धारा 35A पर छाये सन्नाटे को तोड़ने JKSC का शंखनाद

बचपन में कोर्स की किताबों में यही पढ़ा था कि भारत का संविधान डॉ अम्बेडकर साहब की अध्यक्षता में संविधान सभा ने बनाया था. भारत में कोई भी कानून तभी बनता है जब वो बहुमत से पास हो. संविधान में संशोधन करने के लिए बहुमत दो तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ती है.

संसद से कानून पास होता है , या संविधान संशोधन होता है फिर वह राष्ट्रपति के पास जाता है और उनके साइन स्टैम्प के बाद देश में लागू होता है.

यही एक सामान्य प्रोसीजर है.

लेकिन एक संविधान की धारा ऐसी है जिसे संविधान सभा ने नहीं बनाया. जिसे किसी संसद ने पास नहीं किया. राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान में एक धारा जोड़ दी.

और इस तरह से जोड़ी गयी कि किसी को कानोकान खबर नहीं हुई. सरकारी गैर सरकारी संविधान की किताबों में जिसका कहीं कोई जिक्र नहीं होता. और खुद कानून, संविधान के जानकार इस धारा से अनजान थे.

महज कुछ साल पहले इस आर्टिकल 35A के बारे में पता चला जिसे 1954 में प्रधानमंत्री महान नेहरू जी की सलाह पर डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपने साइन से संविधान में जोड़ा था. जिसे संसद से पास नहीं कराया गया.

और इस आर्टिकल में ऐसे प्रोविजन किये गए कि भारत की संसद इसे हटा न सके.

सन 1947 में जब कश्मीर का विलय भारत में हुआ तब कोई शर्तें राजा हरि सिंह ने नहीं लगाई थीं. वो इस हालत में थे भी नहीं. कबायलियों के भेष में पाकिस्तानी हमले को झेल रहे हरि सिंह अपना राज्य बचाते या शर्ते रखते.

आर्टिकल 370 जो कहने को कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देता है , लेकिन दरअसल भारत को कश्मीर के प्रशासन चलाने के अधिकारों को बेहद सीमित कर देता है, उसे शेख अब्दुल्लाह की मांग के तौर पर भारत के संविधान में जोड़ा गया था.

आंबेडकर साहब इसके खिलाफ थे, लेकिन नेहरू की ज़िद थी. भारत के संविधान में धारा 370 जोड़ी गयी, लेकिन टेम्प्रेरी तौर पर. धारा 370 कश्मीर में सामान्य स्थिति और लोकतंत्र की बहाली तक के लिए थी.

लेकिन फिर 1952 में शेख अब्दुल्लाह और नेहरू में दिल्ली समझौता हुआ, जिसके बाद गुपचुप तौर पर धारा 35A संविधान में स्थाई तौर पर जोड़ दी गयी.

धारा 370 को हटाने का अधिकार कश्मीर की संविधान सभा को ही था, वो 1956 में भंग हो गयी. धारा 35 A कैसे हटेगी, इसका रास्ता ज्ञात नहीं.

कश्मीर में एनसीपी पीडीपी हुर्रियत यहाँ तक की जम्मू और लद्दाख के लोग भी धारा 35A को हटाने के खिलाफ एकजुट हैं.

चार साल पहले We The Citizens नाम के एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में धारा 35A की लिगालिटी को चैलेंज किया. तीन जजों की पीठ इस पर सुनवाई कर रही है. लेकिन चीफ जज दीपक मिश्रा जी ने इसे सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को सौंपने संकेत दिया है.

कश्मीर में अब्दुल्लाह बाप बेटे, हुर्रियत के नेता, और स्वंय मुफ़्ती महबूबा धारा 35A हटाने, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किये जाने पर कश्मीर में आग लग जाने की धमकियाँ दे रहे हैं.

ऐसे में शेष भारत में अजीब सा सन्नाटा है.

इसी सन्नाटे को खत्म करने के लिए , धारा 35A आखिर क्या है , इसके क्या प्रावधान हैं , कैसे ये कश्मीर को देश की संस्कृति में शामिल होने में रूकावट है , इसके ऊपर हम एक गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं.

आगामी 22 अप्रैल को दस से एक कश्मीर पर फिर से गोष्ठी रहेगी, जिसे JKSC के विशेषज्ञ सम्बोधित करेंगे.

धारा 35A के अतिरिक्त कश्मीर पर अन्य भी चर्चाएं होंगी.

इसके अलावा आयोजनकर्ता समर्थ स्टडी सर्कल द्वारा कुछ राष्ट्रवादी लेखकों का सम्मान किया जायेगा. राष्ट्रवादी वेब पोर्टल एवं फेसबुक पेजेस को भी सम्मानित किया जायेगा.

आशा है, आप बड़ी संख्या में इस आयोजन में भाग लेकर सफल बनाएंगे.

आयोजन स्थल दिल्ली रहेगा. स्थान और पूरा एजेंडा कुछ दी दिनों में फ्लायर के रूप में आप तक पहुंचेगा.

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