क्या कभी हिन्दुओं ने महसूस की है धर्म योद्धा विचारकों की ज़रुरत

हमें इस से क्या मिला?… हमें इस से क्या मिलता है?… हमें इस से क्या मिलेगा?…

आक्रामक विधर्मियों से लड़ने में इन तीन प्रश्नों ने हिंदुओं की सब से अधिक हानि की है. साथ ही जोड़ लीजिए अविश्वास और जलन को.

यह तीन प्रश्न हमेशा प्रासंगिक थे और हैं… “और रहेंगे” इसलिए नहीं लिखा क्योंकि आशा है यह प्रश्न लिखने का दुर्भाग्य नसीब नहीं होगा.

250 वर्षों से हिन्दू वैचारिक आक्रमण का भी शिकार है और हमेशा इन तीन प्रश्नों के कारण, वैचारिक आक्रमण के लिए जो सही योद्धा चाहिए, उन्हें जुटा नहीं पाता.

सब से अधिक दुख की बात यह है कि इसके लिए सिर्फ ‘हिन्दू नहीं सुधरेंगे, उन्हें नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता’, इस तरह की भविष्यवाणी कर के आत्मग्लानि की तुष्टि की जाती है.

चलिये विषय को ठीक से समझने के लिए ज़रा विषय से हटकर बात करते हैं.

हिंदुओं के बेटे डॉक्टर होते हैं, आर्किटेक्ट होते हैं, वकील होते हैं, सीए होते हैं, IAS IPS बनते हैं, IIT + IIM से MBA कर के 5-6 अंकों में सैलरी पाते हैं. बिजनेसमन होते हैं, ढेरों कमाते हैं. सुंदर कन्याओं के बापों के लिए ‘प्राइज़ कैच’ होते हैं.

अच्छी बात है, ऐसे ही होते आया है, होता भी रहेगा, जग रीति है. कोई उनकी कमाई से जलता नहीं. हर कोई कहता है कि ये उनकी योग्यता की कीमत है. कोई जलन नहीं. सेना में काम करने वाले लोगों को अच्छी सैलरी मिलनी ही चाहिए, इसमें भी कोई दो राय नहीं रखता. यह भी सही है.

लेकिन धर्म के योद्धा जो विचारक होने चाहिए या फिर जिस दर्ज़े के विचारक होने चाहिए, क्या हिन्दुओं ने यह ज़रूरत महसूस की भी है कभी?

क्या किसी ने कभी यह भी सोचा है कि कोई मल्टीनेशनल कंपनी के लिए मार्केट की लड़ाई प्लान करने वाले IIT IIM MBA को जो बुद्धि चाहिए, उसी लेवल की बुद्धि की ज़रूरत यहाँ भी होती है?

वहाँ आप का मार्केट शेयर under attack है तो यहाँ भी आप की जनसंख्या under attack ही है.

किसी ने इस तरह से सोचा नहीं क्योंकि हिन्दुओं ने अपने धर्म को हमेशा भगवान भरोसे छोड़ दिया है. इसलिए जो उनके मंदिरों के साथ होते आया है, वही हिन्दू और उसके धर्म के साथ भी होते आया है. यही वास्तविकता है.

जॉब के लिए सैलरी तब तय होती है जब जॉब की ज़रूरत महसूस की जाये. जब एक ऑर्गनाइज़ेशन की ज़रूरत महसूस हो.

यहीं पर अविश्वास अपनी भूमिका निभाता हैं. ‘क्या पता कौन लोग होंगे, हमारे पैसों से क्या-क्या करेंगे…’ यह बहुत बड़ा सवाल होता है जो अच्छी-अच्छी योजनाओं को लापता कर देता है.

धर्म का नाम लेते ही हिन्दू की प्रतिक्रिया अलग-अलग प्रकार से होती है. किसी का हाथ देने के लिए जेब में जाता है तो किसी का हाथ ढंकने के लिए जेब पर जाता है.

दोनों का अपना अपना लॉजिक होता है और दोनों की नज़र में वो लॉजिक अकाट्य भी होता है. लेकिन आम तौर पर स्वार्थ के आसन पर विराजमान हो कर त्याग के स्तोत्र गाये जाते हैं.

जलन भी अपना योगदान देती है. जब कोई बाबा या संत के अनुयायी उसकी शान में कोई भव्य समारोह आयोजित करते हैं, उसमें एक फूटी कौड़ी का भी योगदान न देने वाले ज़हरीले फूत्कार छोड़ते हैं कि क्या यही पैसा …….. में काम नहीं आता?

न इनसे मांगा गया और न उन्होंने दिया, और न ही वो धन सरकार का है, फिर भी. यही जलन समाज में भी प्रसारित की जाती है.

एक इंग्लिश कहावत याद आती है – A fool and his money are soon parted – संपत्ति मूर्ख के साथ अधिक समय तक नहीं रह सकती.

हिन्दू के विविध समुदायों का जो संगठित और सुव्यवस्थित पद्धति से क्षरण (attrition) होते जा रहा है वो जनसंख्या के साथ साथ धन का भी क्षरण है यह भी समझना आवश्यक है.

इस्लाम और इसाइयत शुरू से ही इस मैनेजमेंट की ज़रूरत समझते हैं और इसी कारण आक्रमणों में सफल भी रहे हैं.

समय रहते हम हिंदुओं को भी यह समझना आवश्यक है, यही एक हमारा देश बचा है, भाग कर परदेस सभी नहीं जा पाएंगे और जो जाएँगे उन्हें भी वहाँ पूर्ण स्वीकृति नहीं मिल पाएगी. उनके लिए वे ‘इंडियन’ ही रहेंगे.

हिंदुओं की इतनी जनसंख्या के चलते धन की कोई कमी नहीं होगी या नहीं होनी चाहिए, अगर अविश्वास न हो. असली समस्या यही है – अविश्वास.

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