बच्चों को विश्वास दिलाएं कि उनका ईमान इन मार्क्स से अधिक महत्वपूर्ण है

सीबीएसई बारहवीं की परीक्षाएं अमूमन अंग्रेजी की परीक्षा से शुरू होती हैं. 2015 में, हमारे वक़्त में भी ऐसा ही हुआ था.

पहली परीक्षा अच्छी बीती थी. उसके बाद फिजिक्स का पेपर था. उस समय भी स्थितियां कमोबेश ऐसी ही थीं, अफवाहों के दौर खूब चलते थे, शायद सच्चाई भी होती हो!

रांची के एक अखबार ने पेपर लीक होने की बात छापी भी थी. पेपर के दो दिन पहले से हमारे यहां बातें शुरू हो गई थीं, पूरा पैकेज मिल रहा था, मतलब फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स के पेपर की कीमत तीस हजार रुपए.

रोज़ नई-नई स्कीम आती रहीं. परीक्षा की रात तक ये रेट गिरकर एक हज़ार रुपए प्रति पेपर तक पहुंच चुका था, शायद एक पूरा समूह पेपर लेता और फिर उसे आपस मे बांट लेता.

हमारे मित्रों ने भी इस विषय पर बात की, मैने मना कर दिया. मेरा मानना था कि जो चैप्टर्स मैंने पढ़े हैं, उसके सवाल ऐसे भी सॉल्व करके आऊंगा और जो नहीं पढ़े उसके सवाल परीक्षा के रात पता चलने से भी फर्क पड़ने से रहा.

अंत में पेपर आए भी या ये महज बातें ही थीं ये पता नहीं चला. मगर मेरे ना कहने के पीछे सबसे प्रमुख कारण ये था कि बचपन से ही हमारे अंदर ये गांठ काफी गहरे बांध दी गई थी कि मार्क्स एक दायरे के बाद महत्व नहीं रखते!

ऐसी चीजें भी होती होंगी, इसका अंदाजा हमें दसवीं तक नहीं था. ये स्वाभाविक भी था, डीएवी नरहाँ गांव का स्कूल है, जबकि डीएवी बीएसईबी की गिनती बिहार के सबसे बड़े और नामी स्कूलों में होती है.

हकीकत ये है कि हर साल सीबीएसई के पेपर्स लीक होने की बातें आप दबे जुबान में सुन लेंगे. झारखंड जैसे कुछ राज्यों से ये खबरें अधिक आती थीं. कई बार अखबार भी इसे छापते थे, लेकिन मामलों को दबा दिया जाता था.

एक बार सिस्टम से सामना हो जाए फिर आप पेपर से लेकर परसेंटेज बढ़ाने तक की स्कीम समझ जाएंगे.

इसके अलावा सीबीएसई बारहवीं में हर बार ‘आउट ऑफ सिलेबस’ क्वेश्चन का बखेड़ा खड़ा होता है. हर साल किसी न किसी पेपर में निश्चित ही कोर्स के बाहर के क्वेश्चन पूछे जाते हैं. इस बार भी पूछे गए थे, हमारे समय में तो बात संसद तक पहुंची थी!

क्या लगता है आपको? जिस स्तर के लोग इसके लिए जिम्मेवार होते हैं, उनके रहते ये यूँ ही हो जाता है? ये असल मसले से ध्यान भटकाने की कवायद भर होती है.

फिर सीबीएसई में पढ़ने वाले बच्चे अधिकतर सामान्य से बेहतर परिवारों से होते हैं. ये वो वर्ग है जिसके पास इन सब बातों पर ध्यान देने का समय नहीं होता. बहुत होगा तो वो परिवार या अपने छोटे से समाज मे बात कर के चुप हो जाते हैं.

उससे भी महत्वपूर्ण ये कि अगर वो गलत करते हैं या इस तरह की गतिविधियों में शामिल होते हैं तो इसकी चर्चा समाज में नहीं करते. गलत करने में नहीं, मगर इस पर बात करने में बदनामी समझते हैं.

इस बार भी मामला इसलिए प्रकाश में आया क्योंकि एक्शन सीबीएसई ने लिया, वर्ना आम लोग तो गाहे-बगाहे हर बार सवाल उठाते ही रहे हैं.

सीबीएसई संगठन के रूप में स्टेट बोर्ड्स से काफी अलग है. इसके फायदे भी हैं, नुकसान भी; और जिस युग में हम जी रहे हैं वहां हर व्यक्ति, हर संगठन, हर समाज, हर रिश्ता ईमान और विश्वास के संकट से गुजर रहा.

इसमें कोई दो राय नहीं कि कार्रवाई होनी चाहिए. कार्रवाई जरूरी भी है और मुश्किल भी क्योंकि इंसान अगर ज़मीर को ताक पर रखने की सोच ही ले तब वो कुछ भी कर सकता है, ये तो महज़ कुछ पेपर्स हैं!

इसलिए उससे भी बड़ा काम व्यवहार के स्तर पर होना समय की मांग है. क्यों ये हर संस्था, हर संगठन में हो रहा? क्योंकि हम अपने बच्चों को वही सिखा रहे हैं. उसकी किताब, उसके शिक्षक उसे गला काट प्रतियोगिता, होड़, दौड़ जैसी चीजें सिखाएंगे तो बच्चा पेपर क्यों नहीं खरीदेगा?

ये तो उसके हासिल के लिए सबसे आसान रास्ता है. नब्बे परसेंट मिले तो डीयू का टॉप कॉलेज वर्ना आप क्या और कितना जानते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता, घर जाइए… वो ऐसी स्थिति में क्या करेगा? उसमें भी जब उसे शिक्षा ही इस बात की दी गई है कि किसी भी हाल में तुम्हें वहां पहुंचना है!

‘मार्क्स डोंट मैटर’, आपको उन बच्चों को ये बताने भर से आगे बढ़ना होगा. उन्हें ये विश्वास दिलाना होगा कि वाकई ये अंक उनसे, उनके ईमान से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं.

जब कम अंक लाने पर बच्चे का परिवार उसके साथ खड़ा होगा, तब निश्चित ही वो आत्महत्या और चोरी के इतर उपलब्ध अन्य विकल्पों की सोचेगा. इसमें संस्थाओं की भी भूमिका होगी.

जब कथनी-करनी में साम्य होगा तब शायद स्थिति बदले. और तब जाकर अगर ये बच्चे कल को उन संस्थाओं के कर्ता-धर्ता बनें तो गलत करने से पहले शायद एक बार सोचें!

फिर वैल्यू एजुकेशन तो स्वतः हो जाएगा… वो लम्बे रेस की चीज़ है. प्रतिदिन, प्रति-पल आपको उसके लिए तत्पर होना पड़ेगा. जीवन भर सीखना पड़ेगा. वर्ना क्या! खेल तो हर जगह हइये है. चलता रहेगा यूँ ही!

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