राम ने उनकी प्रशंसा की होगी.

पर इन निर्बुद्धियों ने ठीक से रामायण नहीं पढ़ी. राम के लिये हनुमान सेवक नहीं थे, राम ने कई बार हनुमान को अपना पुत्र बताया है. वो हनुमान से कहते हैं, “सुन सुत तोहि उरिन मैं नाहीं” यानि हे पुत्र! सुन मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता.

ये आरोप भी गलत है कि चूँकि हनुमान ने उनका काम किया था इसलिये राम उनकी प्रशंसा करते थे. किष्किंधा में जब राम और हनुमान की पहली भेंट हुई थी तब राम ने हनुमान के बारे में लक्ष्मण से जो कहा वो स्पष्ट बताता है कि राम हनुमान का कितना आदर करते थे. राम हनुमान के पांडित्य, वार्तालाप की शैली और उनके शब्द और भाव संप्रेषण की कला से अभिभूत थे.

वाल्मीकि रामायण का ही प्रसंग है, वानरराज सुग्रीव, श्रीराम और श्री लक्ष्मण को अपने क्षेत्र में घूमते देख ये सोचकर सशंकित हो जाते हैं कि कहीं बालि ने ही तो इन्हें मुझे मारने के लिये नहीं भेजा है? अपनी इसी शंका में वो पवनपुत्र हनुमान को ये पता करने भेजते हैं कि ये दोनों कौन हैं. फिर जब श्रीराम के साथ हनुमान की भेंट होती है तो उसके बाद प्रभु, लक्ष्मण से हनुमान का परिचय कराते हुए कहते हैं –

हे लक्ष्मण, ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिवोत्त्म हनुमान हैं, ये उन्हीं के हित की कामना लिये मेरे पास आये हैं. हे भाई, जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया और जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वो ऐसी सुंदर भाषा में वार्तालाप कर ही नहीं सकता. निश्चय ही इन्होंने शास्त्रों का कई बार अभ्यास किया है क्योंकि बहुत सी बातें बोल जाने पर भी इनके मुख से कोई अशुद्धि नहीं निकली. संभाषण में इनके मुख, नेत्र, ललाट, भौं तथा किसी भी अन्य अंग से कोई दोष नहीं प्रकट हुआ और इन्होने बड़े स्पष्ट तरीके से अपना अभिप्राय स्पष्ट किया” (वा.रा., 4/3/26/31)

राम के मन में हनुमान का स्थान कितना ऊँचा था ये प्रसंग इसका सबूत है. माता जानकी के लिये तो हनुमान लव और कुश की तरह ही थे.

कोई अपनी अज्ञानता में भले ही हनुमान को जनजाति समाज का प्रतिनिधि, तो कोई भारत का मूल-निवासी, तो कोई कुछ भी कहता रहा पर हमारे राम के लिये हनुमान सबसे श्रेष्ठ परामर्शदाता थे, सबसे उत्तम सचिव थे और उनके लिये सखा, पुत्र और भाई तुल्य थे. अयोध्या के विराट राजभवन में हनुमान उन गिनती के लोगों में से थे जिन्हें माँ जानकी ने अपने अंतःपुर में जाने का अधिकार दे रखा था.

इसलिये आज भारत के हर हिन्दू पूजा-घर में हनुमान सुशोभित हैं, हर हिन्दू छत पर उनके नाम की “महावीरी पताका” लहराती रहती है. मंगल और शनि ग्रह के शमन के लिये भी हनुमान की ही शरण ली जाती है. हम उनको साक्षात शिव का अवतार मानते हैं, बल और वीर्य के लिये उनकी उपासना करतें हैं. मंदिर किसी भी देवी-देवता का हो पर वहां की सुबह हनुमान चालीसा से ही होती है. भय और संकट निवारण के लिये अनायास हमारे होंठों पर हनुमान चालीसा की पंक्तियाँ ही आती है.

हनुमान ज्योतिष शास्त्र के प्रणेताओं में भी हैं. संघ संस्थापक पूज्य डॉक्टर हेडगेवार के पास भी हनुमान, मूर्ति रूप में हरदम रहते थे और कहते हैं कि जहाँ भी रामकथा कही जाती है वहां किसी न किसी रूप में हनुमान अवश्य रहते हैं इसलिये जब भी रामकथा का श्रवण करिये तो महसूस करिये कि हनुमान बिलकुल हमारे पास बैठें हैं.

आज जब भारत और यहाँ का मूल समाज अपने अस्तित्व के रक्षण को लेकर चिंतित है ऐसे में हनुमान के चरित्र की आराधना ही प्रकाश स्तम्भ का काम करेगी. इस संदेश के साथ आप सबको पवनपुत्र हनुमान के प्राकट्य दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ.

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