मन्नतों में बेटियों के नाम के धागे नहीं खोले गए कि बांधे ही नहीं गए?

हमार राजा बेटा
हमार जान परान

कहती इया बार बार ओइछ देती भैया को
चूल्हे की आग में मिर्चा तड़कता
धु धु कर जल जाता
इया आसमान में बहते धुएं को दिखाती कहती
सब दुःख तकलीफ हारी बेमारी फुर्र

लड़की वही उसी घर की दहलीज पर बैठी मटर छीलती मुस्कराती
कुछ लड़कियां चाहती थी लग जाये उन्हें भी नजर
इया ओइछ दे दुलार से
दर्द धुआं हो जाए
एक बार धुएं की डोर थामे लड़की
आसमान की तरफ देखे ऊँचा और ऊँचा

मन्नतों में बेटियों के नाम के धागे नहीं खोले गए कि बांधे ही नहीं गए थे
किसी आस्था की चौखट पर न फोड़ा गया नारियल
न खिलाया गया ग्यारह पण्डित का भोज

लड़कियां बज्जर की होती हैं
कह कर छोड़ दी गई
दहक रहे चूल्हे की आग पर
पांच मिर्च सी इनकी पांचो इन्द्रियों को रख कर जला दिया गया
ये बहते धुएं को आसमान में जाते भी नहीं देखती
एक झार फूक से बंधे धागे से महफूज रही लड़की के हाथ से मरने के बाद खोले गए काले धागे

ये बज्जर की लड़कियां
बज्जर की जमीन पर
तुम्हारे आग आग नियमों में जलती रही

ये राख बनी
खेतो में छींट दी गई …
ये उगी काट दी गई
ये मिली बाँट ली गई
आँगन की छाती पर भार रहीं
इन्हें दाम लगा कर बेचा गया

आजकल ये घूरे पर
गाड़ी में बसों में
अकेली सड़कों पर चीखती मर रहीं हैं

इनके हक़ में कोई नहीं बोलता
इनकी देह बाजार बनी हुई है

इनकी नज़र उतार लेनी चाहिए

– शैलजा पाठक

उपेक्षा जान भी ले सकती है

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