राम से वाल्मीकि की महिमा है, वाल्मीकि से राम की नहीं

प्रभु राम को लेकर एक दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है कि वाल्मीकि ने उन्हें अमर कर दिया वर्ना राम जैसे तो कई लोग यहाँ गुजरे हैं.

इन जाहिलों को मैथिलीशरण गुप्त की लिखी ‘साकेत’ पढ़नी चाहिये जिसमें वो कहते हैं – “राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है”.

गुप्त की ये पंक्ति कितनी यथार्थ है इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि वाल्मीकि और उनके बाद जिसने भी रामचरित लिखा वही इतिहास में अमर हो गया.

जिसने राम का आश्रय लिया आज सत्ता के शीर्ष पर है. जिसने राम को गाया, आज दुनिया उसकी महिमा गा रही है.

कहाँ तुलसी को काशी के विद्वानों ने दुत्कार दिया था और कहाँ तुलसी आज हर हिन्दू घर में पूजित हैं.

राम पर अधिकार करने की ऐसी मारामारी है कि हर कोई राम को इस रूप में देखना चाहता है मानो वो उसके ही क्षेत्र में अवतरित हुये थे और वो उसके जैसे ही दिखते थे.

भारत से पूर्व की ओर बढ़ते जाइये राम की मूर्तियाँ आपको मंगोलों और थाई लोगों की शक्ल से मिलती दिखेगी.

मिज़ो के राम का आख्यान पढ़ियेगा तो पता चलेगा कि मिज़ो लोगों ने राम को मछुआरे के रूप में चित्रित करके रखा है.

माधव कंदली की रामायण में राम असमिया समाज का प्रिय आहार भात खाते और असमिया कहावत कहते दिखते हैं तो मलेशिया, बाली, सुमात्रा और जावा में राम उसी समाज-जीवन में गुंथे हुये नज़र आते हैं.

भारत तो देव-भूमि रही है और यहाँ समय-समय पर अवतार होते रहे हैं, हरेक के लिये काव्य और स्तुतियाँ भी रची जाती रही हैं पर हरेक मानदंड पर कब्ज़ा केवल राम का है.

बचपन का सौन्दर्य देखना है तो भारत ने ‘ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया’ कहकर राम की ओर देखा. बालहठ देखना था तो भारत के सामने चाँद को धरती पर लाने का हठ करते राम का बाल स्वरुप दिखाई दिया.

प्रेम देखना था तो भारत ने पुष्पवाटिका के राम को देखा और राम के उस प्रबल आकर्षण में जानकी ऐसी बंधी कि उस राम के लिये उन्हें अयोध्या के राजसी वैभव को ठोकर मारने में दो क्षण भी नहीं लगे.

राम त्रेता में आये थे, उनके अवतरण के बाद शायद लाखों-करोड़ों पीढ़ियाँ गुजर गई. इस लंबी अवधि में करोड़ों वैवाहिक रिश्ते बने होंगें पर पति-पत्नी के आदर्श जोड़ी की मिसाल आज भी राम और सीता की जोड़ी से ही दी जाती है.

लाखों साल बीत जाने के बावबजूद पति-पत्नी संबंधों के उत्कृष्टता की मिसाल राम और सीता को छोड़कर कोई और बन नहीं पाया. भाई-भाई के बीच के प्रेम की मिसाल राम और उनके भाइयों से ही दी जाती है.

प्रभु ने अपने जीवन में हर क्षण ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये जो लाखों साल बाद भी मानव-जाति का प्रबोधन कर रहे हैं और दिशा दिखा रहे हैं.

प्रभु अपने भाई लक्ष्मण के साथ अपने जीवन के बेहद आरंभिक काल में ऋषि विश्वामित्र के साथ वन चले गये.

वो वहां कोई सैर-सपाटा करने नहीं गये थे बल्कि समाज को ये सिखाने गये थे कि राजा और राजपरिवार का तथा क्षत्रिय का प्रथम कर्तव्य धर्म और समाज का रक्षण करना है.

राम ने वन में कई असुरों को मारा ज़रूर पर फिर उसका अग्नि-संस्कार भी किया, इसमें भी मानव-जाति के लिये एक सीख है.

राम का नदियों के प्रति अनुराग, वन के वृक्षों और गिरिवासियों के लिये लिये उनकी करुणा, माता-पिता और गुरु के लिये सम्मान, पत्नी के प्रति प्रेम, समर्पण और सम्मान, निषादराज और सुग्रीव से मित्रता, वनवास भेजने वाली माता और पिता के प्रति भी उतना ही सम्मान, अनुजों के साथ पिता-तुल्य व्यवहार, गुरुजनों और साधु-संतों का सम्मान, पराई नारी पर कुदृष्टि डालने वाले बालि का वध, बालि और रावण का वध कर उनके राज्य को स्वयं के अधीन न रख कर उनके भाई को सौंपना, गौ और पुरोहित के लिये उनकी चिंता, शरणागत की रक्षा, प्रतिज्ञा का मान रखना, सबका उत्साहवर्धन करना, माता शबरी के साथ स्नेहमय व्यवहार, जन्मभूमि के प्रति अनुराग, आदर्श राज्य की स्थापना और कुशल युद्ध-नीति ये सबके सब इकट्ठे राम चरित में समाहित हैं.

और न जाने ऐसे कितने उदाहरण हैं जो प्रभु राम के नाम की अमरता का प्रमाण है.

भारत में राम जैसा दूसरा कोई बेटा नहीं हुआ, राम जैसा कोई भाई नहीं हुआ, राम जैसा कोई पति नहीं हुआ, राम जैसा कोई मित्र नहीं हुआ, राम जैसा कोई शरणागतवत्सल नहीं हुआ, राम जैसा कोई करुणानिधान नहीं हुआ, राम जैसा कोई शिष्य नहीं हुआ, राम जैसा कोई शत्रु नहीं हुआ, राम जैसा अपने जीवन-चरित के माध्यम से सारी मानव जाति को जीवन-दर्शन की शिक्षा देने वाला कोई नहीं हुआ, राम जैसा कोई नीतिमान नहीं हुआ, राजा जैसा कोई राजा नहीं हुआ, राम जैसा कोई भारत में न तो हुआ है और न होगा.

राम के नाम की महिमा तो ऐसी ही है मृत्यु के पश्चात् उनके नाम के सत्य होने का उद्घोष कर मोक्ष प्राप्ति की कामना की जाती है.

इसलिये राम नाम का उद्घोष करिये, “जय श्रीराम” के नारे से ब्रह्माण्ड को गुंजायमान कर दीजिये क्योंकि राम के नाम का घोष ही रावण जैसे कुत्सित विचारों को मार देता है, धर्मराज्य की अनुभूति कराता है, आदर्श और कर्तव्य-बोध हममें फिर से जाग्रत कर देता है और आसुरी और पाशविक शक्तियों से मेरी भारत माता को सुरक्षित रखता है.

राम नाम के जयघोष मात्र से ही ये सारी आसुरी शक्तियाँ कितनी भयभीत हो जाती है इसे दुनिया पहले भी देख चुकी है और आगे भी देखेगी.

और हाँ, “राम से वाल्मीकि की महिमा है वाल्मीकि से राम की नहीं”

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