हनुमानजी का जीवनचरित्र, आज के व्यक्ति की जीवनशैली के लिए दिशा निर्देशक

भक्ति के पर्याय हनुमान जी के प्रकटोत्सव पर सभी को जय श्री राम… सहस्त्रों बधाई और शुभकामनाएं!

हनुमान जी का जीवन चरित्र मात्र हनुमान चालीसा जैसी भक्ति करने का विषय नहीं बल्कि उनके जीवन की एक एक घटना ध्यान से चिंतन करने योग्य है.

शक्तिमान हनुमान जी ने अपने लक्ष्यों का पीछा करते हुये जो किया वो सब कुछ ही आज हर व्यक्ति की जीवन शैली की रणनीति और गाइड लाइंस हैं.

सीता खोज के समय जब रीछराज जामवंत ने हनुमान जी को उनके बल का स्मरण कराया तो हनुमान जी अपनी काया पर्वताकार कर सिंह गर्जना करते हुए बोले –

‘समुद्र के सारे खारे जल को निगल… रावण को उसके सारे परिजन व सहायकों को मार कर… यहाँ त्रिकूट पर्वत पर लौट कर आऊँ?’

तब जामवंत जी ने हनुमान जी को कहा, ‘आप केवल सीता जी की खोज कर उनके हाल चाल लेकर आइए.’

हनुमान जी चले तब सबसे पहले मैनाक पर्वत ने हनुमान जी को अपने यहाँ थकान दूर करने के लिए आराम करने का प्रस्ताव दिया लेकिन हनुमान जी ने विनम्रता से कहा ‘राम कजु कीन्है बिनू मोहि कहाँ विश्राम’

इस दृढ निश्चय के साथ साथ उनकी फ्लेक्सिबिलिटी का भी परिचय सुरसा प्रकरण में मिलता है…

अधीर देवताओं द्वारा हनुमान जी का शक्ति परिक्षण करने हेतु भेजी गयी नाग माता सुरसा का सामना, हनुमान जी ने सुरसा की ही तरह विशाल या लघु, जैसा आवश्यक लगा वैसा रूप धारण कर किया और फिर सूक्ष्म रूप धारण कर उसके मुंह में प्रवेश कर चुपके से कान के मार्ग से निकल गए…

मतलब बड़े लक्ष्य के मार्ग की विभिन्न प्रकार की बाधाओं से टकराने की बजाय लचीली सोच वाली युक्ति से बच कर निकल लेना चाहिए…

और वहीँ ज़रुरत पड़ने पर हनुमान जी बल प्रयोग करने से भी नहीं चूके… मार्ग में आने वाली, आकाश में उड़ने वाले जीव जंतुओं की छाया पकड़ कर उनको निगल लेने वाली ‘सिंहिका’ जैसी दुष्ट शक्तियों को लात मार कर पाताल लोक पहुंचाया… तो ‘लंकिनी’ पर इस प्रकार मुष्टिका प्रहार किया कि उसको रावण कुल के निश्चित विनाश का ही आभास हो गया.

हनुमान जी में संयम भी कमाल का था… उनके सामने रावण हनुमान जी के स्वामी श्री रामजी के बारे में अपशब्द बोलते हुए सीताजी को आतंकित और अपमान करता रहा लेकिन वे चुप रहे… उन्होंने अहसास नहीं होने दिया कि वे अशोक वाटिका में ही मौजूद हैं… यहाँ उनकी थोड़ी भी असावधानी उनके लक्ष्यपूर्ति में बाधक बन सकती थी.

वीर हनुमानजी ने भोजन भी अपना काम यानी सीता जी की खोज के पश्चात ही किया, और तब खूब मस्ती के साथ किया…

हनुमान जी के चरित्र की बहुत बड़ी विशेषता दिखती है कानून की मर्यादा का पालन… ‘ब्रह्मास्त्र’ यानि कानून की मर्यादा के पालन से ही उनको, रावण को अपनी शक्ति दिखाने लंका दहन करने का मौका मिला…

और जो भी किया, उसका पूरा प्रमाण भी सीता जी से ‘चूड़ामनी’ के रूप में प्राप्त करना भी वे नहीं भूले.

बजरंग बली जी की विश्वसनीयता इतनी थी कि समुद्र के इस पार वानर दल को मस्ती से भोजन करते देखने मात्र से ही सुग्रीव को अनुमान हो गया कि हनुमान अपना काम करके लौटे हैं तभी ये अपना भोजन कर रहे हैं…

कम समय का बेहतर प्रयोग लक्ष्मण जी के लिए संजीवन बूटी लाने वाले प्रसंग से मिलता है कि हनुमान जी जब सुषेण वैद्य द्वारा बतायी गयी पहचान से संजीवन बूटी को नहीं पहचान पाए तो वे सोच-विचार में समय बर्बाद किये बिना पूरी पहाड़ी को ही उखाड़ लाये…

बजरंग बली का पूरा जीवन चरित्र और एक एक घटना आज के भक्तों यथा सैन्य या सिविल क्षेत्र के अधिकारियों ही नहीं, व्यापारिक संस्थानों के मैनेजर या मुनीमों को हर पल स्मरण और अनुकरण करने योग्य है…

और एक महत्वपूर्ण सलाह फेसबुक ट्वीटर या व्हाट्स एप पर मोदीजी की सेवा कर रहे भक्तों के लिए, कि वे अपने तमाम उदाहरणों को महाभारत में ढूँढ़ कर मोदीजी को दुर्योधन सिद्ध करने जैसे हास्यास्पद प्रयासों की बजाय हनुमान जी के जीवन चरित्र को अपने जीवन में उतारते हुए –

राक्षसों के बीच रहने वाले रामभक्त ‘विभीषण’, अपने शिविर में आये रावण के घुसपैठिये जासूस वानर भेषधारी ‘सुक’, तो मार्ग में बाधा पहुंचाने का कुचक्र रच पर्वत पर तपस्या का नाटक करते रामनामी दुपट्टाधारी ‘कालनेमी’ को विभिन्न अवसरों पर भिन्न भिन्न तरीके से पहिचानने का प्रयास करें!

जय श्री राम! जय हनुमान!!

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