क्या पूछेंगे नहीं लोकतंत्र के चौथे खंभे से पहला सवाल!

लखनऊ शहर की कुल आबादी है लगभग 42 लाख. साल 2014 में उत्तर सरकार के सूचना विभाग के आंकड़ों के अनुसार शहर में दैनिक अखबारों की कुल बिक्री है लगभग 90 लाख प्रति प्रतिदिन.

आबादी के हिसाब से शहर में कुल परिवार हुए लगभग 8 लाख 50 हज़ार (यदि प्रति परिवार पांच की संख्या हो तो).

सरकारी आंकड़े यह भी कहते हैं कि अनुमानतः आबादी के 20 प्रतिशत परिवार ही अखबार खरीदते हैं.

इस मुताबिक शहर में दैनिक अखबार खरीदने वाले कुल परिवारों की संख्या हुई लगभग 2 लाख 10 हजार.

तो मालिक देखिये, कैसे तहज़ीब और अदब का शहर इतना पढ़ता है / इतना बिकता है!

[कलम के लुच्चों, लफंगों, आतंकवादियों से आज़ाद होना चाहिए प्रेस क्लब]

मेरी एक महिला मित्र है और मुस्लिम है.

वो लखनऊ के उसी बार्लिंगटन चौराहे पे आफिस रखती है, जहां लखनऊ के मशहूर गुप्त रोग विशेषज्ञ डॉ. जैन का क्लिनिक भी है.

मुस्लिम का ज़िक्र इसलिए किया, क्योंकि वो बुर्का पहनती है… और यह उसके पेशे में मदद करता है. कोई उसे जल्दी पहचान नहीं पाता, वो सबको पहचानती है.

हर रोज़, हर हफ्ते उत्तर प्रदेश की राजधानी सहित तमाम ज़िलों से छपने वाले और फ़र्ज़ी तरीके से हज़ारों/ लाखों में सर्कुलेशन बेचते दैनिक, साप्ताहिक अखबार छापती है : लेकिन सौ-दो सौ-तीन सौ की ‘सर्कुलेशन’ उर्फ़ कॉपी में.

छापती ही नहीं, रोडवेज़ की बसों, ट्रेनों और कुरियरों के हाथों… गाँवों, तहसीलों, ज़िलों में पाए जाने वाले दलाल संपादकों उर्फ़ अखबार मालिकों, उर्फ़ मुद्रकों उर्फ़ प्रकाशकों उर्फ़ हॉकरों तक ऑर्डर पहुंचवाने की व्यवस्था भी करती है. मेरी मित्र अपने पेशे में बेहद नैतिक और ईमानदार है.

यह है… वो उत्तर प्रदेश की दलाल मानसिकता की पीत (यलो) पत्रकारिता… जो साल 2014 से मार्च 2017 के समाजवादी सरकार के 4 सालों में सालाना 6 सौ करोड़ की दर से… 24 सौ करोड़ की सरकारी दलाली खा चुकी है.

मार्च 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद से मेरी वही महिला मित्र अपने धंधे में मंदी की बात करती है.

मंदी की वजहें समझी जा सकती हैं. मार्च 2017 को खत्म हुए वित्तीय साल के बाद उत्तर प्रदेश सूचना विभाग ने अपने जिस सालाना बजट को लगभग 100 करोड़ से बढ़ाकर 600 करोड़ रुपये का कर दिया था, उसे वापस 100 करोड़ कर दिया, जो पर्याप्त है.

मंदी की वजहों में उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ और फैसले भी हैं. सत्ता परिवर्तन के साथ ही राजधानी में बड़ी संख्या में सचिवालय, विधानसभा पास, वाहन पास आदि रद्द किए गए, जिसने दलाल मानसिकता के तथाकथित मीडियाकर्मियों की सत्ता के केंद्र की गणेश परिक्रमा बंद कराई.

सत्ता के केंद्र, सचिवालय के अहाते में प्रवेश से महरूम राजधानी के तथाकथित संपादकों, अखबारनवीसों, हॉकरों की तमाम गाड़ियों को सड़क के किनारे फुटपाथ पर पार्क होने के दर्द को देखिये कभी, तब बदले दिनों की आहट सुनाई देगी.

शायद यही कम नहीं, पत्रकारिता के नाम पर बड़ी संख्या में मान्यता हासिल करने पर भी कड़ी नज़र है और बड़ी संख्या में मान्यताएं खत्म भी की गई हैं. साथ ही सरकार, पत्रकार कोटे से आवंटित सरकारी आवासों के किराए को बाज़ार दर पर वसूलने का निर्णय बीते दिनों ले चुकी है.

लोकतंत्र के पहले और चौथे पेशेवर खंभे की जुगलबंदी का आनंद लेते हुए ज़रा यह सोचिये कि साल 2014 के इन आंकड़ों में, चुनावी साल 2016-17 आते-आते उत्तर प्रदेश की राजधानी में ही अखबारों के बिकने और उनको मिलते सरकारी विज्ञापनों की संख्या और कीमत में कितनी बढ़त हुई होगी, पूरा प्रदेश अभी किनारे रखते हैं.

पूछेंगे नहीं पहला सवाल लोकतंत्र के चौथे खंभे से! किन पाठकों के लिए लखनऊ शहर आंकड़ों में छापता है 90 लाख अखबार रोज़ाना? किन अखबारों में जाते रहे हैं ये सैकड़ों करोड़ के विज्ञापन ?

मेरी महिला मित्र अपने धंधे की मंदी की वजह बखूबी जानती है और कहती है : भई… कभी दिए दाम ने बोला, अब काम बोल रहा है.

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