जा रे… जा रे उड़ जा रे पंछी…

हाँ,
तुम्हारे शहर ही तो जा रही थी
….वो रेलगाड़ी !

और उसमें,
एक औरत….
विश्वास से भरपूर
बिल्कुल तुम्हारी तरह !
उसी भाषा में गा रही थी
जो तुम्हारी भाषा है.

और मैं…
एक पैर पायदान
और दूसरा प्लेटफ़ॉर्म पर रखे हुए,
आँखें मूँदकर
बस उसे सुने जा रहा था
गीत-दर-गीत !!

कि तभी
बंद आँखों के भीतर
मुझे तुम दिखाई दीं !
…हँसती हुई.

और तुम्हारे पीछे
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर,
हौले – हौले बुदबुदाते
शायद, “आमार सोनार बांग्ला ” !!

अचानक,
रेलगाड़ी चल पड़ी !
“बाबू ssss…”
चिल्लाते हुए मुझे किसी ने परे धकेल दिया.

देखा तो वही औरत थी,
गले में अपना हारमोनियम लटकाये.
जो चलती हुई ट्रेन के साथ,
मुझसे और दूर होती जा रही थी.

सुनो…
नहीं आना चाहता मैं
…तुम्हारे शहर !

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