जीवन-रेखा : मैं अज्ञात हूँ, तुम्हारे खोजे जाने तक…

आजकल बहुत बोलने लगी हूँ
इतना बोलना भी ठीक नहीं
नज़र लगते देर नहीं लगती

पिछली बार जो काजल का डिठौना
होठों पर लगाया था
उतर कर गर्दन पर आ गया है

सुराही के छेद से रिस कर तृष्णा
नाभि पर तृप्ति बन इकठ्ठा हो रही है
तुमने ही तो कहा था प्यास को
इतना पानी पिलाओ कि
उसे खुद याद न रहे
कि वो प्यास है

तो कौन किसकी प्रतीक्षा में बैठा है
अब यह भी याद नहीं…
तृप्ति की गाथाएं बहुत जानी पहचानी सी हैं
लेकिन प्यास को तृप्ति में बदलते कितनों ने देखा है

जाने पहचाने भावों में कैसे दिखेगी
उस अनजानी प्यास-तृप्ति के रूपांतरण की कहानी
जो उपजी है अज्ञात से प्रेम के कारण

देखने की प्रथा भी तो सृष्टि के उपजने के साथ जुड़ी है
अनदेखे को मेरी तरह
सदैव नज़रों में बसाए रखना कितनों ने सुना है

क्या सुनना भी
ॐ की उत्पत्ति जितना पुराना नहीं?
हाँ ये एक नई बात है कि
तुम्हारी अनकही बातों को
मेरे कान की बाली से टकराकर लौटते
किसी ने नहीं देखा, जाना या समझा…

लेकिन जितना जान लिया है
उससे तो वो अन-जाना ही बेहतर है ना!

क्या अब भी तृप्त नहीं हुई है जिज्ञासा
और कितना मुझे जानने की चाह बची है
पहले भी कहा था आज फिर कहती हूँ
मैं रोज़ नई हूँ
अपने ही पुराने किसी स्वरूप के
ठीक विपरीत,
मेरी देह को जनने वाले भी मुझे जान न सके
जिनकी आत्मा को मैंने जना वो भी मुझे जान न सकेंगे
पुराना जानने तक मैं नई हो चुकी होऊंगी
ज्ञात शब्दों में अज्ञात के अर्थ नहीं मिलेंगे…

पर तुम जान लो..
ये जो ‘मैं’ ‘मैं’ कहती रहती हूँ
जिसे लोग मेरा अभिमान कहते हैं
वो मेरा गर्व है
क्योंकि उस ‘मैं’ में भी
‘तुम’ ही ध्वनित हो
लेकिन इसको सुनने के लिए
ज्ञात ज्ञानेन्द्रियाँ पर्याप्त नहीं होती…

मैं तो फिर भी शम, दम, दण्ड, भेद लगा
अज्ञात भाव को
ज्ञात पर सवार कर तुम तक पहुंचा ही देती हूँ
क्योंकि मुझे तुम्हें कहीं खोजना नहीं था,
तुम तो मेरा ही अविष्कार हो
मैंने तुम्हें रचा है अपनी रचनाशीलता से
काया दी है अपनी कल्पना से
नाम इतने दिए हैं कि
तुम्हें अपना सांसारिक नाम भी याद न होगा

लेकिन तुम्हारी कोई बात मुझ तक पहुंच नहीं पाती
मैं इतनी ही अज्ञानी हूँ…
और अज्ञात भी…
जब तक तुम मुझे खोज नहीं निकालते…

– माँ जीवन शैफाली

जीवन-रेखा : वो बहुत झगड़ालू हो गयी है, आजकल ईश्वर से ठनी है…

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