मुद्रिका

मैं मुद्रिका, उस काल की साक्षी हूँ जिसे राम ने हनुमान को सीता के लिए निशानी बनाकर दी थी…

मैं मुद्रिका, इस बात की साक्षी हूँ कि मुझे देवदूत बनकर उस प्रेम का स्मरण कराना होता है जो प्रेम पर विपत्ति के कारण धैर्य खो देता है…

संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत अपने हाथ में उठा लेने वाले और राम लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाकर समुद्र पार करवाने वाले हनुमान के लिए माता सीता को वापस श्रीराम के पास पहुँचाने में क्या मुश्किल आती.

लेकिन मैं मुद्रिका इस बात की साक्षी हूँ कि हनुमान के साथ जाने के बजाय सीता माता अपनी चूड़ामणि उतार कर हनुमान के हाथ में थमा देती है. और कहती है –

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ सम संकट भारी॥2॥

तात सक्रसुत कथा सनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥3॥

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥4॥

हनुमान के साथ जाना तो दूर जिस देवी को अग्नि भी भस्म ना कर सके, जिसके एक तिनके के उठाये भर रहने से रावण जिसको छू न सके, उसके लिए रावण से खुद को छुड़ा पाना क्या मुश्किल था…

बहुत सरल भाषा में कहा जाए तो सत्य की लड़ाई शॉर्टकट से नहीं जीती जा सकती. रास्ता लंबा, कठिन होगा तभी प्राप्त सत्य का महत्व युगों तक कायम रहेगा.

धर्म साहस की लड़ाई है, प्रकृति की योजना से जब सजग मानव अनभिज्ञ नहीं रहते तो प्रभु इस लीला को न जानते हो ऐसा हो ही नहीं सकता.

जब जब धर्म पर संकट आता है ईश्वर प्रपंच रूपी प्रसंग रचते हैं, फिर उन प्रसंगों पर जब कथा लिखी जाती है तो मैं मुद्रिका उन धर्म ग्रंथों की भी साक्षी हो जाती हूँ कि उसका एक एक शब्द ईश्वर द्वारा रचित होता है. कथाकार तो सिर्फ माध्यम होते हैं.

ऐसा नहीं कि प्रपंच और प्रसंग कलयुग में नहीं रचे जा रहे… हर युग के अपने अपने धर्म ग्रन्थ है. तो आज उन प्रसंगों को साक्षी मानकर जो कुछ भी रचा जा रहा है वो सब ईश्वर के हाथों ही रचा जा रहा है.

फिर चाहे वो किसी पुस्तक स्वरूप में हो, या इन्टरनेट की आधुनिक दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक शब्दों के रूप में.

प्रेम, प्रतीक्षा, पीड़ा की राह में चलकर जो भी परमात्मा तक पहुंचेंगे… उन सारे लोगों की ऊंगलियों में मैं मुद्रिका शब्द ऊर्जा बनकर लिपटी रहूँगी… और आनेवाली पीढ़ी को पहुँचाऊँगी साक्ष्य…

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