Jab We Met : सेर को मिला सवा सेर!

कुछ पंछी होते हैं जो समाज के बनाए चरित्र के पिंजरे में ठहर नहीं पाते… उन्हें खुले आकाश में स्वतंत्रता से उड़ते हुए किसी घाघ गिद्ध द्वारा खाया जाना मंज़ूर होता है लेकिन सोने के पिंजरे में बैठकर गाना मंज़ूर नहीं होता… क्योंकि पिंजरे में बंद चिड़िया हमेशा गाती ही नहीं, कभी कभी रोती भी है…

पिंजरे में बंद हो कर आत्मा तक का मृत हो जाना उसे मंज़ूर नहीं था इसलिए सामाजिक व्यवस्थाओं से सुसज्जित सलाखों से बना पिंजरा उसे कभी रास नहीं आया… होती हैं कुछ रूहें ऐसी जो देह की सीमाओं में नहीं समाती तो बाग़ी कहलाती है…

गीत एक ऐसी ही बाग़ी लड़की थी, उसकी रूह जब तब उसकी देह के बाहर छलक पड़ती… जिसको समेटकर फिर से समाज में रहने लायक बनाने तक वो बुरी तरह थक जाती थी… थकी और बुझी आँखों से रोबोर्ट की तरह उसका शरीर रोज़ के कामों को संचालित करता जिसमें न आनंद था ना उत्साह…

एक अजीब सी उदासी उसे घेरे रहती, जिसे वो ऐसे कामों से दूर करने का प्रयास करती जिसके लिए उसके मन पर छाले पड़ आए, अपने ही दर्द में डूबे रहना उसका पसंदीदा शगल हो गया था… बावजूद इसके, उसके चेहरे से कोई उसके दर्द की थाह नहीं पा सकता था…. घुँघरू खनकने सी उसकी हंसी से कोई भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह पाता था…

ऐसे ही मूड स्विंग के साथ आज उसने ऑफिस में कदम रखा था और पहला कदम रखते ही उसे लगा आज ऑफिस की फिज़ा कुछ बदली हुई सी है… गीत कहने को तो भौतिक दुनिया में रमी हर हाल में हंसती मुस्कुराती दिखाई देनेवाली लड़की है लेकिन उसकी छठी इन्द्री उसकी ज़ुबान से अधिक तेज़ चलती है…

“मैं हमेशा वहां सबसे अधिक पाया जाऊंगा जहां मेरा ज़िक्र सबसे कम होगा… ”

जी!! – उसने चौंकते हुए पलटकर पूछा… अरे यहाँ तो कोई नहीं… फिर यह किसकी आवाज़ थी…

वो तुरंत अपनी सीट पर बैठ गयी और पानी पीने लगी…

क्या हुआ, फिर कान में घंटी बजी क्या? – निशा ने हँसते हुए पूछा..

हाँ यार पता नहीं ऐसा लगा जैसे किसी ने बिलकुल मेरे कान के पीछे खड़े होकर कुछ कहा हो….

तुम पगला गयी हो, ये रात रात भर जागकर भुतहा कहानियाँ पढ़ती रहती हो न उसका हैंग ओवर है..

भुतहा नहीं जानेमन फिक्शन एंड थ्रीलर वो भी Alfred Hitchcock की..

जिसका नाम लेने से ही हिचकी आ जाए उसकी कहानियां कैसी होगी – निशा छूटते से ही बोली…

हो गया?? – गीत ने चिढ़ते हुए कहा…

हाँ आज के दिन का कोटा पूरा… अब काम कर लेते हैं… – निशा

पहले ये बताओ आज ऑफिस में कुछ गड़बड़ है क्या – गीत ने पूछा

नहीं तो… अरे हाँ आज एक नया आइटम आया है… बॉस के बाजू वाला कैबिन मिला है… सुना है बहुत खडूस है… बरसों से किसी ने उसे हँसते नहीं देखा…

अच्छा!! बुढऊ के दांत नहीं है क्या…

क्या पता खुद ही देख लो..

गीत ने कनखियों से बॉस के बाजू वाले कैबिन में नज़र डाली.. – यार दीखता तो अच्छा है

लेकिन हँसता नहीं.. – निशा

कितने रुपये देगी? – गीत

किस बात के? – निशा

यदि इसको हंसा दूं पहले ही दिन… – गीत

अरे तलाकशुदा है – निशा

अबे तो मुझे कौन सी शादी करनी है उससे – गीत

तो क्यों बेचारे को हंसाना चाहती है … वैसे आईडिया बुरा नहीं है – निशा

हुंह दुनिया भर के कुंवारे मर गए है क्या – गीत

चल देखते हैं… पहले तू हंसा के बता – निशा

कितने रुपये देगी पहले बोल – गीत

सौ रुपये – निशा

चल इतनी सस्ती नहीं उसकी हंसी पांच सौ तो खाली मुस्कुराने के मिल जाएंगे – गीत

अच्छा चल हज़ार रुपये दूंगी .. पता तो है हंसने नहीं वाला… कम से कम पहले दिन तो नहीं… – निशा

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आप कितने रुपये लेंगे? – गीत

जी!! – उसने अपनी एक आई ब्रो उठाते हुए पूछा

जी आपको कितने रुपये लगते हैं? – गीत ने अपना सवाल दोहराया

किस बात के?

जी… वो… मुस्कुराने के??? – गीत ने थोड़ा झिझकते हुए कहा…

दो मिनट तक माथे पर त्यौरियां चढाते हुए पहले तो वो देखता रहा… फिर ज़ोर से ठहाका मार कर हंस दिया…

हाईला!! मेरे पास इत्ते रुपये नहीं है… मैं तो बस मुस्कुराने भर के पांच सौ दे सकती थी, आप तो ठहाका मार कर हंस दिए अब पांच सौ में क्या होगा… – गीत ने अचंभित होते हुए कहा…

हो गया? – वो तुरंत अपनी हंसी रोकते हुए बोला…

क्या?? – गीत

शर्त जीत गयीं? दीजिये मेरे पांच सौ… – उसने उसी अंदाज़ में अपनी एक आई ब्रो उठाते हुए कहा

हें!! आपको कैसे पता?? – गीत एक बार फिर अचम्भित थी…

ऑफिस की फिज़ा सिर्फ आपको ही बदली हुई नहीं लगी थी.. छठी इन्द्री मेरी भी बहुत तेज़ है – वो मुस्कुराते हुए बोला..

मेरी तो सारी इन्द्रियाँ बहुत तेज़ है… वो मन ही मन बुबुदाते हुए बोली

जी वो मैं जानता हूँ और ये भी कि आपकी स्वादेंद्री सबसे अधिक तेज़ है… चलिए कॉफ़ी पीकर आते हैं नीचे से ..

जी!!

जी, वो जो शर्त के पांच सौ रुपये आप मुझे देने वाली हैं, वो और पांच सौ जो मुझे मिलने वाले हैं अपने दोस्त से मिलाकर हज़ार रुपये में अच्छी खासी पार्टी हो जाएगी…

आपको क्यों मिलने वाले हैं? – गीत ने पूछा

मेरी भी दोस्त के साथ शर्त लगी थी कि इस नकचढ़ी को आज तक कोई कॉफ़ी ऑफर करने की हिम्मत नहीं कर सका है… – उसने अपना चेहरा गीत के कानों के पास लाते हुए कहा..

“मैं हमेशा वहां सबसे अधिक पाया जाऊंगा जहां मेरा ज़िक्र सबसे कम होगा… ” गीत को लगा ये तो वही आवाज़ है… जो ऑफिस में आते से ही सुनाई दी थी…

अपने अचम्भे को छुपाते हुए उसने अपनी उसी घुंघरू सी खनकती हंसी के साथ कहा – आप बहुत अच्छे बिजनेसमैन बनेंगे एक दिन…

हाँ ज़रूर आपको सेक्रेटरी रख लूंगा….

वैसे मैं अभी तक आपका नाम नहीं जानती…

संगीत नाम है मेरा…. अब ये मत कहना आपका नाम संगीता है… वो एक बार फिर ठहाका मारकर हंसा…

लो दो बार हंस दिए मतलब पूरे हज़ार देना पड़ेंगे अब तो… वैसे मेरा नाम गीत है…

ह्म्म्म… तभी तो मैं अक्सर कहता हूँ…

क्या कहते हैं जनाब?

“मैं हमेशा वहां सबसे अधिक पाया जाऊंगा जहां मेरा ज़िक्र सबसे कम होगा… गीत का संग मिल गया तो संगीत पूरा हुआ… ”

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