भरोसे के संकट में विपक्ष

केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाना हो या उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी हो, इन दोनों के मूल में मौजूदा भारतीय राजनीतिक विपक्ष के सामने खड़ा ‘भरोसे का संकट है’.

देश का वर्तमान राजनीतिक विपक्ष इस समय इतिहास के अपने सबसे बड़े भरोसे के संकट के दौर में है.

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के सतत राजनैतिक विरोध जिसे नफरत, ईर्ष्या कहना ज्यादा उचित होगा, के बाद जब देश ने मौजूदा केंद्र सरकार को प्रचंड बहुमत दिया… तबसे लेकर बीते चार सालों के दौरान कभी भी विपक्ष का भरोसा भारतीय लोकतंत्र के मतदाता के फैसले पर नहीं दिखा.

कभी यह भरोसे का संकट निर्वाचित प्रधानमंत्री के खिलाफ निजी से निजी और भद्दी से भद्दी सस्ती टिप्पणियों तक गया, तो तमाम बार इस भरोसे के संकट ने सड़कों पर उतर कर वैचारिक प्रायोजित प्रहसनों उर्फ़ तथाकथित आंदोलनों के जरिये… ‘देश का पीएम भड़वा है’ तक के नारों तक भी गिरते देखा गया.

दरअसल यह सब विपक्ष के खुद पर भरोसा न होने की प्रतिक्रिया मात्र था. लेकिन… वो कौन सी गलतियां थीं जिसकी वजह से भारतीय मतदाता ने उन पर भरोसा नहीं किया… इस पर विचार, मंथन और काम करने के बजाय 4 सालों तक भरोसे का संकट झेलते विपक्ष आज… प्रचंड बहुमत से चुनी सरकार के खिलाफ अविश्वास के औपचारिक प्रस्ताव की नियति पर खड़ा है.

मौजूदा भारतीय राजनीतिक विपक्ष को भारतीय लोकतंत्र के मतदाता पर भरोसा नहीं है. यह जानते हुए भी कि मतदाता के आशीर्वाद से मिले प्रचंड बहुमत के सामने उसके अविश्वास प्रस्ताव की कोई बिसात नहीं, विपक्ष का इरादा भी सरकार गिराने का नहीं, क्योंकि वह संभव नहीं.

लेकिन भारतीय विपक्ष को खुद पर पैदा हुए भरोसे के संकट को… मतदाता के खिलाफ भरोसे के संकट के रूप में बदलने की मजबूरी है. इस तरह विपक्ष सरकार पर अविश्वास नहीं, भारतीय मतदाता के ऊपर अविश्वास की नियति का शिकार हो देश के सामने खड़ा है.

देश की सर्वोच्च जन-पंचायत संसद में जनादेश पर विपक्ष का यह भरोसा संकट जब आगे बढ़ता है तो उसे लोकतंत्र के स्तंभ न्यायपालिका के मंदिर… सर्वोच्च न्यायालय पर भी भरोसा खोते हुए देखा जाता है और यह नियति विपक्ष को सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की तैयारी तक ले जाती है.

यहां खुद के ऊपर खड़े भरोसे के संकट को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसे के संकट के तौर पर खड़ा करने की नियति का मारा दिखता है विपक्ष.

इसके पहले भी… यह वही विपक्ष है जो 2014 के आम चुनावों से शुरू होकर हालिया हर चुनावों तक… जनता के अपने ऊपर भरोसा खो देने को… ईवीएम पर भरोसे के संकट के रूप में बदलने की कोशिश करता रहा है. और इस तरह एक और संवैधानिक संस्था, चुनाव आयोग पर भरोसे का संकट खड़ा करने की आदत विकसित की गई.

खुद पर खड़े इसी भरोसे के संकट को देश में जब तब, स्थापित मीडिया को गोदी मीडिया कहते हुए, लोक संवाद के मंच सोशल मीडिया को प्रायोजित ठहराते हुए… आगे बढ़ाने के काम भी इसी भरोसा संकट की कड़ियां हैं.

भारतीय मतदाता द्वारा मौजूदा राजनीतिक विपक्ष के ऊपर भरोसे का संकट खड़ा कर जनादेश से वंचित कर देने पर देश के मतदाता और जनादेश पर भरोसे संकट खड़ा करने की स्थिति तक पहुंचा आज का विपक्ष… अब न्यायपालिका सहित हर संवैधानिक व्यवस्थाओं, संस्थाओं, मानकों को न मानने की अराजकतावादी अवस्था तक पहुंच चुका है, यह स्थिति सहज तरीके से देश के सामने है.

मतदाता के जनादेश से प्रचंड बहुमत की निर्वाचित सरकार से लोकतांत्रिक तरीके से न लड़ पाने वाला भारतीय विपक्ष इतिहास में पहली बार ‘विपक्ष पोषित आपातकाल’ की तरफ बेहद अराजकता के साथ बढ़ रहा है, या कहें… बढ़ने पर मजबूर है.

आज उसे जनता के वोट पर भरोसा नहीं, उसे कोर्ट पर भरोसा नहीं, उसे चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं, मीडिया, देश के आम जन की आवाज पर भरोसा नहीं.

क्योंकि : देश की जनता, मतदाता को मौजूदा भारतीय विपक्ष पर भरोसा नहीं.

देश में लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसे के संकट के ‘विपक्षी आपातकाल’ के एक बहुमत की निर्वाचित सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को देश इसी नजर से देख रहा है.

साथ ही उसे यह संतोष है कि देश की सत्ता सदन से सड़क और न्याय के मंदिरों से संवैधानिक संस्थाओं तक लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी, प्रेस मीडिया की स्वतंत्रता सहित हर उच्चतम लोकतांत्रिक व्यवहार जी रही है.

इसीलिए देश में स्थापित लोकतांत्रिक निर्वाचित सत्ता उर्फ़ जनादेश के सामने खड़ा किये गए भरोसे के संकट का स्वागत होना चाहिए. आगे आने वाले हर ‘विपक्षी आपातकाल’ का स्वागत होना ही चाहिए.

क्योंकि आगे हर ऐसे विपक्षी भरोसे के संकट देश के मतदाता के मन को मज़बूत करने वाले हैं कि उसने जिस मौजूदा राजनीतिक विपक्ष पर भरोसा नहीं किया… भरोसे से वंचित किया, वे उसी के पात्र थे और 2019 में भी रहेंगे.

भरोसे के भाव वाले इस देश में भरोसे के संकट खड़ा करने वालों पर देश पहले ही भरोसा खो चुका है.

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