समस्या तलाक दर में बदलाव नहीं, खौफनाक है तलाक के कारणों में बदलाव

तलाक के मामले बढ़ते जा रहे हैं. शायद कुछ दशकों बाद हमारे यहां भी तलाक दर अमेरिका की तरह पचास प्रतिशत होगा या फिर स्पेन या बेल्जियम की तरह साठ प्रतिशत से ज्यादा.

समस्या तलाक दर में बदलाव नहीं है, खौफनाक है तलाक के कारणों में बदलाव. अक्सर हमें लगता है कि दो लोगों ने तलाक लिया है तो वजह बहुत बड़ी रही होगी. पत्नी बेवफा होगी या पति घरेलू हिंसा करता होगा.

ऐसे मामलों में तलाक वाजिब भी लगता है. पर आश्चर्यजनक रूप से जब आप स्टडी करेंगे तो पायेंगे पश्चिम में तलाक का मुख्य कारण कोई ऐसी बड़ी बात ही नहीं है. बल्कि वजहें कुछ ऐसी होती है करियर, फाइनेंस, टाइम मैनेजमेंट, बात-चीत का तरीका आदि जिन पर कोई भी दम्पति चाहे तो साथ मिलकर काम कर सकता है.

पर अजीब है कि पश्चिम जो सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सहिष्णु शब्द को जीभ के नोक पर लेकर चलता है, वहाँ पति-पत्नी के करीबी रिश्ते में यह शब्द खोता जा रहा है.

हमारे यहाँ आज भी तलाक करने की वजहें अपेक्षाकृत बड़ी होती है, पर यह ट्रेंड अब यहाँ भी बदल रहा है. एक अच्छा-खासा मनोचिकित्सक सिर धुन रहा था बोलते हुये कि अब मैरिज काउंसलिंग में लोग ऐसी-ऐसी पिद्दी समस्यायें लेकर पहुंचने लगे हैं कि उसे भी हैरानी होती है. रिश्तो में expectations होते ही हैं, पर ये unrealistic हो तो खतरनाक है.

जैसे एक हाल के मामले में पत्नी को तलाक चाहिये क्योंकि पति घर का काम पत्नी के बराबर नहीं करता. सुनने पर डिमांड बड़ी प्रोग्रेसिव और शायद जायज भी लगे. पर अब दूसरा पक्ष यह है कि पति डॉक्टर है, और बारह घण्टे की ड्यूटी करके वापस आता है जबकि पत्नी ना तो जॉब करना चाहती है ना करती है.

घर पर बाई भी है पर बात अहम की है. अब इस जेनरेशन को रिश्ते में पाई-पाई का हिसाब करना है. परफेक्शन इन्हें ब्रिटनी स्पीयर्स के लेवल की चाहिये.

शायद आपको याद हो लाखों युवाओं की आदर्श इस पॉपस्टार ने अपनी शादी के दो घण्टे के अंदर तलाक लिया क्योंकि kiss के समय लड़के ने डकार मार दी थी.

बढ़ते तलाक दर का असर बच्चों की परवरिश पर तो पड़ता ही है पर तलाक लेने वाला रिश्ते से निकल कर बहुत तोप मार ले रहा हो, ऐसा भी नहीं है. रिसर्च बताते हैं कि अक्सर तलाकशुदा लोग डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्या से ज्यादा घिरते है.

अकेलेपन की समस्या भी बढ़ती जा रही है. वजह एक ही है- हर इंसान को जिंदगी में एक स्थायी, भरोसेमंद रिश्ता चाहिये होता है. इसीलिये पूरी दुनिया की पसंदीदा कहानियों में प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के प्रति ईमानदार होते हैं, जी-जान से प्यार करते हैं.

यह चीज बिकती है क्योंकि यह हर इंसान की फैंटसी को दिखाती है. पर जब आपको असल जिंदगी में यह stability नहीं मिलती है तो कहीं ना कहीं इंसान कमजोर पड़ता है. माता-पिता एक समय के बाद जब साथ छोड़ दे तो ये भरोसा और प्यार कि कोई हर कीमत पर आपके साथ है, सिर्फ दाम्पत्य जीवन से ही मिलता है अब वो दाम्पत्य आप लिव-इन में रखे या शादी करके पर होना गम्भीर चाहिये.

पर कुछ तो मीडिया और कुछ बदलती संस्कृति की वजह से शादी अब गम्भीरता खोता जा रहा है(लिव-इन ज्यादातर मामलों में गम्भीर हुआ ही नहीं कभी) और तलाक भी. शादी बचाना अब गम्भीर बात नहीं है और तलाक लेना भी नहीं. दुःखद यह है कि जिस तरह से यह ट्रेंड बढ़ रहा है आने वाले समय में शायद हर इंसान ही ब्रिटनी की तरह नया रिकॉर्ड कायम करें और हम मनोवैज्ञानिको को शायद हर साल “तलाक के ढाई सौ नये कारण” अपने नोट्स में जोड़ने पड़ेंगे.

हर रिश्ते का बचना कतई जरूरी नहीं पर ईमानदारी से एक प्रयास जरूर होना चाहिए. यह 50% और 60% की दर इस “प्रयास” की कमी दिखाती है. बेहतर होगा अगर यह रेट हमारे समाज में ना घुसे तो.

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