हिन्दुओं को सगर्व जीने के लिए अत्यावश्यक है हिन्दू अर्थव्यवस्था

आज, अभी कुछ मिनट पहले एक ऑडियो सुना. उसमें एक युवा रो रहा था. किसी से गिड़गिड़ाकर मिन्नतें कर रहा था कि मुझे FIR से बचा लो, मेरी नौकरी चली जाएगी. मेरे पिता भी सरकारी नौकरी में ही हैं.

क्या विषय था, किससे किसकी किस विषय पर बात हो रही थी इसपर मुझे कुछ भी नहीं कहना है और आप से भी यही दृढ़ता से कह रहा हूँ कि इस लेख का विषय अलग है.

बात यही कहना चाहता हूँ कि हमें हिन्दू इकॉनमी की ज़रूरत क्यों है.

कई बार लिख चुका हूँ कि नौकरी ही जीवन का लक्ष्य बनाकर वामपंथियों ने हिंदुओं को हिजड़ा बना दिया है. आज उस युवा की आवाज़ में जो डर था वो इसी बात की पुष्टि रहा था. दुख उस बात का है.

वो बाकायदा भयभीत हो कर रो रहा था, सुबक सुबक कर; और मुझे उसके साथ उसके रीढ़ की हड्डी पानी-पानी हो कर टपकती सुनाई दे रही थी।

नौकरी खोने का डर, FIR हुई तो दूसरी नौकरी न मिलने का डर.

क्या खेल खेलने दिया है हमने इन वामपंथियों को हमारे साथ? क्या हम समझ भी रहे हैं किस कदर हमें ब्रॉइलर बना दिया गया है? क्या हमारे सारे लोग इस कदर अंधे हो गए हैं कि इसके परिणाम उन्हें समझ ही नहीं आ रहे?

इस मामले में कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं था, कहीं भी कोई मुसलमान नहीं है, फिर भी लेख के संदर्भ में उनका उल्लेख अनिवार्य है, कैसे यह समझ में आ जाएगा.

FIR से मुसलमान क्यों नहीं डरता?

आज आवश्यक है कि यह सवाल हम खुद से सभी अभिनिवेश, सभी पूर्वाग्रह छोड़कर पूछें.

जहां तक मुझे समझ में आता है, वह इसलिए नहीं डरता क्योंकि वह आजीविका के लिए नौकरी पर ही निर्भर नहीं है. जहां कॉर्पोरेट में नौकरी करता भी है वहाँ वो अपने ‘सामाजिक इमेज के डर’ के डर का इस्तेमाल कर के मज़े से रहता है – यह अपने आप में अलग विषय है उसपर अलग से.

मुद्दा यह है कि अधिकतर वो नौकरी पर निर्भर नहीं रहता और किसी काम को छोटा नहीं समझता अगर उससे अच्छे पैसे मिलते हों.

हमारी यही गलती है. ‘मूंछ’ हथकड़ी है, पैरों की बेड़ी है. बाकी नौकरी में कोई भी कुछ भी बोल दें तो ब्लड प्रेशर की गोलियां खा लेंगे लेकिन करेंगे नौकरी ही, क्योंकि नौकरिया बिना छोकरिया नाहीं मिलत.

फ़ैक्ट है, एक युवा मित्र जिनका विवाह तय हुआ है, उन से मैंने पूछा था – अगर आप इस फेमस कंपनी की बजाय कोई ऐसी जगह नौकरी कर रहे होते या फिर खुद का व्यवसाय कर रहे होते जहां आय इस सैलरी से अधिक होती…

मेरी बात भांपकर, बीच में काटते ही उन्होने तपाक से बता दिया – तो इस लड़की का रिश्ता नहीं आता. यही पूछने जा रहे थे न आप?

इस mindset को किसने हमारे गले उतारा और इससे हमारे ही पैसों से हमारे लिए ही बेड़ियाँ बनाई?

क्या यही FIR का डर नहीं होता जहां कॉलेज में कोई वामपंथी अध्यापक आप की सहपाठी लड़कियों से दोहरे अर्थ वाले शब्दों में बात करें और आप का उसे कोई डर नहीं होता? क्या वो ऐसी बात किसी मुस्लिम छात्रा से कर सकता है?

ये डर उनकी मर्दानगी का नहीं. ये मर्दानगी, अगर उसे आप यह कहना चाहें, तो आर्थिक स्वतन्त्रता से आती है. बाकी हिंदुओं में किसे नहीं छेड़ते यह क्लास और कास्ट का विश्लेषण आप खुद ही कर लीजिये, वहाँ भी आप को यही मिलेगा कि उनके प्रत्युत्तर का जोश, उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता में ही है.

ऐसे ही रोने का एक सुना हुआ उदाहरण है एक अधिवक्ता मित्र से.

दंगे में पत्थरबाजी का प्रत्युत्तर देने के लिए एक युवा पर FIR हुई थी और वहाँ के एक अखबार ने नियमों का भंग करके सब के नाम छाप दिये थे.

इसको HR वाले ने बुलाकर पूछा – टर्मिनेट करूँ या रेज़िग्नेशन दे रहे हो? यह वकील साहब के पास आकर – उनके ही शब्द हैं – दहाड़े मार कर रोया.

उन्होने अपने सभी परिचयों का उपयोग किया, लड़के की नौकरी बच गयी. लेकिन वकील साहब की आवाज़ में उसकी नौकरी बचाने की खुशी से अधिक हिंदुओं के लिए एक जुझारू कार्यकर्ता खोने का दुख था, उन्होने ऐसे कहा भी, और आज यह लिखते हुए मुझे भी कोई खुशी नहीं हो रही, दर्द उनके जितना ही है.

कब सोचेंगे इस विषय पर? वैसे not my concern कहकर, या ‘हम क्या कर सकते हैं?’ कहकर कंधे उचकाने से क्या होगा तो हर बीतते दिन, हर बीतते साल के साथ, संघर्ष की कीमत बढ़ते जाएगी. हाँ, संघर्ष की कीमत होती है. Conflict is never without a cost.

चाणक्य सीरियल का एक डायलॉग मुझे बहुत प्रिय है. “भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं है; उस सांस्कृतिक दासता का भी है जो धीरे-धीरे समाज में जन्म लेगी. पराजित राष्ट्र तब तक पराजित नहीं होता जब तक वह अपनी संस्कृति और मूल्यों की रक्षा कर पाता है. पर क्या धर्म और जाति के नाम पर खंड-खंड बंटा यह राष्ट्र आक्रान्ताओं से अपनी संस्कृति की रक्षा कर पायेगा? यदि आक्रान्ताओं को इस धरती पर स्थिर होना है तो उन्हें इस, व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़नेवाली, संस्कृति पर आक्रमण करना होगा… और वे करेंगे, यदि हम सावधान नहीं हुए तो!”

समय अभी भी बीता नहीं है, लेकिन कम बचा है. यह न भूलिए कि संघर्षों और युद्धों के नतीजे कम्युनिकेशन की गति पर निर्भर होते हैं, और आज हम फ़िफ्थ जनरेशन वॉर या निओ कोर्टिकल वॉरफेयर की बात कर रहे हैं. समय वाकई कम है.

सम्पन्न सफल हिंदुओं को, पंजाब और सिंध के हिंदुओं को याद करना होगा, काबुल के हिंदुओं को याद करना होगा. Not the numbers in your account but only the numbers around you will defend you – or loot you, depends on your relations with them. Build your defences.

फ्रांसीसी राज्यक्रांति को भी पढ़ें.

हिन्दू इकॉनमी कोई रॉकेट साइन्स नहीं. अपने से कमजोर का ध्यान रखें, शोषण न करें और जरूरत के समय साथ दें. और सब से बड़ी बात जिसे इगनोर करने से हमने बहुत नुकसान उठाया है – वचन का पालन करें.

उम्मीद है कि आप के लिए आप की अगली पीढ़ी मायने रखती है. वामपंथियों के लिए नहीं रखती. अक्सर उनकी होती भी नहीं क्योंकि अगली पीढ़ी तब होगी जब वे विवाह संस्था में विश्वास रखते हों.

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