पाकिस्तान को अखरने लगे हैं ‘शिया’ जिन्ना और ‘अहमदिया’ इक़बाल, रुतबे से होंगे बेदखल

पाकिस्तान सरकार की अधिकृत वेबसाइट पर जायेंगे तो दो लोगों की फोटो मुख्य पृष्ठ पर मिलेगी. एक अल्लामा इकबाल और दूसरे मुहम्मद अली जिन्ना.

पाकिस्तान में इन दोनों का मुक़ाम किसी वलीउल्लाह से कम नहीं है इसलिये वहां के लोग इन दोनों के नाम के आगे बड़े फक्र से रहमतुल्लाहअलैहे (यानि उनपर अल्लाह की रहमत हो) लिखते हैं.

दोनों रहमतुल्लाहअलैहे क्यों बने, इसकी भी वजह है. इक़बाल ने पाकिस्तान के नाम पर धमकियाँ देती नज़्म लिखी और जिन्ना ने राजनीतिक सौदेबाज़ी से इस लक्ष्य को हासिल किया.

आज जिन्ना ‘क़ायदे-आज़म’ और ‘बाबा-ए-आज़म’ हैं और अल्लामा मुहम्मद इक़बाल नेशनल पोएट के सम्मानित ओहदे पर काबिज़ हैं.

पर ज्यादा दिनों तक उनका ये मेआर क़ायम नहीं रहने वाला है क्योंकि उनके पुराने पाप (?) फिर से उनके उम्मतियों को याद आने लगे हैं.

‘फिर से’ का ये अर्थ है कि जब इक़बाल ने पृथकता का भाव जगाया और जिन्ना ने उसे परवान चढ़ाया तो उस वक़्त देबबंद, जमाते-इस्लामी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे लोग इनके सख्त मुख़ालिफ़ हो गये क्योंकि उनको लगता था कि मुल्क का एक छोटा सा टुकड़ा लेकर पूरा हिन्दुस्तान हमारे हाथ से निकल जायेगा.

इसीलिए उस वक़्त के बड़े-बड़े मुफ्तियों ने जिन्ना के खिलाफ फ़तवे दिये थे और फ़तवे देते हुये ये तक कहा था कि ये ‘जिन्ना’ नहीं ‘जिना’ है.

खैर, पाकिस्तान बन गया. ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान’ नाम से बने मुल्क ने उम्मतियों के गुस्से को ठंडा कर दिया और ये मान लिया गया कि पाकिस्तान नाम की ये नेअमत इकबाल और ज़िन्ना के बदौलत नसीब हुई है और पूरी कौम दोनों के सम्मान में लेट गई.

हाल के कुछ दशकों में जब अहमदियों को गैर-मुस्लिम करार दिलवाने का मूवमेंट खत्म हो गया तो वहां के लोग मुसलमानों के अंदर ही एक नया शिकार खोजने लगे जिसे काफ़िर और मुशरिक घोषित किया जा सके तो शिकार के रूप में इन्हें मिला ‘शिया समुदाय’.

शिकार की निशानदेही होती ही शिकारियों का झुण्ड अलग-अलग नामों से उमड़ पड़ा और लश्करे-झांगवी, सिपह-ए-सहाबा और तहफुज़े-खत्म-ए-नबुबत के कारिंदे चुन-चुन कर शियाओं का कत्लेआम करने लगे.

शिया के अंदर के ‘हज़ारा कम्युनिटी’ के समूल नाश की कोशिश की गई. जब उन्माद चरम पर पहुँच गया तो शियों के तरफ़ से बड़ी भावुक अपील आई.

शियों ने कहा, भाई! तुम लोग हमको मारते हो? क्या तुमको पता नहीं कि ये पाकिस्तान नाम की दौलत जो तुमने कमाई है उसे एक शिया ने दिया था जिनका नाम है ‘मुहम्मद अली जिन्ना’.

पर्दा उठ गया था सच सामने आ गया तो पुराने ज़ख्म भी हरे हो गये. देबबंदियों को मौलाना हुसैन अहमद मदनी, जमात वालों को अबुल आला मौदूदी और अहले-हदीस वालों को सनाउल्लाह अमृतसरी याद आ गये और फिर उन फतवों पर से धूल झाड़ी गई जो जिन्ना के खिलाफ़ अतीत में दिये गये थे.

वहां हालत अब ये है कि वहां दीन के सिपाहियों को ये बात बड़ी अखरती है कि एक शिया को हमने ‘बाबा-ए-आज़म’ के ओहदे पर बिठाया हुआ है और एक ‘खोजा शिया’ हमारे मुल्क का क़ायदे-आज़म है.

अच्छा, ये दर्द यहीं तक नहीं है… किसी ने आकर ये शोशा भी छोड़ दिया कि हमारे राष्ट्रकवि अल्लामा इक़बाल तो अपनी उम्र, अपनी अक्ल और अपनी जवानी के आठ बहुमूल्य सालों तक अहमदिया रहे थे यानि मुर्तद हो गये थे यानि गुमराह थे.

इतिहास की किताबें खोली गई तो सबूत भी मिल गये कि इक़बाल कादियानी हो गये थे और अपनी सबसे बेहतरीन नज्में उन्होंने उसी दौर में लिखी थीं.

“लाहौलबिलाकुवत… तौबा… तौबा, एक मुर्तद और गुमराह के लिखे तराने हम उम्मत का गीत समझ कर गाते रहे… अफ़सोस है हम पर” जैसे तौबा सूचक शब्द अब पाकिस्तान में आम हो चले हैं.

इसी बीच किसी ने ये भी बता दिया कि पाकिस्तान आन्दोलन तो दरअसल ‘जमात-अहमदिया’ की तहरीक थी जिसके चलते आज हमसे दिल्ली छीन गया है.

ज्ञात हो कि ज़मात अहमदिया इस पाकिस्तान मूवमेंट में जिन्ना का दायाँ हाथ और वित्त-पोषक बनकर काम कर रही थी तो इस कारण इक़बाल भी निशाने पर आ गये और इसलिये उनके, अहमदियत के और जिन्ना के तार सबको मिले हुये प्रतीत होने लगे.

कमलेश्वर ने मुक्ति-वाहिनी युद्ध की घटना का जिक्र करते हुये एक लघुकथा लिखी थी. लिखा था कि जब बांग्लादेश पाकिस्तान से टूट कर अलग हो गया तो किसी ने जिन्ना के कब्र पर जाकर पेंट से लिख दिया था “आधा-एहसान हमने उतार दिया”.

अब आधा एहसान उतराई के बाद रही-सही कसर जिन्ना के शिया मूल ने पूरी कर दी है. इक़बाल और जिन्ना अब पाकिस्तान के अवाम को अपने सफ़ेद कमीज पर लगी कालिख की तरह दिख रहे हैं जिसे धोये बिना सुकून नहीं आयेगा. इसलिये अब बाबा-ए-आज़म जिन्ना को ज़लील करके उनके रुतबे से रुख्सत करने की तैयारी है और इकबाल को किताबों से बाहर करने की.

जिन्ना की जगह बिठाने के लिये तो इन्होंने एक नायक खोज भी लिया है और उसके पक्ष में दलील दी है कि जिन्ना ने थोड़े न पाकिस्तान बनाया है. अरे पाकिस्तान की बुनियाद तो उसी दिन पड़ गई थी जब ‘मुहम्मद बिन कासिम’ यहाँ आये थे.

ज्यादा इंतजार नहीं करना है. हमें अपनी इन्हीं आँखों से हमें हजारों ज़ख्म देने वाले जिन्ना को मरणोपरांत बे-आबरू होते देखना है और वो भी उन्हीं लोगों के द्वारा जिनके लिये उसने पाकिस्तान बनाया था.

खैर, लानती लोगों का ‘बाबा-ए-आज़म’ कोई भी हो ये उनका विषय है पर जिन्ना को उसके अपराधों के लिये मिली ये सज़ा कम से कम सुकून देने वाली तो है ही. वैसे मुकम्मल तसल्ली तब मिलेगी जब इकबाल की भी इसी तरह लानत-मनामत की जायेगी और पाकिस्तान के राष्ट्रकवि की उनकी हैसियत का जनाज़ा निकाला जायेगा.

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