बहुत कुछ कहता है यह हंगामा

CBSE बोर्ड से तो मेरा साबका ज़रा कम रहा है. लेकिन यूपी बोर्ड में लहराते भ्रष्टाचार के सागर की आकाश चूमती लहरों को तीन-चार दशकों से देखता चला आ रहा हूं.

सरकार कोई भी रही हो लेकिन यूपी बोर्ड में पलती बढ़ती रही भ्रष्टाचार की भैंस का गाढ़ा दूध सबने छक कर पिया.

1991-92 में तत्कालीन शिक्षामंत्री के रूप में राजनाथ सिंह का कार्यकाल एकमात्र ऐसा अपवाद रहा जब यूपी बोर्ड में भ्रष्टाचार की भैंस भूखों मरने लगी थी और दम तोड़ने की कगार पर पहुंच गई थी.

उसके 26 साल बाद अब योगी सरकार ने यूपी बोर्ड के भ्रष्टाचार की उस भैंस के चारा-पानी पर रोक की शुरुआत की है.

इस वर्ष परीक्षा छोड़कर भागे 11-12 लाख लफंगों (उन्हें छात्र या विद्यार्थी कहना/लिखना शिक्षा की देवी सरस्वती का अपमान करना होगा) की संख्या उसी का परिणाम है.

लेकिन उस भैंस के रखवाले इतनी जल्दी हार नहीं मानने वाले. यूपी बोर्ड से सम्बद्ध कर्मचारी अधिकारी या फिर निजी स्कूल के मालिकों का संगठित गिरोह आजकल यह राग अलापता घूम रहा है कि कोई फर्क नहीं पड़ा है, केवल घूस के रेट कई गुना बढ़ गए हैं.

हालांकि उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता कि 12 लाख लफंगे फिर परीक्षा छोड़कर क्यों भाग गए?

कुछ ऐसा ही मामला CBSE को लेकर दिल्ली में हो रहे हंगामे का भी है. यह कटु सत्य है कि HRD मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी ने बुरी तरह निराश किया था.

ईमानदारी का आलम यह था कि 2014 तक स्कूटर पर चलनेवाला स्मृति ईरानी का सोशल मीडियाई चमचा, स्मृति ईरानी के मंत्री बनते ही HRD मंत्री के बंगले से लेकर ऑफिस तक भूत की तरह मंडराने लगा था और आजकल दिल्ली की सड़कों पर 4 छल्लों वाली आऊडी से फर्राटा भरता है. शेष कहानी स्वयं समझ लीजिए.

यही कारण था कि ईरानी की विदाई कर के प्रकाश जावड़ेकर को HRD मंत्रालय सौंपा गया. उसके बाद से ही CBSE के भ्रष्टाचार की भैंस के भी बुरे दिन शुरू हुए.

सबसे बड़ी गाज गिरी बोर्ड की किताब छापने वाले अरबपति प्रकाशकों पर. ऐसे कई गोरखधंधों की सूची बहुत लम्बी है. देश में NGO के गोरखधंधे की गर्भनाल भी इसी HRD मंत्रालय से जुड़ी हुई है.

केवल राजनेता या नौकरशाहों की बीवियों के ही नहीं, बल्कि एडिटरों रिपोर्टरों की भी बड़ी फौज के बीबी बच्चों भाइयों मित्रों का NGO साम्राज्य भी बहुत बड़ा है, विशेषकर दिल्ली में.

प्रकाश जावड़ेकर के HRD मंत्री बनने के बाद से इस पूरे कॉकस की कठिनाइयां बढ़ती ही चली जा रही हैं.

यही कारण है कि 2014, 2011, 2010, 2007, 2006 में लीक हुए पर्चों की जो खबरें नीचे चलने वाली पट्टियों तक ही सीमित रहती थीं, वही खबर अब वही न्यूज़ चैनल ‘देश के भविष्य के साथ विश्वासघात’, ‘देश का भविष्य चौपट हुआ’ सरीखे विस्फोटक शीर्षकों के साथ पिछले 3 दिनों से लगातार परोस रहे हैं.

निशाना पर्चा लीक नहीं बल्कि प्रकाश जावड़ेकर हैं. CBSE चीफ के बहाने प्रकाश जावड़ेकर के खिलाफ छुपी हुई ज़हरीली मुहिम चल रही है. दिल्ली में आजकल हो रहा हंगामा यही कह रहा है.

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