पत्थर में प्रभु यूँ ही नहीं आते

कई दिन से यह बात दिमाग में घूम रही थी. फिर ये और बलवती तब हुई जब साईं बाबा पर मेंशन किये गए प्रिय परिजन ने कह दिया ‘ऐसी पोस्ट पर आप मुझे मेंशन न करें’.

आज शाम मैंने साईं बाबा की एक यात्रा देखी, भव्य यात्रा. लगभग एक हज़ार लोग चल रहे थे. क्या वे आज श्रीराम मंदिर दर्शन को गए होंगे.

आज कुछ सवाल साईं के भक्तों से होंगे, उससे पहले जानिए अगम शास्त्र के बारे में. सवाल करने से पहले इसके बारे में जानना आवश्यक है.

मंदिरों और मूर्तियों को बनाने का एक विज्ञान है जिसे ‘अगम शास्त्र’ कहा जाता है. इसमें निर्माण की विधि के साथ रीति-रिवाज के नियम और मानदंडों का समावेश किया गया है.

ये प्राचीन विज्ञान संस्कृत और तमिल भाषा में लिखा गया था. आप कहीं भी यूं ही मंदिर बनाकर खड़ा नहीं कर सकते हैं.

जैसे अगम शास्त्र के अनुसार किसी भी हिन्दू आराध्य स्थल के लिए तीन बातें होनी आवश्यक है. स्थल, तीर्थ और मूर्ति. इसमें तीर्थ का अर्थ ऐसा स्थान है, जहाँ कोई जलाशय या सरोवर होना आवश्यक है.

अगम शास्त्र में ये बताया जाता है कि ‘पवित्र प्रतिमा मंदिर में किस स्थान पर रखी जाए’, ‘प्राण प्रतिष्ठा’ किस तरह हो कि प्रक्रिया समाप्त होते ही ‘ईश्वरीय चेतना’ तुरंत ही प्रतिमा में प्रवेश कर जाए.

यह एक अत्यंत गूढ़ विज्ञान है. आज कहना मुश्किल है कि ये शास्त्र कितना अपने मूल स्वरूप में बचा है और कितने मंदिर वर्तमान में इस प्राचीन विज्ञान के अनुरुप बनाए जा रहे हैं.

यही कारण है कि डॉ सुब्रमणियम स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक पत्र लिखकर मांग की है कि राम मंदिर का निर्माण अगम शास्त्र के उच्च कोटि के विषेशज्ञ करें ताकि श्रीराम की ‘प्राण प्रतिष्ठा’ सटीक ढंग से हो सके.

सद्गुरु ने अगम शास्त्र की जटिलता को कम करते हुए बहुत आसानी से इसका मतलब समझाया है.

‘यह एक ऐसी टेक्नालॉजी है जिसके जरिये आप पत्थर जैसी स्थूल वस्तु को एक सूक्ष्म ऊर्जा में रूपांतरित कर सकते हैं, जिसको हम ईश्वर कहते हैं.

भारत में बहुत सारे मंदिर हैं. मंदिर कभी भी केवल प्रार्थना के स्थान नहीं रहे, वे हमेशा से ऊर्जा के केंद्र रहे हैं. आपसे यह कभी नहीं कहा गया कि मंदिर जा कर पूजा-अर्चना करें, यह कभी नहीं कहा गया कि ईश्वर के आगे सिर झुकाकर उनसे कुछ याचना करें.

आपसे यह कहा गया कि जब भी आप किसी मंदिर में जायें तो वहां कुछ समय के लिए बैठें जरूर.

पर आजकल लोग पल भर को बैठे नहीं कि उठ कर चल देते हैं. बैठने का मतलब यह नहीं है. मकसद यह है कि आप वहां बैठ कर ऊर्जा ग्रहण करें. यह एक ऊर्जा-केंद्र है जहां आप कई स्तरों पर ऊर्जा प्राप्त कर सकेंगे.

चूंकि आप खुद कई तरह की ऊर्जाओं का एक जटिल संगम हैं इसलिए हर तरह के लोगों को ध्यान मे रखते हुए कई तरह के मंदिरों का एक जटिल समूह बनाया गया. एक व्यक्ति की कई तरह की जरूरतें होती हैं जिसे देखते हुए तरह-तरह के मंदिर बनाए गये.

उदाहरण के लिए केदारनाथ एक बहुत शक्तिशाली स्थान है; इस स्थान की ऊर्जा काफी आध्यात्मिक तरह की है. पर केदारनाथ के रास्ते में तंत्र-मंत्र की विद्या से संबंधित भी एक मंदिर है.

किसी ने यहां पर एक छोटा मगर बहुत शक्तिशाली स्थान बनाया है. यदि किसी व्यक्ति को तंत्र-विद्या के ऊपर काम करना है तो वे इस छोटे-से मंदिर में जाते हैं क्योंकि यहां का वातावरण केदार मंदिर की अपेक्षा ऐसे काम के लिए अधिक सटीक होता है.

यह टेक्नॉलॉजी है, लेकिन भौतिकता के दायरे में ही है. यदि आपके मन में जानने की इच्छा उठेगी तो आप तार्किक रूप से इसको समझ सकेंगे.

हो सकता है आप अपना फोन, अपना बूम बॉक्स या अपना माइक्रोफोन या ऐसी किसी और चीज का निर्माण खुद करने लगें- यह संभव है. यह आपकी पहुंच के दायरे में है लेकिन यदि आप इसको नहीं समझ पाते तो यह आपको चमत्कार लगता.’

अब सवाल पर आते हैं. चूँकि केदारनाथ सहित अधिकांश प्राचीन तीर्थ अगम शास्त्र के नियमानुसार बनाए गए थे तो शिरडी के साईं बाबा मंदिर को क्या अगम शास्त्र के नियमों के अनुसार बनाया गया था?

ये तकनीक ईश्वरीय ऊर्जा को पत्थर में रूपांतरित करने का विज्ञान है. ध्यान दीजिये ‘ईश्वरीय ऊर्जा’. तो साईं बाबा की प्रतिमा की ‘प्राण प्रतिष्ठा’ हुई या नहीं? यदि हुई तो ‘ईश्वरीय ऊर्जा’ साईं की कैसे हो सकती है, जबकि उनको गए ठीक से दो सौ साल भी नहीं बीते.

साईं बाबा मंदिर को तीर्थ के नियमानुसार भी नहीं बनाया गया है तो वहां ‘ईश्वरीय ऊर्जा’ का वास कैसे हो सकता है? अगम शास्त्र के अनुसार ‘विभिन्न प्रकृतियों के व्यक्तियों के लिए ‘जटिल समूह’ बनाया गया था?

और इन सबसे ऊपर सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि एक संत जो सनातनी परंपरा से हैं ही नहीं, नियमों के मुताबिक़ उनकी प्रतिमा में ‘ईश्वरीय चेतना’ आना कैसे संभव है. शिर्डी के साईं धाम को ‘अगम शास्त्र’ के नियमों से परखना चाहिए.

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