राहुल को देख बहुत याद आ रहा है वो आदमी

प्रसंग लगभग 18 वर्ष पुराना, सन 2000 का है. उन दिनों मैं पंजाब में जालन्धर के एक प्रकाशन समूह की पत्रिका के संपादकीय विभाग में कार्यरत था.

एक दिन पत्रिका के सम्पादक महोदय के साथ कार से दिल्ली के लिए रवाना हुआ. रास्ते में लुधियाना से थोड़ा पहले हाइवे पर कुछ ट्रक और कारें रुकी हुई होने के कारण हमारी कार भी रुक गयी.

कार रुकने पर ज्ञात हुआ कि हाइवे के दूसरी तरफ दो-तीन बैनर थामे हुए 50-60 लोगों का एक जुलूस ढोल बजाते हुए वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जम्मू की तरफ जा रहा है.

उस जुलूस का मुख्य आकर्षण यह था कि जुलूस के सभी लोग तो पैदल चल रहे थे लेकिन एक आदमी सड़क पर लोटते हुए, पलटी मारते हुए दूरी तय कर रहा था.

इसी तमाशे को देखने के लिए कुछ ट्रक वाले रुक गए थे जिससे ट्रैफिक रुक गया था. अतः हमारी कार भी रुक गयी थी.

कुछ ही क्षणों में जुलूस गुज़र जाने के बाद ट्रैफिक चलने लगा था और हमारी कार भी दिल्ली की तरफ दौड़ने लगी थी. लेकिन कुछ क्षणों पूर्व दिखे नज़ारे से सम्पादक महोदय अभिभूत हो उठे थे.

वहां से वैष्णों देवी के मन्दिर की दूरी बताते हुए उन्होंने सड़कों पर लोटते हुए जा रहे उस व्यक्ति की भक्ति भावना की प्रशंसा के पुल बांधने शुरू कर दिए थे.

उनकी बातें सुनकर मैं मुस्कुराने लगा था. मेरी मुस्कुराहट उनको अखर गयी थी, अतः उन्होंने थोड़ी तल्खी से पूछ लिया था कि इसमें हंसने वाली क्या बात है?

तब मैंने उनसे कहा था कि सर इस सन्दर्भ में मेरी सोच बिल्कुल अलग है. उन्होंने तत्काल पूछा था कि तुम्हारी क्या सोच है इस बारे में?

मैंने उनसे कहा था कि सर आपने देखा होगा कुछ लोगों को जो बड़ी ढिठाई से कहते हैं कि मैं भगवान को नहीं मानता. कहां हैं भगवान? कैसा है भगवान? कहां रहता है भगवान? पता बताओ उसका. आदि आदि…

संपादक जी बोल उठे कि हां कुछ लोग इस तरह की बातें करते हैं. इस पर मैंने अपनी बात और स्पष्ट करते हुए उनसे कहा था कि सर, माता वैष्णों देवी के दर्शन करने लाखों लोग प्रतिवर्ष आते हैं. ये सभी लोग ट्रेनों बसों हवाई जहाजों या अपने निजी वाहनों से ही आते हैं. हज़ारों लाखों रुपये खर्च करते हैं. क्या वो लोग माता माता वैष्णों देवी के भक्त नहीं हैं?

जबकि वैष्णो देवी के लिए तो यह बात प्रसिद्ध है कि जब वो बुलाती हैं तब ही उनके दर्शन के लिए कोई जा पाता है, अन्यथा दर्शन की उसकी मंशा योजना बनाने तक ही सीमित रह जाती है.

मैंने अपनी बात और स्पष्ट करते हुए तब उनसे कहा था कि… सर हमारा धर्म पूर्वजन्म और उसके कर्मों के फल पर दृढ़ विश्वास करता है. अतः मेरा मानना है कि वो जो लोटते हुए जा रहा था वह भी उन्हीं में से एक है.

यह वो लोग हैं जिन्होंने पूर्वजन्म में भगवान को पूरी तरह नकारा है, दुत्कारा है इसीलिए इस जन्म में भगवान दण्डस्वरूप इनकी बुद्धि इस तरह फेर देते हैं कि… तुम मन्दिर तो आओगे ही… वह भी सड़क पर लोटते हुए आओगे तथा साथ में ढोल नगाड़े बजवाते हुए बैनर हिलाते हुए आओगे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग देख सकें कि तुम सड़क पर लोटते हुए मेरे मन्दिर आ रहे हो…

मेरी बात सुनकर इस बार सम्पादक जी खुलकर मुस्कुराए थे और मेरी हथेली पर अपनी हथेली ज़ोर से मारते हुए बोले थे… भाई मिश्रा तुम्हारी बात में दम तो है…

उस दिन पता नहीं मेरी बात में दम था या नहीं पर ऐसे प्रदर्शनकारी भक्तों के प्रति मेरी उपरोक्त धारणा आज भी नहीं बदली है.

यही कारण है कि 2007 में कांग्रेसी यूपीए सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम को कोरी गप्प बताता हुआ हलफनामा तथा मन्दिर जाने वालों को लड़कियां छेड़ने वाला शोहदा बताता राहुल गांधी का बयान मुझे याद आता है.

फिर दर्जनों न्यूज़ चैनलों और अखबारों के कैमरामैनों को साथ ले जाकर गुजरात से कर्नाटक तक सैकड़ों मन्दिरों की देहरी पर माथा रगड़ते राहुल गांधी को देखकर मुझे 2014 से शुरू हुई और आज तक जारी कांग्रेस और राहुल गांधी की वह प्रचण्डतम राजनीतिक दुर्दशा याद आती है जिसके कारण पिछले 6-7 महीनों से वह सैकड़ों छोटे-बड़े, ज्ञात अज्ञात मन्दिरों की चौखट पर अपना माथा रगड़ रहा है और ज़ोर-शोर से प्रचार के साथ रगड़ रहा है.

अतः राहुल गांधी की इस हालत को देखकर सन 2000 में सड़क पर लोटते हुए वैष्णों देवी के मंदिर जा रहा वह आदमी तथा उस पर की गयी अपनी वह टिप्पणी आजकल मुझे बहुत याद आती है.

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