ऐसे गुलामों से तो इक़बाल-मोहानी बेहतर, जो जानते थे कि इस देश के लिये क्या हैं राम

पहले मैं सोचता था कि हज़ार-बारह सौ सालों की गुलामी के नतीजे में हिन्दुओं का स्वाभिमान भाव लुप्त हो गया है और इसीलिये वो आज भी गुलाम, दब्बू और धिम्मी मानसिकता के साथ जीता है.

पर मैं अपनी इस सोच पर अधिक दिन तक कायम नहीं रह सका. युसूफ बिन हज्ज़ाज़ की तारीख पढ़ने के दौरान जो तथ्य मेरे हाथ लगे उसने तो मुझे हैरान कर दिया.

दरअसल तब मुझे समझ आया कि ‘धिम्मी’ मनोवृति हममें से बहुसंख्यकों के डीएनए में है जिसके नमूने आपको फेसबुक पर दिख जायेंगे.

‘धिम्मी’ मनोवृति इसलिये क्योंकि ये गुलामी में रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं, ‘धिम्मी’ इनको इसलिये कहा क्योंकि इनको गुलामी में मज़ा आने लगता है.

‘धिम्मी’ इसलिये भी कहा क्योंकि ये लोग गुलामी में भी आपस में होड़ करने लगते हैं कि तूने मालिक और आका का थूक चाटा है तो मैं अब उनका विष्ठा खाकर तुमको उनकी नज़रों में कमतर कर दूँगा.

‘धिम्मी’ इसलिये क्योंकि ये न सिर्फ खुद गुलामी को एन्जॉय करते हैं बल्कि ये ऐसा इंतजाम भी कर जातें हैं कि उनकी आनी वाली पीढ़ी भी उसी गुलामी के कीचड़ में आनंदित होती रही.

मुहम्मद बिन कासिम हज्ज़ाज़ बिन यूसुफ़ का सिपहसालार था. वो सिंध की ओर आया विजयी हुआ तो वहां के कुछ मठाधीशों को लगा “कोई हो नृप हमें क्या हानि” और वो एक प्रतिनिधिमंडल की शक्ल में हज्ज़ाज़ के दरबार में पहुँच गये और उससे कहा, मालिक! आका! आप हमारी हैसियत तय कर दो.

ये हज्ज़ाज़ की ज़िन्दगी का सबसे हैरान करने वाला क्षण था क्योंकि जिस सिंध ने उसकी सेना का दो सौ उन्तीस साल तक प्रतिरोध किया हो उसी सिंध से ऐसे लोग भी मिल सकते हैं ये उसकी कल्पना से परे था तो वो पूछ बैठा कि कैसी हैसियत तय कर दूँ?

इस प्रतिनिधिमंडल का जो सबसे बड़ा चमचा था उसने कहा, आपका मजहब दुनिया को अहले-किताब और काफ़िर कहकर बाँटता है तो फिर आपकी नज़र में हम हिन्दुओं की हैसियत क्या है क्योंकि आपके कुरान में तो हमारे बारे में कुछ नहीं है?

हज्ज़ाज़ ने मामले को ख्वाजा हसन बसरी के सुपुर्द कर दिया. हसन बसरी ने फतवा दिया, “देखिये चूँकि हमारे मुकद्दस किताब में आपके बारे में कुछ नहीं आया है और आप ये कहते हो कि आपके पास भी वेद के रूप में एक आसमानी किताब है तो फिर हमको आपके अहले-किताब होने पर शुबहा है, शक है, इसलिये हम आपको ‘शुबहे-अहले-किताब’ की श्रेणी में रखते हैं और इस्लामी रियासत में आपकी हैसियत ‘दोगले’ की होगी”.

हसन बसरी ने ‘दोगला’ शब्द नहीं कहा पर उनके द्वारा तय की गई हैसियत यही थी. यानि हमारे अपने लोगों ने अपने लिये ‘दोगले’ होने का तमगा हासिल कर लिया और लहालोट होकर वहां से लौट आये.

डीएनए में गुलामी की जो घुन लगी थी वो मुग़ल काल में अपने चरम पर थी और आज तक कुछ लोगों की धमनियों में प्रवाहित हो रही है.

ऐसे लोग इतने बुज़दिल हैं कि उनको श्रीराम के लिये अनर्गल शब्द प्रयोग करने में आपत्ति नहीं होती पर इनको दूसरे मजहब के आदरणीय पुरुषों का नाम बिना उनके मजहबी संबोधन के लेने की हिम्मत नहीं होती. इनको सामने वाला मज़हब सृष्टि का आदिधर्म लगता है पर श्रीराम एक काल्पनिक चरित का नायक जिसे गुप्त-राजाओं और तुलसी ने गढ़ा.

इन जाहिलों को ये नहीं पता कि इस्लाम से करीब पन्द्रह सौ साल पहले के अरब के काव्य संग्रहों में श्रीकृष्ण का वर्णन है. इनको ये नही पता कि बोरोबदूर, अंकोरवाट और माया सभ्यताओं में श्रीराम और हनुमान की मूर्तियाँ मिलती हैं.

इनको ये नहीं पता कि अंडमान द्वीप समूह को वहां के मूल निवासी न जाने कितने सदियों से हनुद्वीप समूह के नाम से जानते हैं क्योंकि पवनपुत्र हनुमान ने यहाँ विश्राम किया था.

ये वेद में राम का नाम खोजते हैं पर इन जाहिलों को ये भी नहीं पता कि वेद श्रीराम के धराधाम पर आने से पहले अवतरित हो चुका था.

इन जाहिलों की ये भी नहीं पता कि अगर मुगलकाल में हुये तुलसी के कारण भारत में राम की पूजा शुरू हुई तो इस्लाम के बुज़ुर्गों को राम और कृष्ण को लेकर नौवी और दसवीं सदी में फतवे क्यों देने पड़े और देश की हिन्दू जनभावनाओं के सम्मान के लिये ये क्यों कहना पड़ा कि श्रीराम और श्रीकृष्ण की शान में गुस्ताख़ी करने की अनुमति किसी को नहीं है.

बारहवीं सदी में गुजरे एक मुस्लिम बुजुर्ग हजरत मज़हर जानेजानां साहब ने अपनी किताब में ‘दरबयान आनीने कुफ्फारे हिंद’ शीर्षक से लिखे एक आलेख में लिखा था –

“जानना चाहिये कि आयते-करीमा के हुकुम के रु से और ‘इम्मी उम्मातिन इल्ला खहा फीहा नज़ीर’ और अन्य कई दूसरी आयतों की रु से हिंदुस्तान के मुल्क में कई अवतार प्रकट हो चुके हैं जिनमें प्रसंग उनकी पुस्तकों में मज़बूती से दर्ज़ है और उसके आसार से ये स्पष्ट है कि वो रुतबा-ए-कमाल और तबलीग रखते थे.”

हजरत मज़हर जानेजानां साहब इस मुल्क में अवतरित किसी बुजुर्ग की शान में की गई गुस्ताखी से मना फरमाते थे. वो तो ये तक कहा करते थे कि पवित्र कुरान की आयते शरीफा ‘व इम्मिन उम्मातिन इल्लाखला फीहा नज़ीर’ के अनुसार स्पष्ट है कि हर जमात में एक खुशखबरी सुनाने वाला और सावधान करने वाले गुजरे हैं और श्रीराम और श्री कृष्ण खुदा के वली, दोस्त या अवतार थे’.

ऐसे गुलाम से तो अल्लामा इक़बाल और हसरत मोहानी बेहतर हैं जिनको पता था कि इस देश के लिये राम क्या हैं.

खैर, मैंने ऐसे लोगों को ‘धिम्मी’ इसीलिये कहा है क्योंकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी इनके डीएनए में है. श्रीराम के बारे में अनर्गल लिखने वाले ये लोग उन्हीं धिम्मियों की संततियां हैं जो ‘गुलामी’ को एन्जॉय करते रहे हैं और खैरात जिनके बुद्धि की सारथी रही है.

2014 हमारे स्वाभिमान का प्रकटीकरण था जिसने भ्रमित और अज्ञान में सो रहे लोगों को भी जामवंत बनकर जगा दिया, पर दुर्भाग्य से हमारे बीच ऐसे लोग भी हैं जिनका डीएनए आज भी उनको गुलामी से बाहर नहीं आने दे रहा है.

“जो शंख बजने पर भी नहीं जगा वो अलार्म सुनकर भी नहीं जागने वाला है”, ऐसे लोगों के माथे पर “मैं धिम्मी हूँ” का स्टीकर चिपका दीजिये यही अंतिम समाधान है.

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