महत्वाकांक्षा और जुनून से ‘उनको’ उन्हीं के गेम में मात दे सकते हैं हम

पिछले लेख – हमें रचनात्मक विनाश को समझना होगा – में मैंने लिखा था कि “ई-कॉमर्स इस बदलाव का एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा है. आँखे खोलिये और समझने का प्रयास करिये कि सूचना आप की मुट्ठी में है, ना कि भ्रष्ट अभिजात्य वर्ग के हाथ में. इस सूचना का प्रयोग विकसित देशो को उन्हें के गेम में मात देने के लिए करिये.”

एक मित्र ने पूछा कि कैसे हम ‘उनको’ उन्हीं के गेम में मात दे सकते हैं.

इस विषय को विस्तार देने का प्रयास करते है.

आज की पीढ़ी, आप और हम, एक क्रांति के मध्य में रह रहे हैं. यह क्रांति हमारे सामने हो रही है, ना कि हम उसके बारे में इतिहास की पुस्तकों में पढ़ रहे हैं.

प्रथम औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन बढ़ाने के लिए पानी और भाप की शक्ति का इस्तेमाल किया. द्वितीय ने बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए बिजली का प्रयोग किया.

स्टीम और विद्युत इंजन के अविष्कार से उत्पन्न मशीनी ताकत ने मनुष्यों की शारीरिक क्षमता को कई गुना बड़ा दिया. मशीनो ने मांसपेशियों की सीमाओं को पार करना संभव किया और जन परिवहन के लिए रेलवे का विकास किया.

तीसरी क्रांति ने इलेक्ट्रानिक्स और सूचना तकनीकी के द्वारा उत्पादन को आंशिक रूप से स्वचालित कर दिया, जिसने कारखानों में बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव किया और भूमंडलीकरण को बढ़ावा दिया. रिसर्च और डिजाईन विकसित देशो में; उत्पादन विकासशील देशो में, जहाँ लेबर सस्ती हो; पूँजी का ट्रांसफर विकसित देशो की तरफ.

अब चौथी, आज के युग की, क्रांति डिजिटल है जो भौतिक, डिजिटल, और जैविक क्षेत्रों के बीच की सीमाओं को धुंधला करके, मिटा कर, एक नयी प्रौद्योगिकी, एक नयी व्यवस्था का निर्माण कर रही है जो knowledge-based या ज्ञान पर आधारित है.

हम एक ऐसे युग में रह रहे है जिसमें मशीनें और कृत्रिम बुद्धि इतनी विकसित हो गयी है कि सॉफ्टवेयर से संचालित मशीनें – जो हमने बनाई है – अब हमारा स्थान ले सकती है और हमारे बिना काम कर सकती है, यहाँ तक कि हमसे बढ़िया निर्णय ले सकती है.

इस हद तक कि कुछ वर्षों में कई गतिविधियों के लिए मानवीय श्रम की ज़रुरत ही नहीं रहेगी. उदहारण के लिए बिना ड्राइवर के कार चलेगी, फैक्ट्री को इंटेलीजेंट रोबोट्स चलाएँगे, एकाउंटिंग और फाइनेंशियल डील कंप्यूटर करेंगे, रूटीन खबरें और विश्लेषण कंप्यूटर लिखेंगे, इत्यादि.

पिछली तीन क्रान्तियों तक पूँजी और फेवर, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, युद्ध के बल पर किसी व्यक्ति या देश ने कई विशाल औद्योगिक परिसर खड़े किये. नया प्रोडक्ट बनाया और रातों-रात अरबपति हो गए. जो भी चुनौती देने का साहस करता, उसे कुचल दिया या खरीद लिया जाता था, या फिर उसके व्यवसाय को सरकारी नीतियों द्वारा ध्वस्त कर दिया जाता था.

भारत में भी काँग्रेसियों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें. अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे से और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया.

मैं ज़ोर देना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जान बूझकर करी थी, ना कि नासमझी में. उनका पूरा ध्यान अपने आप को और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था. जनता को जानबूझकर गरीब रखना था, क्योंकि गरीब जनता को वह बहला-फुसलाकर, लॉलीपॉप देकर वोट पा सकते थे. डिजिटल युग में अब यह संभव नहीं है.

लेकिन मूल प्रश्न तो यह है कि इस सूचना का प्रयोग विकसित देशों को उन्हीं के गेम में मात देने के लिए कैसे कर सकते है?

उत्तर यह है कि अब एक नवयुवती या नवयुवक को उद्यम को शुरू करने के लिए विशाल पूँजी, भूमि, परिसर, लेबर की आवश्यकता नहीं है. अब उन्हें सिर्फ नॉलेज या ज्ञान की आवश्यकता है, वही उनकी पूँजी है.

उस ज्ञान के लिए किसी परीक्षा को भी पास करने की आवश्यकता नहीं है, ना ही डिग्री की. वह ज्ञान कंप्यूटर और सेल फ़ोन पर उपलब्ध है. उस ज्ञान को डिजिटल नेटवर्क के द्वारा जोड़ा जा सकता है.

कुछ मित्र मिलकर कुछ हज़ार रुपये में अपने घर या हॉस्टल से उद्यम शुरू कर सकते है, नयी खोज कर सकते है. इसके लिए उन्हें सरकार से परमिशन की आवश्यकता नहीं है. उन्हें मार्केट और समाज में किसी कमी को ताड़ना होगा और उसे डिजिटल सोल्युशन के द्वारा पूरा करना होगा.

मार्क ज़ुकेरबर्ग ने फेसबुक की नींव हॉस्टल में डाली थी, एप्पल कंप्यूटर गैराज में शुरू हुआ. था. भारत के विजय शेखर शर्मा, जिन्होंने अलीगढ़ में हिंदी माध्यम में पढ़ाई की थी, ने दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में पढ़ते समय एक वेबसाइट बनाई जिसे उन्होंने दस लाख डॉलर में बेच दिया. वर्ष 2010 में उन्होंने Paytm शुरू किया. आज शर्मा अरबपति है और उनकी कंपनी कनाडा में प्रवेश कर चुकी है. Paytm में 13 हज़ार लोग काम कर रहे हैं.

ऐसा नहीं है है कि हर व्यक्ति उद्यम शुरू कर सकता है. लेकिन अगर पांच प्रतिशत युवा भी सरकारी नौकरी से ध्यान हटाकर उद्यम की तरफ ध्यान दें तो वे बाकी युवाओं को जॉब देने की क्षमता रखते हैं.

और क्या पता, कौन सा आईडिया जो भारत की भूमि से निकला हो, कल का एप्पल, फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, उबेर, Airbnb, स्नैपचैट, WeWork, बन जाए. बस महत्वाकांक्षा होनी चाहिए, कुछ करके का जुनून. ना कि सरकारी बैसाखी की चाहत.

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