भारत का वातावरण कर रहा है अपने तानाशाह का इंतज़ार

कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों का सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने के प्रयास का मैं हृदय से स्वागत करता हूँ और इसके आश्चर्यजनक परिणामों की अपेक्षा भी करता हूँ.

कल से समाचार आ रहे हैं कि कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध राज्यसभा में महाभियोग चलाने के लिये तैयारी कर रहे है और मुझे लगता है कि वे राज्यसभा में इस प्रस्ताव को लाने में सफल भी हो जायेंगे.

किसी भी महाभियोग के प्रस्ताव को बहस में लाने के लिये लोकसभा में 100 सदस्यों व राजसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है. संख्या बल के अनुसार राज्यसभा में इस तरह के प्रस्ताव के आने की पूरी संभावना है.

यह प्रस्ताव, राज्यसभा व लोकसभा के सभापति द्वारा स्वीकार होगा या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है लेकिन यह महाभियोग चलाने का प्रयास विफल होगा इसमे भी कोई शक नहीं है क्योंकि उसके लिये दोनो सदनों में दो तिहाई बहुमत से इस प्रस्ताव को पास करने की अनिवार्यता है.

अब जब विपक्ष को यह मालूम है कि यह प्रस्ताव सफल नहीं होगा तब उनकी, इस महाभियोग को चलाने की कौन सी मजबूरी है या फिर इससे वे किस परिणाम की अपेक्षा कर रहे है?

इस वक्त कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष इस बात से भयाक्रांत है कि यदि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के मनोबल को कमज़ोर न किया गया या उनको स्वयं, त्यागपत्र के लिये मजबूर नहीं किया गया तो वे अपने समय में, दशकों से विलंबित, उन सब विवादित मामलों पर अपना निर्णय दे सकते हैं, जो भारतीय कानून के अनुसार, विपक्ष के राजनैतिक स्वार्थ के विपरीत हो सकते हैं.

इनमें मुख्यतः राम मंदिर का मामला है जिसे विपक्ष 2019 के चुनावों तक टालना चाहता है. लेकिन सिर्फ यही एक मुकदमा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इस वक्त मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा जम्मू कश्मीर को लेकर अनुच्छेद 35 A का भी मामला देख रहे है और सबसे मारक मुस्लिम समुदाय में हलाला, बहुविवाह और मुताह विवाह की, भारतीय संविधान के अंर्तगत वैधता को भी देख रहे हैं.

यहां एक बात ध्यान देने की है कि किसी भी दल के लिए किसी के विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही चलाने हेतु आरोपित करना आवश्यक होता है. इसलिये यह मान कर ही चलना चाहिये कि कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय के अपने दलाल वकीलों की सहायता से आरोपों का एक पुलंदा पेश करेगी जिसमें दीपक मिश्रा की निष्ठा व ईमानदारी को चुनौती दी जाएगी.

अब क्योंकि कांग्रेस को फ़र्ज़ी केस व सबूत बनाने व उसको अपने मीडिया के दलालों द्वारा प्रचारित करवाने का लंबा अनुभव है इसलिये कमोवेश प्रथमदृष्टया वो लोगों को ‘इसमें कुछ तो है’ का आभास देगा.

कांग्रेस व विपक्ष इसी ‘इसमें कुछ तो है’ के सन्देह को भारत की जनता में, वह भी खास तौर से शुचिता व आदर्शो के भार से दबे राष्ट्रवादियों के मस्तिष्क में बैठा देना चाहती है.

उनका यह अनुमान है कि एक बार मुख्य न्यायधीश के चरित्र हनन करने के प्रयास में सफल हो गये तो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ऊपर, जस्टिस सौमित्र सेन व जस्टिस दिनकरन की तरह इस्तीफा देने के उदाहरण का अनुसरण करने की नैतिक जिम्मेदारी का दबाव आ जाएगा.

यह सब तो हो गया विपक्ष का पक्ष और उनके आंकलनों की संभावनाओं का परिदृश्य… लेकिन उसके साथ एक और पक्ष है, जिसकी संभावना से मैं इनकार नही कर पा रहा हूँ.

यदि गौर से देखा जाय तो यह विपक्ष का न सिर्फ ज़बरदस्त दिवालियापन है बल्कि निराशा के वेग में वे मोदी जी के हाथों अपने अस्तित्वों को खेल गये हैं.

अब यहां मैं भारत में पिछले करीब 4 वर्षो से हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में एक हो सकने वाली संभावना की तरफ इशारा कर रहा हूँ और इसको अतिशयोक्ति मत समझियेगा.

आज धर्मनिर्पेक्षता की ढाल में, एक वर्ग ने भारत की पूर्व भ्रष्ट व्यवस्था का पक्षधर होकर, अमेरिका में दास व्यवस्था की तरह, भारत को दो भागों में बाँट दिया है.

आज भारत की मीडिया, बुद्धिजीवी वर्ग और कांग्रेस-वाम व उनके सहयोगी विपक्ष को उनके अहंकार व भ्रष्ट आचरण पर हो रहे प्रहार से उत्पन्न विक्षिप्तता ने उन्हें अमेरिका की दास व्यवस्था के पक्षधर राजनीतिज्ञों और जनता के समकक्ष खड़ा कर दिया है.

उन का उन्माद और धृष्टता इस बात को लेकर इत्मीनान में है कि भारत की ज्यादातर जनता, विशेषकर हिन्दू, संकोची और भीरु है, और वह लोग अपनी ‘खाओ और खाने दो’ की विचारधारा व स्वार्थ के आक्रमण से, बाकी सहिष्णु जनता और स्वार्थी हिन्दू को अपनी बात स्वीकार्य करा लेंगे.

इसी लिये वे भारत के संवैधानिक स्तंभों व तंत्रों का न सिर्फ निरादर कर रहे हैं, बल्कि उस पर आक्रमण भी कर रहे हैं.

कांग्रेस के नेतृत्व में इन लोगों ने भारतीय लोकतंत्र और उससे चुनी गयी सरकार का देश-विदेश में उपहास उड़ाने व घिनौना दुष्प्रचार करने के साथ भारतीय सेना से लेकर भारत की मूलभूत संस्कृति पर आक्रमण किया है.

यही नहीं, बल्कि अपनी कुंठा में भारत के शत्रु राष्ट्रों पाकिस्तान व चीन से भारतीय जनता की भावनाओं के विपरीत उनका पक्ष लेते हुये, भारत का भी अपमान किया है.

भारत की सरकार को लज्जित करने के लिये कांग्रेस व वामियों ने, भारत की सीमाओं पर चीनी घुसपैठ और पाकिस्तान की सीमाओं पर रक्तिम झड़प को न सिर्फ राजनीति का मोहरा बनाया है बल्कि चीन व पाकिस्तान के समर्थन में खड़े होने से भी परहेज़ नहीं किया है. मुझे पूरी आशा है कि आने वाले वर्ष में, चीन की तरफ से सीमा पर दबाव बनाया जायेगा.

अब आज यह सब करके, अपनी विफलता से कुंठित यह लोग, मुख्य न्यायाधीश पर आक्रमण करके न्यायालय की लड़खड़ाती अस्मिता को ध्वस्त करने का अक्षम्य अपराध करने वाले है. जो भूल अमेरिका के दक्षिण के राज्यों ने की थी, वही भूल भारत के यह राजनैतिक दल और स्वार्थी भारतीय करने जा रहे हैं.

आज जो विपक्षी दल अपने अस्तित्व की रक्षा में भारत को ही दांव पर लगा रहे है, वे यह समझने में भूल कर रहे हैं कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भारत के अस्तित्व की रक्षा की ही लड़ाई लड़ रहे हैं.

आज मोदी जी भारत के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिये किस हद से गुज़रेंगे यह वर्ष के अंत तक पता चल जाने की पूरी संभावना है. जो लोग उनकी झोला उठा कर चल देने की बात को गम्भीरता से ले रहे हैं उन्हें यह बता देना चाहता हूँ कि ऐसा नहीं होने वाला है.

दरअसल भारत का वातावरण अपने तानाशाह का इन्तज़ार कर रहा है. जिस तरह लिंकन ने दासता पर समझौते तक की बात की थी, वैसे यहाँ भी 16 मई 2014 से कोशिश हो रही थी. जिस तरह अमेरिका के दक्षिण के राज्यों ने उसे उस वक्त अस्वीकार कर दिया था वैसे ही भारत में बराबर, सहिष्णुता और व्यवस्था परिवर्तन को धर्मनिरपेक्ष और स्वार्थी वर्ग अस्वीकार कर रहा है.

मुझे तो यही लग रहा है कि अब अमेरिका की तरह भारत तभी बचेगा जब एक तानाशाह, एकाधिपति और निरंकुश शासक, भारत के लोगों को राष्ट्र की कीमत समझायेगा और काल संभावना को जन्म दे रहा है.

Comments

comments

loading...

1 COMMENT

LEAVE A REPLY